🕉️ "भगवान कोई समाधान नहीं है, वह स्वयं एक समस्या है"
प्रिय आत्मन,
मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या क्या है?
वह समस्याओं का समाधान नहीं चाहता —
वह एक छद्म समाधान चाहता है।
वह ऐसा उत्तर चाहता है जो उसे संतोष दे दे,
भले ही वह उत्तर झूठा ही क्यों न हो।
और इस नकली संतोष का सबसे बड़ा नाम है — “भगवान।”
🔥 “भगवान” — समाधान या भ्रम का आवरण?
ध्यान दो —
जब भी तुम किसी प्रश्न से टकराते हो —
जैसे “जीवन क्या है?”,
“मृत्यु के बाद क्या होता है?”,
“दुख क्यों है?”,
तो तुम एक तुरंत उत्तर चाहते हो।
क्यों?
क्योंकि प्रश्न तुम्हारे भीतर कंपकंपी पैदा करता है।
तुम्हारा ‘मैं’ हिल जाता है।
असुरक्षा जाग जाती है।
और तुरत ही तुम एक शब्द थाम लेते हो —
"भगवान जानता है।"
"सब कुछ उसी की मर्जी से होता है।"
यह एक पलायन है —
सामना नहीं है।
🌪️ जब तक “भगवान” था, तब तक खोज नहीं थी।
ओशो कहते हैं —
“जैसे ही तुमने भगवान को पकड़ लिया, तुमने जीवन के रहस्यों को जानने की यात्रा बंद कर दी।”
भगवान बना नहीं,
भगवान बनाया गया है —
मानव मन की बेचैनी से,
उसके डर से,
उसकी अपूर्णता से।
यह कोई अस्तित्वगत सच्चाई नहीं —
यह एक मानसिक रचना है।
तुम्हारे “भगवान” को तुम्हारे भय ने जन्म दिया है।
🔍 भगवान — समस्या क्यों है?
क्योंकि वह तुम्हें खोज से रोकता है।
तुम बीमार हो,
पर डॉक्टर के पास जाने के बजाय तुम मंदिर चले जाते हो।
तुम जीवन में भटक गए हो,
पर मार्ग देखने के बजाय तुम भाग्य और ईश्वर की इच्छा में समाधान खोजते हो।
भगवान तुम्हारी जीवंतता को मार देता है।
तुम्हें गुलाम बना देता है।
तुम्हें सिखाया जाता है —
“जो हुआ, भगवान की इच्छा से हुआ।”
यानी न विद्रोह करो,
न बदलो,
न सवाल उठाओ।
⚔️ और यही वजह है कि धर्मों ने युद्ध करवाए, प्रेम को रोका, वैज्ञानिकों को जलाया।
ध्यान दो —
जब गैलीलियो ने कहा कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है,
तो चर्च ने कहा — "यह ईश्वर का अपमान है!"
जब ब्रूनो ने कहा कि ब्रह्मांड अनंत है,
तो उसे जिंदा जला दिया गया।
क्यों?
क्योंकि भगवान की जो छवि उन्होंने बनाई थी,
वह इन तथ्यों से हिलने लगी थी।
भगवान की कल्पना एक दीवार बन जाती है — जो न सत्य को आने देती है, न झूठ को जाने देती है।
🧱 भगवान — स्वतंत्रता का अंत है।
ओशो कहते हैं —
“अगर भगवान है, तो तुम नहीं हो सकते।
और अगर तुम हो, तो भगवान नहीं हो सकता।”
क्यों?
क्योंकि अगर तुम कहते हो कि सब कुछ भगवान की मर्जी से होता है,
तो फिर तुम्हारे कर्मों की कोई जिम्मेदारी नहीं बचती।
तुमने किसी को मारा —
“भगवान ने करवाया।”
तुमने किसी से प्रेम किया —
“भगवान की इच्छा।”
तुम्हारे भीतर से विवेक मर जाता है।
यह बहुत सूक्ष्म ज़हर है।
🌿 सत्य क्या है?
ओशो कहते हैं —
“ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है, कोई सत्ता नहीं है —
वह तो केवल एक प्रतीक है।
प्रतीक तुम्हारी अधूरी समझ का।"
जब तक तुम जान नहीं पाते,
तब तक “भगवान” तुम्हारा सहारा है।
लेकिन जो जान लेता है,
वह कहता है —
“अब कोई भगवान नहीं, अब केवल मौन है।”
🎯 भगवान को मारना होगा — ताकि तुम स्वयं को जन्म दे सको।
ओशो कहते हैं —
“भगवान को बाहर से हटाओ, तभी भीतर सत्य प्रकट होगा।”
जब तक तुम “ऊपर वाले” को देख रहे हो,
तब तक तुम “भीतर वाले” को नहीं देख सकते।
परमात्मा बाहर नहीं है —
वह तुम्हारी चेतना की ऊँचाई है।
जब तुम जागते हो,
जब तुम स्वतंत्र होते हो,
जब तुम मौन में उतरते हो —
तो जो प्रकट होता है,
उसे तुम “ईश्वर” कह सकते हो,
पर वह कोई व्यक्ति नहीं — स्थिति है।
🪷 मूर्तियों का धर्म — मृत धर्म।
तुम मंदिर में जाओ —
भगवान वहाँ भी है।
मस्जिद में जाओ —
भगवान वहाँ भी।
लेकिन वह कहाँ नहीं है?
तुम्हारे भीतर नहीं है।
क्यों?
क्योंकि तुमने उसे किसी पंडित की पूजा में,
किसी मुल्ला की तकरीर में खो दिया है।
“मूर्ति पूजा, ग्रंथ पूजा, अंध श्रद्धा — यह सब डर की उपज है।”
तुम्हारे मन में अगर साहस हो —
तो तुम मंदिर नहीं जाओगे —
तुम मौन में बैठोगे।
🕊️ ईश्वर की जगह प्रश्न को रखो — तभी उत्तर प्रकट होगा।
ओशो कहते हैं —
“जहाँ उत्तर है, वहाँ मृत्यु है।
जहाँ प्रश्न है — वहाँ जीवन है।”
“भगवान” एक बंद दरवाजा है।
प्रश्न एक खुला द्वार है।
जब तुम कहते हो — “भगवान जानता है,”
तब तुम खोज बंद कर देते हो।
जब तुम कहते हो —
“मैं नहीं जानता,
लेकिन मैं जानना चाहता हूँ,”
तब तुम ध्यान की दिशा में बढ़ते हो।
🌌 ध्यान — बिना भगवान के भी परमात्मा की खोज।
ध्यान में कोई ‘ऊपर वाला’ नहीं होता —
तुम होते हो, तुम्हारी साँस होती है, मौन होता है।
और जब यह मौन गहराता है,
तब एक अनुभव घटता है —
जिसे कोई “ईश्वर” कह सकता है,
कोई “शून्य”,
कोई “ब्रह्म।”
पर वह कोई सत्ता नहीं है,
कोई चेहरा नहीं,
कोई मूर्ति नहीं।
वह अनुभूति है।
💡 ओशो का एक आखिरी झटका
ओशो ने एक बार कहा —
“भगवान सबसे बड़ा भ्रम है —
और धार्मिक व्यक्ति वही है जो इस भ्रम से मुक्त हो गया है।”
यह वाक्य पहली बार सुनने में बहुत कड़वा लगता है।
लेकिन जो इसकी गहराई में जाता है,
वह देखता है —
कि ओशो हमें किसी “नास्तिकता” की ओर नहीं ले जा रहे हैं —
बल्कि अंध-श्रद्धा से परे सत्य की आँखें खोल रहे हैं।
🧘 तो क्या करें?
मत मानो —
देखो।
मत भरोसा करो —
जाँचो।
मत पूजा करो —
प्रेम करो।
कोई “ईश्वर” नहीं है जो तुम्हें बचाएगा —
तुम ही हो अपने उद्धार के निर्माता।
📜 अंतिम सूत्र:
“भगवान कोई समाधान नहीं —
वह समस्या है जब तक तुम उसे बाहर खोजते हो।वह समाधान तभी बनता है जब तुम उसे भीतर खोजते हो —
और वह ‘ईश्वर’ नहीं रह जाता,
वह मौन, वह प्रेम, वह चेतना बन जाता है।”
✨ ओम् सत्याय नमः।
❓ FAQs – भगवान: समाधान या समस्या?
Q1. "भगवान स्वयं एक समस्या है" इस कथन का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ यह है कि जब हम हर सवाल, डर या समस्या का उत्तर "भगवान करेगा" में खोजते हैं, तो हम अपनी जिम्मेदारी और सोच को छोड़ देते हैं। यह अंधविश्वास और निष्क्रियता को जन्म देता है।
Q2. क्या यह कथन नास्तिकता को बढ़ावा देता है?
उत्तर: नहीं जरूरी नहीं। यह कथन आस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि अंधआस्था के विरुद्ध है। यह हमें सोचने के लिए प्रेरित करता है कि हम अपनी समस्याओं का हल खुद खोजें, न कि सब कुछ भगवान पर छोड़ दें।
Q3. क्या यह विचार धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाता है?
उत्तर: यह विचार आलोचना नहीं, बल्कि बौद्धिक मंथन है। इसका उद्देश्य है यह सवाल उठाना कि क्या हम भगवान के नाम पर अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं?
Q4. क्या भगवान को समस्या कहना ईश्वर की सत्ता को नकारना है?
उत्तर: नहीं। इसका आशय यह है कि जब भगवान का विचार डर, भेदभाव, या नियंत्रण का माध्यम बन जाता है, तब वह समस्या बन जाता है। असली ईश्वर प्रेम, करुणा और आत्मबोध का स्रोत होता है।
Q5. क्या समाज में इस तरह के विचारों के लिए जगह है?
उत्तर: हाँ, एक प्रबुद्ध और लोकतांत्रिक समाज में हर विचार की जगह होनी चाहिए। ऐसे विचार सोचने की स्वतंत्रता और मानसिक विकास को बढ़ावा देते हैं।
Q6. व्यक्ति को भगवान के बजाय कहाँ समाधान खोजना चाहिए?
उत्तर: समाधान स्वयं के भीतर, तर्क, अनुभव और मानवता में खोजा जाना चाहिए। जब हम जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं, तभी सच्चा समाधान मिलता है।
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