"लोग क्या कहेंगे? इस बात को सोचने से ज्यादा नपुंसक व कमजोर वृत्ति कोई नहीं है!" – ओशो
"लोग क्या कहेंगे?" – यह दुनिया का सबसे बड़ा डर है।
इसी डर के कारण मनुष्य अपनी असली ज़िंदगी नहीं जी पाता।
इसी डर के कारण लोग वही करते हैं जो समाज उनसे करवाना चाहता है।
इसी डर के कारण व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज़ को दबा देता है और एक भीड़ का हिस्सा बन जाता है।
ओशो कहते हैं, "अगर तुम सच में जीना चाहते हो, तो इस डर को छोड़ दो।"
क्योंकि जब तक तुम लोगों की परवाह करते रहोगे, तब तक तुम कभी मुक्त नहीं हो सकते।
और जो मुक्त नहीं है, वह सच में जीवित भी नहीं है।
तो आज हम इसी पर चर्चा करेंगे—"लोग क्या कहेंगे?" यह डर कहाँ से आता है, यह हमें कैसे नियंत्रित करता है, और इससे मुक्त होने का रास्ता क्या है।
1. "लोग क्या कहेंगे?" – एक मानसिक गुलामी
क्या तुमने कभी गौर किया है कि यह डर बचपन से ही तुममें भर दिया जाता है?
- अगर बच्चा ज़ोर से हँसे, तो माँ कहती है, "धीरे बोलो, लोग क्या कहेंगे?"
- अगर लड़की अपने मन से शादी करना चाहे, तो परिवार कहता है, "समाज में बदनामी हो जाएगी!"
- अगर लड़का अपनी पसंद का करियर चुनना चाहे, तो कहा जाता है, "रिश्तेदार क्या सोचेंगे?"
यानी तुम्हें बचपन से यह सिखाया जाता है कि "तुम्हारी ज़िंदगी तुम्हारी नहीं है, यह समाज की संपत्ति है।"
और तुम समाज की इच्छा के अनुसार ही जीओगे।
क्या यह जीवन है?
ओशो कहते हैं, "जो व्यक्ति हमेशा यह सोचता है कि लोग क्या कहेंगे, वह कभी अपने अस्तित्व की खोज नहीं कर सकता। वह हमेशा भीड़ का हिस्सा बना रहेगा।"
2. लोग कौन हैं? और क्यों परवाह करते हो?
अब एक सवाल उठता है—ये लोग कौन हैं?
क्या तुमने कभी इन्हें देखा है?
समाज में हजारों-लाखों लोग हैं, लेकिन जब तुम कहते हो "लोग क्या कहेंगे?", तो असल में तुम खुद को उन लोगों के हवाले कर देते हो, जिनका तुम्हारी ज़िंदगी से कोई लेना-देना नहीं है।
ओशो कहते हैं, "तुम जिन लोगों से डरते हो, वे खुद ही डर में जी रहे हैं। वे भी सोचते हैं कि लोग क्या कहेंगे! तो पूरा समाज ही एक-दूसरे से डर रहा है, और इस डर में कोई भी मुक्त नहीं हो पा रहा।"
तुम्हारी ज़िंदगी तुम्हारी अपनी है।
तुम्हें इसे अपनी शर्तों पर जीना चाहिए, न कि समाज की शर्तों पर।
3. समाज क्यों तुम्हें नियंत्रित करना चाहता है?
तुमने कभी सोचा है कि समाज तुम्हें डर में क्यों रखना चाहता है?
क्यों तुम्हारे माता-पिता, रिश्तेदार, पड़ोसी और बाकी सभी लोग यह चाहते हैं कि तुम "लोगों की परवाह" करो?
ओशो इसका एक सीधा उत्तर देते हैं—"ताकि तुम भीड़ का हिस्सा बने रहो।"
क्योंकि अगर तुम भीड़ से बाहर निकल गए, तो तुम स्वतंत्र हो जाओगे।
और स्वतंत्र व्यक्ति समाज के नियमों को नहीं मानता।
- वह अपने मन का रास्ता चुनता है।
- वह अपने दिल की सुनता है।
- वह समाज की परवाह नहीं करता।
यही समाज का सबसे बड़ा डर है—एक स्वतंत्र व्यक्ति।
क्योंकि अगर हर कोई स्वतंत्र हो गया, तो समाज का ढाँचा ही बिखर जाएगा।
इसलिए समाज हमेशा तुम्हें डराकर रखता है।
ताकि तुम वही बनो, जो वे चाहते हैं।
4. कैसे मुक्त हों इस डर से?
अब सवाल उठता है—"इस मानसिक गुलामी से कैसे निकला जाए?"
ओशो इसके लिए कुछ आसान उपाय बताते हैं।
(1) पहचानो कि लोग हमेशा कुछ न कुछ कहेंगे
ओशो कहते हैं, "अगर तुम कुछ नहीं करोगे, तो लोग कहेंगे कि तुम नाकारा हो। अगर तुम कुछ करोगे, तो वे तुम्हारी आलोचना करेंगे। और अगर तुम बहुत सफल हो गए, तो वे तुमसे जलने लगेंगे!"
तो लोग जो कहते हैं, उसका कोई अर्थ ही नहीं है।
वे हर हाल में कुछ न कुछ कहेंगे।
इसलिए उनकी परवाह करना छोड़ दो।
(2) अपनी आत्मा की आवाज़ सुनो
अगर तुम्हारा दिल कहता है कि तुम्हें किसी चीज़ की तरफ जाना है, तो जाओ।
अगर तुम्हें किसी चीज़ में आनंद आता है, तो उसे करो।
ओशो कहते हैं, "सच्चा जीवन वही है, जो तुम्हारे हृदय से जन्म ले। समाज के डर से लिया गया जीवन, असली जीवन नहीं है।"
(3) असली आज़ादी क्या है, इसे समझो
लोग समझते हैं कि आज़ादी का मतलब है—सरकार से स्वतंत्रता, परिवार से स्वतंत्रता।
लेकिन असली आज़ादी मानसिक स्वतंत्रता है।
अगर तुम अभी भी यह सोचते हो कि **"लोग क्या कहेंगे?"**, तो तुम गुलाम हो।
ओशो कहते हैं, "जब तुम यह सोचना बंद कर दोगे कि लोग क्या कहेंगे, तभी तुम सच में मुक्त होगे।"
(4) मौत को याद रखो
क्या तुमने कभी सोचा है कि जब तुम मरोगे, तब क्या होगा?
तुम्हारी पूरी ज़िंदगी बीत जाएगी, और तब तुम सोचोगे—"मैंने हमेशा समाज की परवाह की, लेकिन मैंने कभी अपने दिल की सुनी ही नहीं!"
और तब पछताना पड़ेगा।
लेकिन तब देर हो चुकी होगी।
ओशो कहते हैं, "मृत्यु को हमेशा याद रखो। यह तुम्हें याद दिलाएगी कि समय सीमित है। अगर तुम अभी नहीं जिए, तो फिर कभी नहीं जी पाओगे।"
5. वास्तविक जीवन कैसा होना चाहिए?
अगर तुम इस डर से मुक्त हो गए, तो तुम्हारा जीवन कैसा होगा?
- तुम वही करोगे, जो तुम्हें सच में अच्छा लगता है।
- तुम अपने मन की शांति को किसी और के हिसाब से नहीं तोड़ोगे।
- तुम्हें किसी के सामने खुद को साबित करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
और यही असली जीवन है।
ओशो कहते हैं, "एक बुद्धिमान व्यक्ति अपनी शर्तों पर जीता है। वह समाज की चिंता नहीं करता। वह अपने दिल की सुनता है, और वहीं जाता है, जहाँ उसका आनंद है।"
6. निष्कर्ष: अपनी ज़िंदगी जियो, समाज की नहीं!
ओशो की यह बात बहुत गहरी है—
"लोग क्या कहेंगे? इस बात को सोचने से ज्यादा नपुंसक व कमजोर वृत्ति कोई नहीं है।"
क्योंकि जो लोग सच में शक्तिशाली होते हैं, वे इस सवाल को कभी नहीं पूछते।
वे अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीते हैं।
अब फैसला तुम्हारा है—तुम अपनी ज़िंदगी जिओगे या समाज की?
तुम्हारे पास दो ही रास्ते हैं—या तो तुम अपने मन की सुनकर मुक्त बनो, या फिर "लोग क्या कहेंगे?" के डर में एक गुलाम की तरह जिओ।
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