प्रेम से कहो, मुक्त होने का समय आ गया!
लोग क्या कहेंगे? यही तो हमारा सबसे बड़ा बंधन है। हम जन्म लेते हैं स्वतंत्र, लेकिन धीरे-धीरे समाज हमें सिखा देता है कि हमें दूसरों की नज़रों में अच्छा दिखना है, हमें उनके हिसाब से जीना है। और हम अपने भीतर की आवाज़ को अनसुना करके, दूसरों की उम्मीदों का बोझ उठा लेते हैं।
पर मजे की बात देखो—तुम सोचते हो कि लोग तुम्हारे बारे में क्या कहेंगे, और वही लोग सोच रहे हैं कि तुम उनके बारे में क्या सोचोगे! सब एक-दूसरे से डर रहे हैं, और इसी डर में जीवन गंवा रहे हैं।
समाज का सबसे बड़ा धोखा
यह समाज बड़ा अजीब है। यह तुम्हें कहता है कि "दूसरों के हिसाब से जीओ।" लेकिन सवाल उठता है—ये 'दूसरे' कौन हैं? ये भी तो उसी समाज का हिस्सा हैं। और हर कोई यही सोच रहा है कि बाकी लोग क्या कहेंगे।
यही भ्रम की चक्की चलती रहती है। कोई भी मुक्त नहीं हो पाता, क्योंकि हर कोई किसी न किसी की राय से डर रहा है।
डर का जाल कैसे बना?
यह डर तुम्हें बचपन से सिखाया जाता है:
1. बच्चा जब नाचता है, गाता है, खेलता है—तब कोई परवाह नहीं करता कि लोग क्या कहेंगे। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसे यह डर सिखाया जाता है।
2. समाज कहता है कि तुम्हें दूसरों की स्वीकृति चाहिए।
3. परिवार कहता है कि तुम्हें हमारी परंपराओं के हिसाब से चलना होगा।
4. धर्म कहता है कि तुम्हें इन नियमों का पालन करना होगा।
धीरे-धीरे तुम्हारी असली आवाज़ दबा दी जाती है, और तुम दूसरों के डर में जीने लगते हो।
लोगों की राय का कोई अस्तित्व नहीं
समझो कि लोग क्या कहते हैं, इसका कोई मूल्य नहीं।
एक छोटी कहानी
एक आदमी अपने बेटे के साथ एक गधे पर बैठा था। रास्ते में लोगों ने देखा और कहा, "कैसे निर्दयी लोग हैं! बेचारे गधे पर दोनों बैठ गए।"
यह सुनकर आदमी उतर गया और बेटे को बैठा दिया।
आगे कुछ और लोग मिले, उन्होंने कहा, "देखो, कैसा पुत्र है! बाप पैदल चल रहा है और खुद गधे पर बैठा है!"
अब बेटा उतर गया, पिता गधे पर बैठ गया।
थोड़ी दूर और चले, तो कुछ और लोग बोले, "कैसा निर्दयी बाप है! खुद गधे पर बैठा है और बच्चे को पैदल चला रहा है।"
अब बाप-बेटे दोनों ही गधे के साथ पैदल चलने लगे।
तब कुछ और लोग मिले और बोले, "कैसे मूर्ख लोग हैं! गधा होते हुए भी पैदल चल रहे हैं!"
अब बताओ, इन 'लोगों' की राय का क्या मतलब?
लोगों की राय क्यों बदलती रहती है?
समाज की राय कभी स्थिर नहीं होती। जो आज तुम्हें सराहेंगे, वही कल तुम्हें दोष देंगे।
1. अगर तुम अमीर हो, तो लोग कहेंगे—यह घमंडी है।
2. अगर तुम गरीब हो, तो लोग कहेंगे—यह निकम्मा है।
3. अगर तुम अकेले हो, तो लोग कहेंगे—इसका कोई नहीं।
4. अगर तुम भीड़ में हो, तो लोग कहेंगे—यह दूसरों पर निर्भर है।
इसलिए 'लोग क्या कहेंगे'—यह कभी खत्म न होने वाला सवाल है।
जो मुक्त हो गया, वही जी सका
अगर तुम सच में जीना चाहते हो, तो इस भय से मुक्त होना पड़ेगा।
कबीर का उदाहरण
कबीर ने कहा: "जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहीं।"
जब तक तुम समाज की राय के चक्कर में हो, तब तक तुम्हारे भीतर सत्य प्रकट नहीं हो सकता।
बुद्ध का उदाहरण
बुद्ध ने राजमहल छोड़ दिया। लोग कहने लगे, "कैसा अजीब आदमी है! इतनी संपत्ति, इतना वैभव छोड़ दिया।"
जब बुद्ध वापस लौटे, तब लोग कहने लगे, "देखो, यह वापस क्यों आ गया? अगर जाना ही था, तो लौटा क्यों?"
समाज हमेशा विरोधाभासी होता है।
कैसे मुक्त हों?
1. ध्यान दो कि तुम क्यों डरते हो। क्या तुम सच में डरते हो, या यह डर तुम्हें सिखाया गया है?
2. खुद से पूछो—तुम्हें क्या चाहिए? समाज जो कहता है, वह जरूरी नहीं कि तुम्हारे लिए सही हो।
3. अपने भीतर की आवाज़ को सुनो। अगर तुम्हारा दिल कुछ कहता है, तो उसे मानो।
4. लोगों की राय को देखने का एक नया तरीका अपनाओ। समझो कि वे भी तुम्हारी ही तरह डरे हुए हैं।
5. स्वयं को स्वीकृति दो। जब तुम खुद को स्वीकार करते हो, तो बाहरी स्वीकृति की जरूरत ही नहीं पड़ती।
ध्यान विधि: ‘मैं कौन हूँ?’
अगर तुम इस डर से मुक्त होना चाहते हो, तो यह ध्यान विधि आज़माओ:
1. शांत जगह पर बैठो।
2. आँखें बंद करो और गहरी सांस लो।
3. मन में यह प्रश्न उठाओ—"मैं कौन हूँ?"
4. कोई भी उत्तर आए, उसे जाने दो। फिर से पूछो—"मैं कौन हूँ?"
5. जब तक कोई अंतिम उत्तर न मिले, बस देखते रहो।
यह ध्यान तुम्हें दिखाएगा कि लोग क्या कहेंगे, इसका तुम्हारे असली अस्तित्व से कोई संबंध नहीं।
निष्कर्ष: जीवन को मुक्त होकर जियो
1. लोगों की राय हमेशा बदलती रहती है—इसलिए उनकी चिंता मत करो।
2. जो लोग तुम्हारी आलोचना कर रहे हैं, वे खुद भी डर में जी रहे हैं।
3. केवल वही व्यक्ति सच में जी सकता है, जो ‘लोग क्या कहेंगे’ के डर से मुक्त हो गया।
4. स्वयं को स्वीकार करो, अपने सत्य को जियो, और मुक्त हो जाओ।
अब बहुत हुआ प्रवचन! अब इस भय को छोड़ो, खुलकर जियो, नाचो, गाओ! जीवन तुम्हारा है—इसे किसी और के डर में मत गंवाओ!
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