आदमी चलता ही रहता है! हार में, जीत में, सफलता में, असफलता में… वह क्या है जो उसे चलाए रखता है? अहंकार और आशा!
ध्यान से सुनो!
आदमी चलता ही रहता है… कभी नहीं रुकता।
कोई पहाड़ की चोटी पर पहुँच जाए, तब भी वह शांति से नहीं बैठ सकता।
कोई गहरी खाई में गिर जाए, तब भी वह अगले ही क्षण संभलने की कोशिश करता है।
ऐसा क्या है जो आदमी को कभी थकने नहीं देता?
ऐसा क्या है जो उसे भागते रहने के लिए मजबूर करता है?
ओशो कहते हैं— अहंकार और आशा!
लेकिन रुको…
क्या तुमने कभी सोचा है कि यह अहंकार क्या है?
क्या तुमने कभी अनुभव किया है कि यह आशा कहाँ से आती है?
क्या तुम वाकई इनसे मुक्त होना चाहते हो?
अगर हाँ, तो ध्यान से देखो—
1. आदमी के रुक न पाने का रहस्य
तुम अपने आप को देखो—
तुम बचपन में सोचते थे, "जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तब जीवन बेहतर होगा!"
फिर जवानी आई, तो सोचा, "जब मैं अमीर हो जाऊँगा, तब शांति मिलेगी!"
फिर अमीरी आई, तो लगा, "अब मुझे प्रसिद्धि चाहिए!"
फिर प्रसिद्धि आई, तो लगा, "अब मुझे आध्यात्मिक ज्ञान चाहिए!"
और फिर तुम संत बनने निकल पड़े…
लेकिन ओशो कहते हैं— "यह सब एक ही दौड़ है, सिर्फ नाम बदलते रहते हैं!"
तुम सोचते हो कि तुम आगे बढ़ रहे हो, लेकिन यह वही गोल चक्कर है, जो हर किसी ने सदियों से दोहराया है।
2. अहंकार: आदमी की सबसे बड़ी भूख
अहंकार क्या है?
ओशो कहते हैं, "अहंकार कोई ठोस चीज़ नहीं है, यह बस तुम्हारी कल्पना का एक बुलबुला है!"
- जब कोई कहता है, "मैं यह कर सकता हूँ!"
- जब कोई कहता है, "मैं यह नहीं कर सकता!"
- जब कोई कहता है, "मैं महान हूँ!"
- जब कोई कहता है, "मैं तुच्छ हूँ!"
यह सब अहंकार है!
तुम सोचते हो कि अहंकार सिर्फ श्रेष्ठता में है, लेकिन नहीं!
अहंकार तो हीन भावना में भी है।
अहंकार सिर्फ "मैं महान हूँ" में नहीं है, अहंकार "मैं बेकार हूँ" में भी है।
ध्यान से देखो…
- जब तुम जीतते हो, तो अहंकार कहता है— "अब और ऊँचा जाना है!"
- जब तुम हारते हो, तो अहंकार कहता है— "अब खुद को साबित करना है!"
- जब तुम सफल होते हो, तो अहंकार कहता है— "तुम खास हो!"
- जब तुम असफल होते हो, तो अहंकार कहता है— "तुम्हें और मेहनत करनी चाहिए!"
तो क्या तुम अहंकार से बच सकते हो?
ओशो कहते हैं, "हाँ, अगर तुम देख पाओ कि यह सिर्फ एक खेल है!"
देखना शुरू करो—
जो तुम्हारे अंदर "मैं-मैं" कर रहा है, वह असली तुम नहीं हो।
जो तुम्हारे अंदर "यह करो, वह करो" की आवाज़ दे रहा है, वह असली तुम नहीं हो।
तुम जब तक इसे देख नहीं लेते, तुम इससे मुक्त नहीं हो सकते।
3. आशा: आदमी की सबसे बड़ी लत
आशा क्या है?
ओशो कहते हैं, "आशा सबसे बड़ा धोखा है, लेकिन सबसे मीठा भी!"
अगर तुम मर रहे हो, तो आशा कहती है— "चिंता मत करो, अगला जन्म अच्छा होगा!"
अगर तुम दुखी हो, तो आशा कहती है— "चिंता मत करो, कल खुशी आएगी!"
अगर तुम अकेले हो, तो आशा कहती है— "कोई तुम्हारे जीवन में जरूर आएगा!"
आशा कभी तुम्हें इस पल में रहने नहीं देती।
ओशो कहते हैं, "आशा का दूसरा नाम 'भविष्य' है!"
जो व्यक्ति हमेशा भविष्य में जीता है, वह कभी भी "अभी" में नहीं जी सकता। और जो अभी में नहीं जी सकता, वह कभी भी जीवन को महसूस नहीं कर सकता।
अब तुम सोचोगे— "अगर आशा छोड़ दी, तो फिर क्या करें?"
ओशो कहते हैं— "कुछ भी मत करो, बस देखो!"
जब तुम देख लेते हो कि आशा तुम्हें धोखा दे रही है, तो तुम्हें कुछ करने की जरूरत नहीं।
वह अपने आप गिर जाएगी, जैसे सूखे पत्ते हवा में गिर जाते हैं।
4. क्या कोई इस दौड़ से बाहर आ सकता है?
हाँ, लेकिन केवल वही जो पूरी तरह से जाग गया है!
जिसने यह देख लिया कि…
- यह दौड़ व्यर्थ है।
- यह संघर्ष अनावश्यक है।
- यह आगे बढ़ना एक भ्रम है।
वही रुक सकता है।
ओशो कहते हैं, "जो वास्तव में देख सकता है, वही वास्तव में रुक सकता है!"
जब तुम देख लेते हो कि—
"कुछ भी पाने को नहीं है, कुछ भी सिद्ध करने को नहीं है, कुछ भी साबित करने को नहीं है,"
तब तुम्हारे अंदर एक गहरी शांति जन्म लेती है।
5. ध्यान: इस दौड़ से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका
ओशो का पूरा ध्यान 'ध्यान' पर है।
ध्यान का अर्थ है— रुक जाना।
ध्यान का अर्थ है— देखना, बिना भागे।
जब तुम ध्यान में बैठते हो, तो अचानक सब बदल जाता है।
अचानक, न अहंकार रह जाता है, न आशा।
अचानक, न भविष्य बचता है, न अतीत।
अचानक, सिर्फ एक चीज़ रह जाती है— शांति!
ओशो कहते हैं, "ध्यान आदमी को उसकी असली प्रकृति से जोड़ता है।"
जब तुम ध्यान में उतरते हो, तो तुम पाते हो कि—
- तुम्हें कहीं नहीं जाना है।
- तुम्हें कुछ सिद्ध नहीं करना है।
- तुम्हें कुछ बनना नहीं है।
तब पहली बार आदमी वास्तव में जीता है!
6. निष्कर्ष: अब क्या करना चाहिए?
अब सवाल यह नहीं है कि "अहंकार और आशा हमें चलाते हैं"
अब सवाल यह है कि "क्या हम देख सकते हैं कि यह खेल क्या है?"
ओशो कहते हैं, "जिस दिन तुम इस खेल को देख लोगे, उसी दिन तुम्हारा जीवन बदल जाएगा!"
तब तुम जीवन में तो रहोगे, लेकिन जीवन तुम पर हावी नहीं होगा।
तब तुम काम करोगे, लेकिन काम तुम्हें गुलाम नहीं बनाएगा।
तब तुम चलोगे, लेकिन दौड़ में नहीं फँसोगे।
और वही सच्ची शांति है। वही सच्ची मुक्ति है।
ओशो कहते हैं—
"अब ठहरो, देखो, और हंसो… क्योंकि यह सब सिर्फ एक लीला है!"🚀🔥
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