"मैं तो दो ही पाठ सिखा रहा हूं—ध्यान के और प्रेम के। ध्यान तुम्हें प्रेम के योग्य बनाता है, और प्रेम तुम्हें ध्यान के योग्य बनाता है।" – ओशो
ओशो कहते हैं, "संपूर्ण जीवन सिर्फ दो चीज़ों का खेल है—ध्यान और प्रेम।"
अगर तुम ध्यान में गहरे उतर जाओ, तो तुम प्रेम से भर जाओगे।
अगर तुम सच्चे प्रेम में डूब जाओ, तो ध्यान स्वतः घटित हो जाएगा।
लेकिन समाज ने दोनों को ही विकृत कर दिया है।
ध्यान को उसने एक कठिन तपस्या बना दिया है, और प्रेम को उसने एक सौदा बना दिया है।
जबकि सच्चाई यह है कि ध्यान और प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
तो चलो, इस पर गहराई से विचार करें।
1. ध्यान और प्रेम: अस्तित्व के दो पंख
ओशो कहते हैं, "पंछी एक पंख से नहीं उड़ सकता। जीवन भी एक पंख से अधूरा है। ध्यान और प्रेम दो पंख हैं—अगर दोनों संतुलन में हों, तो तुम आकाश में उड़ सकते हो।"
लेकिन ध्यान क्या है? और प्रेम क्या है?
- ध्यान का अर्थ है पूर्ण जागरूकता—वर्तमान में जीना, बिना किसी विचार के, बिना किसी बाधा के।
- प्रेम का अर्थ है पूर्ण समर्पण—दूसरे में स्वयं को भूल जाना, अहंकार को मिटा देना।
ध्यान व्यक्ति को भीतर से शुद्ध करता है, प्रेम व्यक्ति को दूसरों के प्रति संवेदनशील बनाता है।
अगर ध्यान नहीं है, तो प्रेम स्वार्थ बन जाता है।
अगर प्रेम नहीं है, तो ध्यान शुष्क हो जाता है।
इसलिए ओशो कहते हैं, "ध्यान तुम्हें प्रेम के योग्य बनाता है, और प्रेम तुम्हें ध्यान के योग्य बनाता है।"
2. ध्यान: प्रेम की जड़ें
अगर तुम प्रेम करना चाहते हो, तो पहले तुम्हें ध्यान को समझना होगा।
क्यों? क्योंकि बिना ध्यान के प्रेम केवल आसक्ति बन जाता है।
ध्यान का अर्थ है—स्वयं को जानना, स्वयं को देखना, स्वयं को स्वीकार करना।
अगर तुम खुद को नहीं समझते, तो तुम किसी और को कैसे समझोगे?
अगर तुम खुद को प्रेम नहीं कर सकते, तो किसी और से प्रेम कैसे करोगे?
ओशो कहते हैं, "ध्यान आत्मा का भोजन है। अगर आत्मा को यह भोजन न मिले, तो प्रेम कमजोर हो जाता है, खोखला हो जाता है।"
तो पहला कदम यह है—ध्यान को अपने जीवन में उतारो।
जब तुम ध्यान में डूबते हो, तो तुम्हारे भीतर एक नयी ऊर्जा जन्म लेती है।
तुम प्रेम से भर जाते हो—बिना किसी शर्त के, बिना किसी अपेक्षा के।
3. प्रेम: ध्यान का फूल
अगर ध्यान प्रेम की जड़ें हैं, तो प्रेम उसका फूल है।
ध्यान व्यक्ति को अकेलेपन से मुक्त करता है, लेकिन प्रेम व्यक्ति को संपूर्ण बना देता है।
लेकिन यह प्रेम कोई साधारण प्रेम नहीं है।
यह प्रेम वह नहीं है, जो समाज हमें सिखाता है।
समाज का प्रेम क्या है?
- यह एक सौदा है—"अगर तुम मुझे प्यार करोगे, तो मैं तुम्हें प्यार करूंगा।"
- यह एक व्यापार है—"तुम मेरी इच्छाएँ पूरी करो, मैं तुम्हारी करूंगा।"
- यह एक डर है—"अगर तुमने मुझे छोड़ दिया, तो मैं टूट जाऊंगा।"
ओशो कहते हैं, "यह प्रेम नहीं है, यह भय, स्वार्थ और आसक्ति का दूसरा नाम है।"
सच्चा प्रेम क्या है?
- यह पूर्ण स्वतंत्रता है—तुम जैसा भी हो, मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ।
- यह पूर्ण समर्पण है—कोई शर्त नहीं, कोई अपेक्षा नहीं।
- यह ध्यान का विस्तार है—तुम्हारे भीतर इतनी ऊर्जा है कि वह बहने लगती है।
सच्चा प्रेम वही कर सकता है, जिसने ध्यान को जाना है।
ध्यान तुम्हें प्रेम के योग्य बनाता है।
4. प्रेम और ध्यान का संतुलन
अब सवाल यह उठता है—ध्यान और प्रेम में संतुलन कैसे बनाएँ?
ओशो कहते हैं, "अगर तुम केवल ध्यान में लगे रहो, तो तुम अकेले हो जाओगे। अगर तुम केवल प्रेम में लगे रहो, तो तुम खो जाओगे। इसलिए इन दोनों को संतुलित करो।"
कैसे करें?
1. ध्यान से शुरू करो – पहले अपने भीतर झाँको। ध्यान करो। अपनी वास्तविकता को देखो।
2. फिर प्रेम में उतरो – जब तुम्हारे भीतर प्रेम उमड़ने लगे, तो उसे दूसरों तक पहुँचने दो।
3. स्वतंत्रता को बनाए रखो – प्रेम को बंधन मत बनने दो। ध्यान को भागने का साधन मत बनने दो।
ओशो कहते हैं, "एक संतुलित व्यक्ति कभी अकेला नहीं होता, और कभी किसी पर निर्भर भी नहीं होता।"
5. ध्यान और प्रेम के बारे में कुछ गहरी बातें
अब हम इस प्रवचन में कुछ और गहराई जोड़ते हैं।
ओशो ध्यान और प्रेम को समझाने के लिए कई सुंदर उदाहरण देते हैं।
(1) प्रेम: सूरज की रोशनी की तरह
ओशो कहते हैं, "सूरज रोशनी देता है, लेकिन बिना किसी शर्त के। वह नहीं कहता कि 'अगर तुम मुझे मानोगे, तो ही मैं प्रकाश दूँगा।'"
सच्चा प्रेम भी ऐसा ही होता है।
अगर तुम किसी से प्रेम करते हो, तो वह स्वतंत्र होना चाहिए।
अगर तुम किसी से प्रेम करते हो, तो उसमें स्वार्थ नहीं होना चाहिए।
(2) ध्यान: एक शांत झील की तरह
ध्यान एक शांत झील की तरह है।
जब पानी स्थिर होता है, तो उसमें पूरा आकाश दिखाई देता है।
अगर तुम्हारा मन शांत है, तो तुम पूरे ब्रह्मांड को देख सकते हो।
ध्यान वही स्थिरता देता है।
जब तुम ध्यान में होते हो, तो तुम अपने भीतर ब्रह्मांड को महसूस कर सकते हो।
और जब तुम इस अनुभव में डूब जाते हो, तो प्रेम तुम्हारे भीतर से फूट पड़ता है।
6. ध्यान और प्रेम को जीवन में उतारने के कुछ व्यावहारिक कदम
अब सवाल यह उठता है—"क्या यह सब केवल समझने के लिए है, या इसे जीवन में भी उतारा जा सकता है?"
ओशो कहते हैं, "ध्यान और प्रेम केवल विचार नहीं हैं, ये जीने की विधियाँ हैं।"
तो चलो, कुछ व्यावहारिक कदम देखें:
(1) प्रतिदिन ध्यान करो
- सुबह 15-30 मिनट शांति से बैठो।
- साँसों को देखो, विचारों को जाने दो।
- धीरे-धीरे तुम्हारा मन शांत होगा।
(2) प्रेम को शुद्ध करो
- किसी से प्रेम करो, लेकिन उसमें स्वार्थ मत रखो।
- किसी को बदलने की कोशिश मत करो, उसे वैसे ही स्वीकार करो।
- प्रेम को स्वतंत्रता दो, बंधन मत बनाओ।
(3) खुद को जानो
- खुद से पूछो, "क्या मैं सच में प्रेम कर रहा हूँ, या बस किसी की ज़रूरत पूरी कर रहा हूँ?"
- ध्यान के माध्यम से अपने अंदर के डर, असुरक्षाएँ और इच्छाओं को पहचानो।
(4) समाज की परवाह मत करो
- लोग तुम्हें रोकेंगे, तुम्हें डराएँगे।
- वे कहेंगे, "ध्यान में क्या रखा है?"
- वे कहेंगे, "प्रेम में हमेशा दुख मिलता है।"
- लेकिन याद रखना—यह तुम्हारी ज़िंदगी है, समाज की नहीं।
7. निष्कर्ष: ध्यान और प्रेम से परे कुछ भी नहीं
ओशो कहते हैं, "अगर तुम्हारे जीवन में ध्यान नहीं है, तो तुम प्रेम नहीं कर सकते। और अगर प्रेम नहीं है, तो ध्यान केवल एक शुष्क अनुभव बनकर रह जाएगा।"
इसलिए इन दोनों को साथ लेकर चलो।
ध्यान को जड़ बनाओ, प्रेम को फूल बनने दो।
तब तुम्हारा जीवन सच में आनंदमय हो जाएगा।
क्योंकि जीवन का सार केवल इतना ही है—"ध्यान और प्रेम।"
बाकी सब बकवास है।
कोई टिप्पणी नहीं: