"एक गंभीर व्यक्ति कभी मासूम नहीं हो सकता, और जो मासूम है, वह कभी गंभीर नहीं हो सकता।" – ओशो
ओशो के इन शब्दों में जीवन का एक बहुत गहरा सत्य छिपा है।
गंभीरता और मासूमियत—ये दो विपरीत दिशाएँ हैं।
एक व्यक्ति या तो गंभीर हो सकता है या मासूम, दोनों एक साथ नहीं हो सकते।
लेकिन समाज ने हमें क्या सिखाया?
समाज हमें सिखाता है कि गंभीर बनो, जिम्मेदार बनो, परिपक्व बनो।
बचपन की मासूमियत को धीरे-धीरे खत्म कर दिया जाता है।
ओशो कहते हैं, "गंभीरता मृत्यु है, मासूमियत जीवन है।"
जिस दिन तुम गंभीर हो जाते हो, उस दिन तुम जीने की कला खो देते हो।
जिस दिन तुम मासूम हो जाते हो, उस दिन तुम सच में जीवंत हो जाते हो।
तो चलो, इस सत्य को गहराई से समझने की कोशिश करें।
1. गंभीरता: समाज द्वारा थोपी गई बीमारी
ओशो कहते हैं, "गंभीरता तुम्हारी असली प्रकृति नहीं है, यह तुम्हें सिखाई गई है।"
कोई बच्चा गंभीर पैदा नहीं होता।
हर बच्चा हँसता हुआ, खेलता हुआ, आनंद से भरा हुआ जन्म लेता है।
फिर धीरे-धीरे समाज उसे सिखाने लगता है:
- "जिम्मेदार बनो, वरना लोग तुम्हें हल्के में लेंगे।"
- "ज्यादा मत हँसो, वरना लोग तुम्हें पागल समझेंगे।"
- "गंभीर बनो, ताकि तुम्हें सम्मान मिले।"
और इसी चक्कर में मासूमियत खो जाती है।
एक मासूम बच्चा धीरे-धीरे गंभीर, बोझिल और तनावग्रस्त वयस्क बन जाता है।
लेकिन क्या तुमने कभी गौर किया है?
गंभीर लोग कभी खुश नहीं होते।
वे हमेशा किसी न किसी चीज़ की चिंता में डूबे रहते हैं।
ओशो कहते हैं, "गंभीरता का मतलब है—तुमने जीवन को एक बोझ बना लिया है।"
2. मासूमियत: अस्तित्व का वरदान
अब मासूमियत को समझते हैं।
मासूमियत का अर्थ है—जीवन को खेल की तरह देखना।
ओशो कहते हैं, "मासूम व्यक्ति वही होता है, जो अभी भी आश्चर्यचकित हो सकता है, जो फूल को देखकर खुश हो सकता है, जो पक्षियों की चहचहाहट में आनंद पा सकता है।"
मासूम व्यक्ति का मन बच्चों जैसा होता है—
- न कोई तनाव, न कोई चिंता।
- न भविष्य की चिंता, न भूतकाल का बोझ।
- बस, हर क्षण को पूरी तरह जीना।
इसलिए ओशो कहते हैं, "मासूमियत का अर्थ है—अहंकार से मुक्त होना।"
जब तुम्हारे भीतर कोई नकलीपन नहीं रहता, जब तुम्हें किसी को प्रभावित करने की जरूरत नहीं होती, तब तुम सच में मासूम हो जाते हो।
3. गंभीरता और मासूमियत में अंतर
अब एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या गंभीरता और मासूमियत में संतुलन संभव है?
ओशो कहते हैं, "नहीं! वे दो अलग-अलग दिशाएँ हैं।"
अगर तुम मासूम हो, तो गंभीर नहीं हो सकते।
अगर तुम गंभीर हो, तो मासूम नहीं हो सकते।
गंभीर व्यक्ति कैसा होता है?
- वह हमेशा भविष्य की चिंता करता है।
- वह हमेशा दूसरों की राय से प्रभावित होता है।
- वह हँसता भी है, तो नकली हँसी होती है।
- वह सबकुछ जानने का दिखावा करता है।
मासूम व्यक्ति कैसा होता है?
- वह वर्तमान में जीता है।
- वह किसी की परवाह नहीं करता—वह बस खुद को अभिव्यक्त करता है।
- उसकी हँसी सहज होती है, बिना किसी बनावट के।
- वह स्वीकार करता है कि वह कुछ नहीं जानता।
ओशो कहते हैं, "बुद्धि गंभीर बनाती है, लेकिन ज्ञान मासूम बनाता है।"
4. क्या मासूमियत का मतलब मूर्खता है?
अब एक और प्रश्न उठता है—
अगर गंभीरता गलत है, तो क्या हमें मूर्ख बन जाना चाहिए?
ओशो कहते हैं, "नहीं, मासूमियत मूर्खता नहीं है।"
मूर्खता का मतलब है—बिना सोचे-समझे जीवन जीना।
मासूमियत का मतलब है—बिना किसी बोझ के, बिना किसी अहंकार के जीना।
बुद्ध भी मासूम थे, लेकिन वे मूर्ख नहीं थे।
महावीर, कृष्ण, यीशु—सभी मासूम थे, लेकिन वे अज्ञानी नहीं थे।
तो फिर असली मासूमियत क्या है?
- यह एक सहज ज्ञान है।
- यह गहरी समझ है, लेकिन अहंकार के बिना।
- यह गंभीरता के बिना बुद्धिमानी है।
ओशो कहते हैं, "सच्चा ज्ञानी वही है, जो हँस सकता है, जो नाच सकता है, जो गा सकता है।"
5. जीवन को खेल बनाओ, युद्ध नहीं
गंभीर लोग जीवन को युद्ध बना लेते हैं।
वे हमेशा कुछ न कुछ हासिल करने में लगे रहते हैं—
- ज्यादा पैसा
- ज्यादा सम्मान
- ज्यादा शक्ति
लेकिन मासूम व्यक्ति के लिए जीवन एक खेल है।
उसे कुछ भी साबित नहीं करना है।
वह जो कुछ भी करता है, प्रेम से करता है, आनंद से करता है।
ओशो कहते हैं, "गंभीरता तुम्हें बूढ़ा बना देती है, मासूमियत तुम्हें हमेशा युवा रखती है।"
6. कैसे बनें मासूम? (प्रैक्टिकल उपाय)
अब सवाल यह उठता है—गंभीरता से मासूमियत की ओर कैसे जाएँ?
ओशो इसके लिए कुछ उपाय बताते हैं:
(1) ज्यादा हँसो
- गंभीरता को छोड़ो।
- छोटी-छोटी बातों में खुशी ढूँढो।
- बच्चों की तरह बिना वजह हँसो।
(2) जीवन को हल्के में लो
- हर चीज़ को इतना गंभीर मत बनाओ।
- अगर चीज़ें गलत हो रही हैं, तो भी हँसो।
- जीवन में खेल की भावना लाओ।
(3) अपनी धारणाएँ तोड़ो
- "मैं बहुत बुद्धिमान हूँ"—यह सोच छोड़ो।
- "मुझे सबकुछ पता है"—यह अहंकार छोड़ो।
- अज्ञानी बनो, क्योंकि अज्ञानी ही सीख सकता है।
(4) ध्यान करो
- ध्यान गंभीरता को घोल देता है।
- ध्यान तुम्हें वास्तविक बनाता है।
- ध्यान तुम्हें वर्तमान में लाता है।
ओशो कहते हैं, "अगर तुम पूरी तरह ध्यान में हो, तो मासूम हो जाओगे। और अगर तुम मासूम हो गए, तो जीवन ही एक ध्यान बन जाएगा।"
7. निष्कर्ष: मासूम बनो, गंभीर मत बनो
ओशो कहते हैं, "गंभीरता को छोड़ो, मासूम बनो। तभी जीवन में आनंद होगा।"
क्योंकि गंभीर व्यक्ति जीता नहीं है—
वह सिर्फ योजना बनाता रहता है, सोचता रहता है, दुखी रहता है।
जबकि मासूम व्यक्ति हर क्षण को जीता है, उसका आनंद लेता है।
ओशो का यही संदेश है—मासूम बनो, बच्चों की तरह बनो, पूरी तरह जियो।
क्योंकि, "एक गंभीर व्यक्ति कभी मासूम नहीं हो सकता, और जो मासूम है, वह कभी गंभीर नहीं हो सकता।"
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