झूठा इंसान अंत में अपने सिवाय किसी को धोखा नहीं दे सकता - - ओशो प्रवचन
प्रेम से कहो, सत्य ही जीवन है!
झूठ एक ऐसा भ्रम है, जो देखने में सुंदर लग सकता है, सुनने में मधुर प्रतीत हो सकता है, लेकिन भीतर से खोखला होता है। झूठ का जीवन जीने वाला व्यक्ति सोचता है कि वह दूसरों को छल रहा है, दूसरों को धोखा दे रहा है। लेकिन जो भी करता है, अंततः वह अपने ही साथ कर रहा होता है।
झूठ का स्वभाव ही ऐसा है कि वह जितना अधिक बोला जाता है, उतना ही बोझ बढ़ता जाता है। झूठ बोलने वाला सोचता है कि वह अपने झूठ को छिपा लेगा, लेकिन सत्य का एक स्वभाव है—वह देर-सवेर प्रकट हो ही जाता है।
जो व्यक्ति झूठ के सहारे जीवन जीता है, वह धीरे-धीरे अपनी आत्मा से कट जाता है। बाहर से वह कितना भी शक्तिशाली, प्रभावशाली लगे, भीतर से वह खोखला और कमजोर होता चला जाता है। और यही उसका सबसे बड़ा धोखा होता है—जिसे वह समझ नहीं पाता, क्योंकि वह खुद को भी झूठ बोलने लगता है।
झूठ का जाल: एक भ्रम
मनुष्य के भीतर दो शक्तियाँ काम करती हैं—एक सत्य की, दूसरी झूठ की। सत्य का कोई बोझ नहीं होता। जो सत्य के साथ जीता है, वह हल्का होता है, मुक्त होता है। लेकिन झूठ का एक स्वभाव है—वह तुम्हारे भीतर भारीपन पैदा करता है।
तुम झूठ बोलते हो, और फिर उसे छिपाने के लिए दूसरा झूठ बोलते हो। फिर तीसरा, फिर चौथा। और फिर पूरी जिंदगी एक झूठी कहानी बन जाती है।
झूठ की जड़ें कहां से आती हैं?
1. भय से – जब तुम डरते हो कि सच बोलने से कुछ खो जाएगा, तब तुम झूठ का सहारा लेते हो।
2. लालच से – जब तुम किसी चीज को पाने के लिए अपनी वास्तविकता से समझौता कर लेते हो।
3. सुरक्षा की चाह से – जब तुम सोचते हो कि सत्य तुम्हें असहज कर सकता है, तो तुम झूठ के सहारे एक नकली सुरक्षा बनाते हो।
लेकिन यह नकली सुरक्षा देर-सवेर गिर जाती है, क्योंकि सत्य ही वास्तविकता है।
झूठ और आत्म-धोखा
जो दूसरों से झूठ बोलता है, वह धीरे-धीरे खुद से भी झूठ बोलने लगता है। वह अपने ही छल में उलझ जाता है। और फिर एक दिन ऐसा आता है जब उसे खुद भी यह एहसास नहीं होता कि वह कौन है, उसका असली चेहरा क्या है।
महात्मा बुद्ध की कथा
महात्मा बुद्ध के पास एक दिन एक आदमी आया और बोला, "भगवान! मैंने पूरे जीवन झूठ बोला, धोखा दिया, लेकिन मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। लोग कहते हैं कि झूठ बुरा है, लेकिन मैं तो सुखी हूँ।"
बुद्ध मुस्कुराए और बोले, "क्या तुम वास्तव में सुखी हो?"
उस आदमी ने कहा, "हाँ, मैं बहुत खुश हूँ!"
बुद्ध ने कहा, "अगर तुम सच में खुश होते, तो तुम यहाँ नहीं होते। अगर तुम्हारा झूठ सच में तुम्हें शांति दे रहा होता, तो तुम्हें मेरी आवश्यकता नहीं होती।"
उस आदमी की आँखें खुल गईं। वह रोने लगा। उसने पहली बार महसूस किया कि वह झूठ से खुद को ही धोखा दे रहा था।
सत्य का सौंदर्य
झूठ का आकर्षण होता है, लेकिन सत्य का सौंदर्य होता है। जो व्यक्ति सत्य को अपनाता है, उसके जीवन में हल्कापन आ जाता है। उसे कुछ भी छिपाने की जरूरत नहीं पड़ती।
झूठ और सत्य की कहानी
एक बार सत्य और झूठ ने एक साथ स्नान करने का निश्चय किया। सत्य ने अपने कपड़े उतार दिए और जल में उतर गया। उसी समय झूठ ने उसके कपड़े चुरा लिए और सत्य के कपड़े पहनकर बाहर आ गया। तब से दुनिया में झूठ सत्य के रूप में घूम रहा है, और सत्य नंगा रह गया।
लोग झूठ को सत्य समझते हैं क्योंकि वह सत्य के कपड़े पहने हुए है। और सत्य को देखकर लोग असहज हो जाते हैं, क्योंकि वह नंगा है। लेकिन सत्य को इसकी चिंता नहीं होती।
सत्य की शक्ति: मुक्त होने की कुंजी
जो झूठ बोलता है, वह हमेशा भय में रहता है—कहीं उसका झूठ पकड़ न लिया जाए। लेकिन जो सत्य के साथ जीता है, वह निडर होता है।
ओशो की दृष्टि से झूठ की पहचान
ओशो कहते हैं:
1. झूठ हमेशा मजबूरी में आता है, सत्य सहज होता है।
2. झूठ को छिपाना पड़ता है, सत्य स्वयं प्रकाशित होता है।
3. झूठ अल्पकालिक होता है, सत्य शाश्वत होता है।
4. झूठ व्यक्ति को कमजोर करता है, सत्य उसे मजबूत करता है।
अगर तुम झूठ के जाल में फँस गए हो, तो तुम्हें सत्य को अपनाने की हिम्मत करनी होगी।
सत्य की ओर यात्रा कैसे करें?
1. अपनी असली भावनाओं को पहचानो।
2. जहाँ संभव हो, सत्य बोलने की हिम्मत करो।
3. झूठ का कारण खोजो—क्या तुम भय से झूठ बोलते हो? या लोभ से?
4. अपने भीतर की शांति को महसूस करो—जब तुम सत्य के साथ होते हो, तो भीतर एक हल्कापन होता है।
5. ध्यान करो—ताकि तुम अपने असली स्वरूप को पहचान सको।
ध्यान विधि: सत्य को भीतर से अनुभव करो
अगर तुम सत्य को अनुभव करना चाहते हो, तो यह ध्यान विधि तुम्हारी मदद कर सकती है:
सत्य का साक्षी ध्यान
1. एकांत में बैठो।
2. अपनी आँखें बंद करो।
3. एक गहरी सांस लो और छोड़ो।
4. अब खुद से पूछो—क्या मैं अपने जीवन में पूरी तरह सत्य के साथ हूँ?
5. जो भी उत्तर भीतर से आए, उसे बिना किसी डर के स्वीकार करो।
6. अगर कोई झूठ दिखे, तो उसे छोड़ने का संकल्प लो।
यह ध्यान रोज़ करने से तुम्हारे जीवन में एक नया बदलाव आएगा। तुम हल्का महसूस करोगे, स्वतंत्र महसूस करोगे।
अंतिम सार: अपने आप से ईमानदार बनो
झूठा इंसान सोचता है कि वह दूसरों को धोखा दे रहा है, लेकिन अंत में वह केवल खुद को धोखा देता है।
जो व्यक्ति सत्य के साथ जीता है, वह मुक्त होता है। जो झूठ के साथ जीता है, वह जंजीरों में जकड़ा रहता है।
अब यह तुम पर निर्भर है—तुम सत्य की ओर बढ़ोगे या झूठ के जाल में उलझे रहोगे?
जो सत्य को चुनता है, वही जीवन के असली आनंद को जानता है।
अब बहुत हुआ प्रवचन, अब इसे जीवन में उतारो! सत्य के साथ जियो, प्रेम करो, और मुक्त हो जाओ!
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