नीचे प्रस्तुत है एक प्रवचन, जिसमें यह उद्घोष है कि बाहरी संसार को त्यागना, हमारी आत्मा की खोज से दूर जाना नहीं है, बल्कि यह हमें उस गहन चेतना की ओर ले जाता है जहाँ से असली मुक्ति की अनुभूति होती है।

प्रिय मित्रों,

आज मैं आपसे एक ऐसे रहस्य के बारे में बात करने जा रहा हूँ, जिसे समझने के लिए हमें पहले अपने भीतर झाँकना होगा। अक्सर हम यह सोचते हैं कि संसार से दूर जाना, समाज से कट जाना या भौतिकता के जाल से निकलना, यही सच्ची मुक्ति है। परन्तु ऐसा नहीं है। जैसा कि ओशो ने कहा – "संसार को छोड़ने से तुम स्वयं को न जान सकोगे, स्वयं को जान लोगे तो संसार अपने आप छुट जाएगा।" यह एक गूढ़ सत्य है, जो हमारे जीवन के सबसे बड़े प्रश्न – 'मैं कौन हूँ?' के उत्तर की कुंजी है।

बाहरी संसार और आंतरिक संसार का द्वंद्व

हमारे जीवन में दो प्रमुख क्षेत्र होते हैं – एक, बाहरी संसार जो कि हमारे आसपास के भौतिकता, समाज और दैनिक व्यस्तताओं से भरा हुआ है; और दूसरा, आंतरिक संसार जो हमारे भीतर छुपे अनंत, गहरे और अद्वितीय सच से परिपूर्ण है। बाहरी संसार में हम अपने काम, अपनी जिम्मेदारियों, अपनी इच्छाओं में इतने उलझ जाते हैं कि असल में हम भूल जाते हैं कि हमारी पहचान कहाँ से शुरू होती है। हम अपनी असली प्रकृति को भूलकर केवल एक सामाजिक प्राणी बन जाते हैं, एक ऐसी छवि जिसमें हमारी आत्मा की आवाज़ दब जाती है।

आधुनिक जीवन में हम निरंतर भागदौड़ में रहते हैं। काम की दौड़, परिवार की जिम्मेदारियाँ, सामाजिक अपेक्षाएँ – ये सभी चीजें हमें अपनी आत्मा की उस गहराई से दूर कर देती हैं जहाँ हमारी सच्ची पहचान वास करती है। हम मान लेते हैं कि यह सब ज़रूरी है, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि असल में हमारी पहचान, हमारी आत्मा, हमें इन सब से ऊपर उठकर कुछ और ही बनाती है? हमें अपनी आत्मा से जुड़ना होगा, उसे समझना होगा, तभी हम जान पाएंगे कि संसार की वास्तविकता क्या है।

आत्मा की खोज: बाहरीता से मुक्ति की दिशा

जब हम कहते हैं कि संसार को त्याग दो, इसका मतलब यह नहीं कि हम अपने प्रियजनों से कट जाएँ, अपने कार्यों से दूर हो जाएँ या समाज से अलग हो जाएँ। इसका मतलब है कि हम उन सभी बाहरी वस्तुओं, इच्छाओं और व्यस्तताओं के पीछे छुपे उस असली सत्य से अनजान हो जाते हैं। बाहरीता में खो जाने से हम अपने भीतर की शांति, अपनी आत्मा के उस गहरे अर्थ से दूर हो जाते हैं। ध्यान, आत्म-जागरूकता और स्व-अन्वेषण के माध्यम से ही हम उस सत्य के निकट पहुँच सकते हैं जो हमारे भीतर छिपा है।

जब हम अपने आप को समझते हैं – अपने दुःख, अपने आनंद, अपनी कमजोरियों और क्षमताओं को – तब ही हमें यह एहसास होता है कि संसार वास्तव में एक भ्रम है। इस भ्रम को तोड़कर हम देख सकते हैं कि हमारी असली पहचान क्या है। यह पहचान हमें उस असीम ऊर्जा, उस अनंत चेतना से जोड़ती है जो हमारे भीतर हमेशा से विद्यमान थी।

आधुनिक जीवन की जटिलताएँ और प्राचीन ज्ञान का संगम

आधुनिक जीवन की जटिलताओं में हम इतने उलझ जाते हैं कि हमें प्राचीन ज्ञान की झलक ही नहीं दिखती। हमारी सोच इतनी बाधित हो जाती है कि हम हर चीज को मात्र बाहरी रूप में देखते हैं – पैसा, पदवी, सफलता। लेकिन प्राचीन गुरुओं ने हमें सिखाया है कि वास्तविकता केवल बाहरी नहीं होती। वे कहते थे कि जब आप ध्यान लगाते हैं, तो आप अपने भीतर के उस उजाले को देख सकते हैं जो हर अंधेरे को मिटा देता है।

प्राचीन शास्त्र, उपनिषद, गीता – ये सभी हमें यही संदेश देते हैं कि आत्मा की खोज, स्वयं की समझ ही सबसे बड़ी मुक्ति है। ओशो की भाषा में कहें तो, यह एक ऐसी क्रांति है, जो आपके भीतर से शुरू होती है और धीरे-धीरे आपके सम्पूर्ण अस्तित्व को बदल देती है। बाहरी दुनिया की हर छोटी-बड़ी चीज़, चाहे वह सफलता हो या विफलता, प्रेम हो या दु:ख – जब आप अपने आप को समझ लेते हैं, तो ये सभी चीजें अपने आप गायब हो जाती हैं। आप एक ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं जहाँ न तो खुशी की आवश्यकता होती है और न ही दुःख का अनुभव।

ध्यान: आत्म-जागरूकता की कुंजी

ध्यान, एक ऐसा साधन है जो आपको बाहरी दुनिया के शोर से अलग, अपने भीतर की शांतिपूर्ण नदी तक ले जाता है। ध्यान के माध्यम से आप अपने विचारों, अपनी भावनाओं, अपने अस्तित्व के उस अदृश्य पहलू को जान पाते हैं, जिसे शब्दों में बांधना कठिन है। जब आप ध्यान करते हैं, तब आपका मन बाहरी विकारों से मुक्त हो जाता है और आप उस अनंत जागरूकता से जुड़ जाते हैं जो आपके भीतर है।

कल्पना कीजिए कि आप एक शांत झील के किनारे बैठे हैं। चारों ओर हरियाली है, पंछियों की चहचहाहट है, और पानी की लहरें धीरे-धीरे किनारे को छू रही हैं। यदि आप इस दृश्य में ध्यान लगाते हैं, तो आप महसूस करेंगे कि आपके भीतर की अशांति धीरे-धीरे शांत हो जाती है। इसी प्रकार, ध्यान आपको आपके भीतर की उस शांति से जोड़ता है जहाँ संसार के सभी भ्रम अपने आप गायब हो जाते हैं।

गहरी कहानियाँ और प्रतीक

एक बार की बात है, एक गांव में एक वृद्ध साधु रहते थे। गांव के लोग उन्हें बहुत मानते थे, परन्तु साधु अपने आप में इतने मग्न रहते थे कि किसी से बहुत कम बातें करते थे। एक दिन एक युवा उनके पास आया और पूछा, "गुरुजी, संसार से दूर रहना क्या मुक्ति है?" वृद्ध साधु ने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, तुम यह समझते हो कि संसार को त्यागने से तुम मुक्त हो जाओगे, परन्तु असली मुक्ति तो उस आत्मा की खोज में है, जो हर किसी में विद्यमान है।" युवा ने पूछा, "कैसे?" साधु ने उत्तर दिया, "जब तुम अपने भीतर झाँकोगे, अपने मन, अपने विचारों की गहराई में उतरोगे, तभी तुम पाएगे कि संसार का असली सार क्या है।" यह कहानी हमें यह बताती है कि बाहरी दुनिया की भौतिकता में उलझकर हम अपने असली स्वरूप को खो देते हैं।

एक और प्रतीक जो अक्सर सामने आता है, वह है – मृदु और कठोर का समागम। जीवन में हम अक्सर मृदुता को कमजोरी समझते हैं, परन्तु असल में वही मृदुता हमें आंतरिक शक्ति प्रदान करती है। जब हम अपने मन को शांत कर, अपने भीतर की आवाज़ को सुनते हैं, तो हमें एहसास होता है कि वही मृदुता ही हमारे अस्तित्व की असली पहचान है। यह प्रतीक हमें बताता है कि जिस प्रकार पत्थर के बीच से नर्म मिट्टी निकल आती है, उसी प्रकार हमारे भीतर छुपी हुई आत्मा धीरे-धीरे प्रकट होती है।

बाहरी अपेक्षाएँ और आंतरिक सत्य

हमारी सामाजिक अपेक्षाएँ, हमारी परंपराएँ, यहाँ तक कि हमारे परिवार और मित्र भी अक्सर हमें बाहरी दुनिया के नियमों में बांध लेते हैं। हम समाज के बंधनों में इतने उलझ जाते हैं कि असल में हम भूल जाते हैं कि हमारी असली पहचान क्या है। यह एक प्रकार की झूठी मुक्ति है – हम मानते हैं कि समाज के नियमों का पालन करने से ही हमें स्वीकार्यता मिलेगी, परन्तु जब हम अपने आप को समझते हैं, तो यह स्वीकार्यता एक क्षणिक भ्रम हो जाती है।

सोचिए, एक पक्षी जो अपने घोंसले से बाहर निकलता है, क्या वह अपने आप को जान पाया? नहीं, क्योंकि उसका असली स्वरूप आकाश में उड़ना है। इसी प्रकार, हम भी एक उन्मुक्त आत्मा हैं, जो बाहरी जंजालों में फंसकर अपनी असली पहचान खो देते हैं। जब हम अपने भीतर की खोज शुरू करते हैं, तो हमें एहसास होता है कि हम किसी सीमा में बंधे नहीं हैं। हमारा अस्तित्व स्वयं में अनंत है, अनंत संभावनाओं से भरा है। यही वह सत्य है जो हमें अपने भीतर की गहराई में जाकर महसूस करना चाहिए।

आधुनिक जीवन के विकार और समाधान

आधुनिक जीवन में तकनीक, सोशल मीडिया, और व्यस्तता ने हमें उस वास्तविकता से दूर कर दिया है जो हमारी आत्मा में वास करती है। हम अपने जीवन के हर क्षण को स्क्रीन की चमक, बाहरी दुनिया के अपडेट्स, और सामाजिक अपेक्षाओं में उलझा लेते हैं। इसने हमारे मन को इतना भ्रमित कर दिया है कि हम भूल जाते हैं कि वास्तविक खुशी और शांति हमारे भीतर ही निहित है।

जब हम अपने आप से प्रश्न करते हैं – "मैं यहाँ क्यों हूँ? मेरी असली इच्छा क्या है?" – तब हमें महसूस होता है कि हर वह चीज़ जो हमने हासिल की, वह केवल बाहरी थी। असली संतोष तब मिलता है जब हम अपने भीतर की उस असीम चेतना से जुड़ते हैं। आधुनिक जीवन की इस भीड़ में, ध्यान और आत्म-अन्वेषण ही वे उपकरण हैं जो हमें उस आंतरिक शांति की ओर ले जाते हैं।

प्रतीकों का महत्व और उनके माध्यम से संदेश

कई बार प्रतीक हमें शब्दों से कहीं अधिक समझाते हैं। उदाहरण के लिए, एक नदी का प्रवाह न केवल पानी का प्रवाह है, बल्कि यह जीवन के निरंतर परिवर्तन और प्रवाह का प्रतीक भी है। जब हम नदी के किनारे बैठकर उसकी लहरों को देखते हैं, तो हमें एहसास होता है कि जैसे पानी बिना रुके बहता है, वैसे ही हमारी आत्मा भी लगातार प्रवाहित हो रही है।

उसी प्रकार, एक चिराग की ज्योति न केवल प्रकाश का स्रोत है, बल्कि यह अज्ञान के अंधकार को दूर करने का प्रतीक भी है। जब हम अपने भीतर की उस ज्योति को पहचानते हैं, तो हम समझते हैं कि बाहरी संसार की सभी वस्तुएँ, सभी अपेक्षाएँ एक क्षणिक भ्रम मात्र हैं। वास्तविकता वही है, जो हमारे भीतर की शांति में समाहित है।

कथा: आत्मा की उड़ान

एक बार की बात है, एक छोटे से गाँव में एक लड़का रहता था। वह हर दिन अपने खेतों में काम करता, अपने माता-पिता की सहायता करता, परंतु उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। वह हमेशा महसूस करता कि कहीं और, कहीं और उसकी आत्मा उसे पुकार रही है। एक दिन उसने अपने गुरु से पूछा, "गुरुजी, मैं इस संसार में क्यों हूं? क्या मेरे जीवन का कोई और मकसद नहीं है?" गुरु ने एक हल्की सी मुस्कान के साथ जवाब दिया, "बेटा, तुम्हारा जीवन एक पंख है, और तुम्हारी आत्मा उस पंख की उड़ान। जब तुम अपनी आत्मा को पहचानोगे, तो यह पंख स्वतः तुम्हें आकाश की ओर ले जाएंगे।" उस दिन से लड़के ने ध्यान करना शुरू किया। धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि उसकी असली पहचान उसकी आत्मा में निहित थी। उसे समझ में आया कि बाहरी दुनिया के झमेलों में उलझकर उसने अपनी आत्मा की आवाज़ को खो दिया था। यही वह अनुभव था, जिसने उसे बताया कि सच्ची मुक्ति अपने आप को जानने में निहित है।

आत्म-अन्वेषण की प्रक्रिया

आत्म-अन्वेषण एक यात्रा है, एक ऐसी यात्रा जो हमारे भीतर के अनंत समुद्र की ओर ले जाती है। इस यात्रा में हमें अपने अतीत के झूठे बंधनों, समाज की अपेक्षाओं, और भौतिकता के मोह से ऊपर उठना होता है। जब हम अपने मन को उस निरंतर चलने वाले विचारों के शोर से मुक्त करते हैं, तो हमें अपने भीतर की आवाज़ सुनाई देती है – वह आवाज़ जो बताती है कि तुम एक अनंत चेतना हो।

इस यात्रा में कई बाधाएँ आती हैं। कभी-कभी मन का अशांत होना, कभी आत्म-संदेह, और कभी बाहरी संसार के आकर्षण हमें अपनी ओर खींचते हैं। परंतु याद रखिए, यह सब क्षणिक हैं। जैसे बादल छँट जाते हैं और सूरज फिर चमकता है, वैसे ही जब आप अपने भीतर की गहराई में उतरते हैं, तो सभी बाधाएँ अपने आप गायब हो जाती हैं।

ध्यान रखें, इस प्रक्रिया में कोई जल्दबाज़ी नहीं होती। आत्मा की खोज एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे समय, धैर्य और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। यह एक लंबी यात्रा है, परंतु जब आप इस यात्रा को शुरू करते हैं, तो हर कदम पर आप अपने भीतर की उस अनंत शक्ति को पहचानने लगते हैं जो आपको संसार के झमेलों से मुक्त कर देती है।

बाहरी संसार से मुक्ति: एक नया दृष्टिकोण

जब हम बाहरी संसार के जाल से बाहर निकलते हैं, तो हम एक नया दृष्टिकोण पाते हैं। यह दृष्टिकोण हमें बताता है कि वास्तविकता केवल बाहरी उपलब्धियों, धन-दौलत या सामाजिक प्रतिष्ठा में नहीं है। असली खुशी, असली संतोष तो उस गहरी आत्मा में है, जिसे हमने अनदेखा कर दिया था। जब आप अपने भीतर की उस आवाज़ को सुनते हैं, तो आपको अहसास होता है कि दुनिया के सभी भ्रम, सभी अपेक्षाएँ एक क्षणिक खेल मात्र हैं।

इस नए दृष्टिकोण से जब आप संसार को देखते हैं, तो हर वस्तु, हर व्यक्ति एक प्रतीक के रूप में उभरता है। एक फूल अपनी सुगंध और रंग-बिरंगी छटा से आपको यह याद दिलाता है कि जीवन में सुंदरता हर जगह है। एक पत्थर, जो शायद कहीं टूट कर गिरा हो, आपको यह सिखाता है कि स्थायित्व और मजबूती भीतर से आती है, बाहरी रूप से नहीं। यही वह संदेश है जो हमें आत्मा की खोज के माध्यम से मिलता है – बाहरीता की सारी जटिलताएँ और मोह एक क्षणिक भ्रम हैं, जबकि असली मुक्ति आपके भीतर ही निहित है।

भावनात्मक संवेदना और गहन कहानियाँ

हर एक व्यक्ति के जीवन में कुछ ऐसे क्षण आते हैं जो उसकी आत्मा को झकझोर देते हैं। यह वे क्षण होते हैं जब आप किसी अदृश्य शक्ति से जुड़े हुए महसूस करते हैं, जब आपके भीतर एक ऐसी गहराई उठती है जिसे शब्दों में बांधना असंभव हो जाता है। यही वे क्षण होते हैं जब आप समझते हैं कि आप सिर्फ एक शारीरिक प्राणी नहीं, बल्कि एक अनंत चेतना हैं।

कल्पना कीजिए, एक सर्दी की सुबह में जब धुंध छाई हुई हो, और हर तरफ ठंड की चुप्पी हो, तभी आपका मन अपने भीतर के उस गर्मी को महसूस करता है। यह गर्मी आपके भीतर की वह आग है, जो आपको याद दिलाती है कि आपका अस्तित्व किसी बाहरी तत्व पर निर्भर नहीं, बल्कि आपकी आत्मा के उस अनंत प्रकाश पर आधारित है। यह अनुभव आपको बताता है कि बाहरी संसार की सभी घटनाएँ, चाहे वह सुख हो या दुःख, केवल एक दृश्य मात्र हैं, और असली सत्य आपके भीतर छिपा है।

एक और कहानी है – एक यात्री जो निरंतर अपने जीवन में कहीं न कहीं खोया रहता था। वह हर रोज़ अपने आप से यह प्रश्न करता था कि क्या वह वास्तव में जी रहा है या सिर्फ समय के साथ बह रहा है? एक दिन उसने एक पुराने ऋषि से मिलना तय किया। ऋषि ने उसे यह समझाया कि जीवन का असली अर्थ उस क्षण में है जब आप अपने आप को पूरी तरह से समझते हैं। यात्री ने उस दिन से अपने जीवन की गति बदल दी। उसने देखा कि जब आप अपने भीतर की आवाज़ को सुनते हैं, तो हर वह वस्तु जो आपको लगता था कि ज़रूरी है – वह अचानक फीकी पड़ जाती है। यह कहानी हमें यह संदेश देती है कि सच्ची मुक्ति अपने आप को जानने में ही निहित है, और बाहरी संसार की हर बात तब तक महत्वपूर्ण नहीं रह जाती जब तक कि आप अपने भीतर की उस गहराई को नहीं समझते।

स्व-अन्वेषण का प्रतीकात्मक दृष्टिकोण

हमारी आत्मा की खोज एक प्रतीकात्मक यात्रा है, एक ऐसी यात्रा जिसमें हर कदम पर आपको कुछ नया देखने को मिलता है। यह यात्रा कभी-कभी एक दीवार की तरह प्रतीत होती है, जिसे पार करना मुश्किल होता है, परन्तु जैसे ही आप उस दीवार के पीछे की वास्तविकता को देखते हैं, आपको अहसास होता है कि वह दीवार सिर्फ एक भ्रम थी।

प्रतीक के माध्यम से आप समझ सकते हैं कि कैसे बाहरी संसार की सभी वस्तुएँ एक-एक करके गायब हो जाती हैं जब आप अपने भीतर की उस अनंत चेतना से जुड़ जाते हैं। एक पतंग का उड़ना, एक नदी का प्रवाह, यहाँ तक कि एक बूढ़े वृक्ष की जड़ें भी आपको यह समझाती हैं कि असली शक्ति और पहचान हमेशा आपके भीतर ही निहित है। यह प्रतीक आपको सिखाते हैं कि बाहरीता की सारी सजावटें केवल एक आवरण हैं, और असली सौंदर्य आपके भीतर की शुद्धता में छुपा है।

निष्कर्ष: सच्ची मुक्ति का रहस्य

प्रिय मित्रों, अंततः यह समझना आवश्यक है कि संसार को त्यागना मतलब अपने आप को त्यागना नहीं है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें आप अपने भीतर की उस अनंत चेतना से जुड़ते हैं, जिसे आपने लंबे समय से अनदेखा किया है। बाहरी संसार की व्यस्तताओं, भौतिकताओं और समाज की अपेक्षाओं में उलझ कर हम अपने आप को भूल जाते हैं। परंतु जब हम ध्यान, स्व-अन्वेषण और आत्म-जागरूकता के माध्यम से अपने भीतर की गहराई में उतरते हैं, तब हमें एहसास होता है कि असली मुक्ति वहीं है।

जब आप अपने आप को जान लेते हैं, तो आप समझ जाते हैं कि दुनिया के सभी मोह, सभी विकार केवल एक क्षणिक भ्रम हैं। आप एक ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं जहाँ न तो सुख की आवश्यकता होती है और न ही दुःख का अनुभव। आपके भीतर की शांति, आपका अस्तित्व, सब कुछ एक निरंतर प्रवाह की तरह होता है, जहाँ हर चीज़ एक दूसरे से जुड़ी हुई है।

यह वह समय है जब आप देखेंगे कि संसार अपने आप आपके चारों ओर से गायब हो गया है, क्योंकि अब आप केवल अपने भीतर के उस असीम प्रकाश को देख रहे हैं, जो आपको हर पल प्रेरित करता है। यह प्रकाश आपको बताता है कि आप एक अनंत आत्मा हैं, और आपका असली अस्तित्व उसी आत्मा में निहित है।

इस प्रवचन के माध्यम से मैं आपको यह संदेश देना चाहता हूँ कि अपने आप को समझें, अपने भीतर झाँकें, और उस अनंत चेतना को पहचानें जो आपको हमेशा से बुलाती आ रही है। बाहरी दुनिया की झलक, उसके मोह-माया, एक क्षणिक भ्रम मात्र हैं। असली जीवन, असली मुक्ति, उसी गहरी आत्मा में छुपी है जो आप में अनंत काल से विद्यमान है।

आत्म-साक्षात्कार की ओर एक कदम

आप सभी से मेरा निवेदन है कि एक दिन अपने व्यस्त जीवन से कुछ पल निकालें, चुपचाप बैठें और अपने भीतर की गहराई में उतरें। ध्यान करें, अपने विचारों को विश्राम दें, और उस शांत धारा की ओर देखें जो आपके भीतर बह रही है। धीरे-धीरे आप देखेंगे कि आपके मन की हर अराजकता अपने आप सिमटने लगेगी, और एक अद्भुत शांति आपके अंदर फैल जाएगी।

यह शांति न केवल आपके जीवन को बदल देगी, बल्कि आपको यह भी सिखाएगी कि वास्तविकता क्या है। जब आप इस शांति को महसूस करेंगे, तो आपको समझ में आएगा कि आप एक अनंत चेतना हैं, और यह चेतना ही आपका असली अस्तित्व है। बाहरी संसार की हर चीज़, चाहे वह सफलता हो या विफलता, प्रेम हो या दुःख, केवल एक पारंपरिक आवरण हैं, जो इस गहरी आत्मा की असली चमक को छिपा लेते हैं।

एक नवीन युग की शुरुआत

जब हम इस ज्ञान को अपनाते हैं, तो हम एक नवीन युग की शुरुआत करते हैं – एक ऐसा युग जहाँ बाहरीता की बाधाएँ मिट जाती हैं, और हम अपने वास्तविक स्वरूप में उभर आते हैं। यह वह युग है जहाँ मनुष्य न केवल अपनी भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करता है, बल्कि अपनी आत्मा की भी गहराई से यात्रा करता है। यह युग हमें सिखाता है कि असली खुशी बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर के उस अनंत प्रेम और शांति में है।

सोचिए, अगर हम सभी अपने भीतर की उस अनंत चेतना को पहचान लें, तो क्या होगा? उस समय समाज के सारे संघर्ष, सारी द्वंद्व विरामित हो जाएंगे। हम देखेंगे कि जिस प्रकार एक बूँद समुद्र का हिस्सा होती है, वैसे ही हमारा अस्तित्व उस विशाल, असीम समुद्र में विलीन हो जाता है। हम केवल एक झलक देखते हैं उस दिव्य एकता की, जो हर किसी में विद्यमान है।

प्रेरणा की एक आख़िरी पुकार

मित्रों, यह प्रवचन एक प्रेरणा की पुकार है – अपने आप को जानने, अपने भीतर की उस अनंत गहराई को समझने की पुकार। जब आप अपने भीतर झाँकेंगे, तो आप पाएंगे कि आपके अंदर वह शक्ति है, वह ज्ञान है, जो आपको बाहरी संसार के झमेले से ऊपर उठाने में सक्षम है।

याद रखिए, असली मुक्ति बाहरी संसार को त्यागने में नहीं, बल्कि अपने आप को जानने में निहित है। जब आप इस ज्ञान को समझ लेंगे, तो दुनिया के सारे मोह-माया अपने आप क्षीण हो जाएंगे। आप केवल उस अनंत चेतना के प्रकाश में जीने लगेंगे, जो आपको हर क्षण प्रेरित करती रहेगी।

अंतर्मन की पुकार

अंत में, मैं आपसे यही कहूँगा कि अपनी आत्मा की पुकार सुनें। जब आप अपने मन की गहराई में उतरेंगे, तो आपको एक ऐसी शांति मिलेगी जिसे कोई बाहरी घटना भंग नहीं कर सकती। वह शांति, वह असीम प्रेम, वह दिव्य प्रकाश – यह सब कुछ आपके भीतर ही है। इसे ढूँढने के लिए आपको बस अपने मन को शांत करना होगा, ध्यान करना होगा, और अपनी आत्मा के उस स्वर को सुनना होगा।

मुझे विश्वास है कि जब आप इस यात्रा पर निकलेंगे, तो हर एक कदम पर आपको स्वयं की गहराई का एहसास होगा। आप देखेंगे कि आपकी आत्मा, जो अनंत है, उसी अनंत प्रकाश में विलीन हो जाती है। बाहरी संसार की सारी भौतिकताएँ, सारी व्यस्तताएँ एक पल में फीकी पड़ जाती हैं, और आप केवल एक दिव्य चेतना के रूप में उभरते हैं।

उपसंहार

यह प्रवचन, यह आह्वान, हमें यही सिखाता है कि बाहरी संसार की झंझटों से दूर जाकर अपने भीतर की गहराई में उतरना ही सच्ची मुक्ति है। ओशो ने जो संदेश दिया है, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कभी था। हमें अपने जीवन के उन क्षणों को संजोना होगा जब हम अपने आप को समझ पाते हैं, जब हम अपने भीतर की उस अनंत शक्ति को पहचान पाते हैं।

संसार को त्यागने का अर्थ यह नहीं कि हम अपने प्रियजनों से, अपने कर्तव्यों से दूर हो जाएँ, बल्कि इसका अर्थ है कि हम उन बाहरी अपेक्षाओं और भौतिकताओं के बंधनों से ऊपर उठकर अपनी असली पहचान को खोजें। यही वह समय है जब आपका अस्तित्व अपने आप में पूर्ण हो जाता है, और दुनिया के सारे भ्रम अपने आप छिन जाते हैं।

मैं आप सभी से यही आग्रह करता हूँ कि इस जीवन की भागदौड़ से थोड़ा विराम लें, ध्यान में बैठें, और अपने भीतर की आवाज़ सुनें। उस आवाज़ में छुपा है आपका असली स्व – एक अनंत, अविनाशी और असीम चेतना, जो आपको हर पल प्रेरित करती रहती है।

इस प्रवचन में हमने आधुनिक जीवन की जटिलताओं, बाहरी अपेक्षाओं, और सामाजिक बंधनों को पीछे छोड़कर आत्मा की खोज की उस अनंत यात्रा का वर्णन किया है, जो हमें वास्तविक मुक्ति की ओर ले जाती है। जब हम अपने भीतर की उस असीम चेतना से जुड़ जाते हैं, तब हमें पता चलता है कि संसार की सारी भौतिकताएँ एक क्षणिक खेल मात्र हैं। असली जीवन, असली खुशी तो उसी गहरी आत्मा में छुपी है, जिसे समझने के बाद हर चीज़ अपने आप साफ़-साफ़ नजर आने लगती है।

मित्रों, आज जब भी आप अपने दिनचर्या की भागदौड़ में उलझ जाएँ, तो एक पल के लिए रुककर अपने भीतर की आवाज़ सुनें। यह आवाज़ आपको उस अनंत प्रकाश की याद दिलाएगी, जो हर चीज़ में विद्यमान है। अपने भीतर झाँकिए, और पाईए उस गहरी शांति, उस अनंत प्रेम को, जो आपको बताता है कि आप एक अनंत चेतना हैं, और यही चेतना ही आपकी असली पहचान है। 

यही है वो सत्य, जिसे समझने के बाद आपको न तो संसार की परवाह रहेगी और न ही उसके मोह-माया का बंधन। आप केवल एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाएंगे, जहाँ हर चीज़ अपने आप स्पष्ट हो जाएगी, जहाँ बाहरी संसार की सारी आड़-छिपाव एक क्षण में गायब हो जाएंगे। उस समय आपके लिए केवल एक ही बात शेष रहेगी – आप, आपकी आत्मा, और वह असीम चेतना जो आपको निरंतर जीवंत रखती है।

इस प्रवचन के माध्यम से, मेरे प्रिय मित्रों, मैं यही संदेश देना चाहता हूँ कि बाहरी संसार की भौतिकताओं और समाज के बंधनों से ऊपर उठकर अपने आप को जानना ही सच्ची मुक्ति है। जब हम अपने भीतर की उस अनंत गहराई को समझ लेते हैं, तब संसार अपने आप हमारे चारों ओर से गायब हो जाता है। यह एक ऐसी अद्भुत अनुभूति है, जो हमें बताती है कि हमारे भीतर छुपा हुआ सत्य ही हमारे अस्तित्व की असली पहचान है।

आज से यह प्रण करें कि आप अपने भीतर की यात्रा शुरू करेंगे, अपने मन की आवाज़ सुनेंगे, और उस अनंत चेतना को पहचानेंगे जो आपके भीतर सदैव से विद्यमान है। यही है वह पथ जो आपको बाहरी संसार के मोह-माया से ऊपर उठाकर आपके असली स्व की ओर ले जाएगा – एक स्व जो अनंत है, असीम है, और हर उस बंधन से मुक्त है जो कभी आपको बाँध सकता था।

प्रिय मित्रों, अब समय आ गया है कि हम इस ज्ञान को अपने जीवन में उतारें और देखना शुरू करें कि जब हम वास्तव में अपने आप को समझते हैं, तो दुनिया अपने आप कैसे बदल जाती है। बाहरी दुनिया की सभी उलझनें, सभी अपेक्षाएँ अपने आप फीकी पड़ जाती हैं, और हमें केवल वही मिलता है जो वास्तव में महत्वपूर्ण है – हमारे भीतर का असीम प्रकाश, हमारी अनंत चेतना।

इसलिए, चलिए एक नए दृष्टिकोण के साथ जीवन की ओर बढ़ें, जहाँ हम बाहरीता के मोह से ऊपर उठकर अपने आप को खोजें, और उस अनंत सत्य की ओर अग्रसर हों, जो हमारे भीतर छुपा है। यही है सच्ची मुक्ति, यही है असली जीवन का सार।

यह प्रवचन, जो आज मैंने आपसे साझा किया है, केवल एक प्रारंभ है। यह आपको उस गहरे, अनंत ज्ञान की ओर ले जाने का एक आमंत्रण है, जो हमारे भीतर छुपा है। जब आप इस आमंत्रण को स्वीकार करेंगे, तो आप पाएंगे कि संसार के सारे भ्रम, सारे मोह एक क्षण में गायब हो जाते हैं, और आप केवल उस अनंत प्रकाश में डूब जाते हैं, जो हर क्षण आपको जीवंत बनाये रखता है।

अब, इस प्रवचन के साथ, मैं आपसे विदा लेता हूँ, परंतु यह विदाई केवल बाहरी संसार से नहीं है, बल्कि एक नए आरंभ की ओर संकेत है – एक आरंभ जहाँ आप अपने भीतर की उस अनंत चेतना को पहचानते हुए सच्ची मुक्ति की ओर बढ़ेंगे।

आइए, हम सब मिलकर इस यात्रा पर निकलें – आत्म-जागरूकता, ध्यान, और स्व-अन्वेषण के मार्ग पर, जहाँ से हर भ्रम, हर माया अपने आप छिन जाती है, और हम केवल एक अद्वितीय, अमर चेतना के रूप में प्रकट होते हैं।

जय हो उस अनंत प्रकाश की, जो हमारे भीतर विद्यमान है, और जय हो उस सच्चाई की, जो हमें बताती है कि असली मुक्ति केवल अपने आप को जानने में निहित है।

यह प्रवचन आज के इस क्षण का एक उपहार है, एक ऐसा उपहार जो आपको अपने भीतर की ओर देखने का निमंत्रण देता है। याद रखिए, संसार को त्यागने का अर्थ केवल बाहरी वस्तुओं का त्याग नहीं है, बल्कि अपने भीतर के उस असीम सत्य को पहचान लेना है। और जब आप उस सत्य को पहचान लेंगे, तो आप पाएंगे कि संसार अपने आप आपके चारों ओर से गायब हो जाता है – क्योंकि अब आपकी आँखें केवल उस अनंत, शाश्वत चेतना पर केंद्रित हो जाती हैं।

आप सभी को इस यात्रा में शुभकामनाएँ। आत्मा की खोज में सफलता आपके कदम चूमे, और हर दिन आपके लिए एक नई जागृति का संदेश लेकर आए।

जय आत्म-जागरूकता, जय अनंत चेतना, और जय आपके अंदर के उस असीम प्रकाश की!

कोई टिप्पणी नहीं:

Blogger द्वारा संचालित.