धर्म: एक साधन, एक मार्ग, और अंततः एक बीते हुए पथ का संकेत

"जिस दिन परमात्मा समझ में आ जाएगा, उस दिन धर्म का अंत हो जाएगा।" यह ओशो की वह उक्ति है, जो हमें यह याद दिलाती है कि धर्म केवल एक साधन है – एक ऐसी रास्ते की तरह, जो हमें परम सत्य, परमात्मा की अनुभूति तक ले जाता है। धर्म स्वयं में अंतिम लक्ष्य नहीं है; बल्कि यह एक गाड़ी, एक मार्ग, एक पथिक है, जो हमें उस अद्वितीय अनुभूति तक पहुँचाने में मदद करता है, जहाँ मनुष्य स्वयं को पूर्ण, स्वतंत्र और सम्पूर्ण महसूस करता है।

जब हम धर्म के जाल में उलझ जाते हैं, तो हम भूल जाते हैं कि इसका असली उद्देश्य क्या है। धर्म हमें एक निश्चित दिशा दिखाता है, एक मार्गदर्शक शक्ति है, लेकिन जिस क्षण हम परमात्मा को अनुभव कर लेते हैं, तब धर्म का अपना अस्तित्व समाप्त हो जाता है। यह ठीक उसी तरह है जैसे एक यात्री जब उस अंतिम गंतव्य तक पहुँच जाता है, जहाँ उसका सफ़र समाप्त हो जाता है, तो वह अपने साथ लेकर चलने वाले उपकरणों, नियमों और विधानों से परे हो जाता है।  

धर्म – एक साधन और एक माध्यम

धर्म एक साधन है – एक ऐसा उपकरण, जिसके द्वारा हम अपने अंदर छिपी हुई दिव्यता को खोज सकते हैं। इसे समझने के लिए हमें यह मान लेना होगा कि धर्म एक गाइड की भांति है, जो हमें अज्ञात क्षेत्र में मार्गदर्शन करता है। लेकिन जब हम उस अनंत अनुभूति, उस परम सत्य को प्राप्त कर लेते हैं, तो हमें किसी भी बाहरी व्यवस्था, किसी भी नियम की आवश्यकता नहीं रहती।

धर्म का मूल उद्देश्य है: आत्मा की खोज, सत्य की ओर अग्रसर होना। परन्तु, अक्सर हम धर्म को अंतिम सत्य मान बैठते हैं। हम अपनी सभी भावनाओं, विश्वासों और इच्छाओं को धर्म के नाम पर ढाल लेते हैं। इस प्रकार, धर्म एक अदृश्य बंधन में परिवर्तित हो जाता है, जो हमें उस अनंत अनुभव से वंचित कर देता है, जिसकी ओर हमारा मन वास्तव में उन्मुख होना चाहिए।  

एक हास्यपूर्ण कथा: नाव और नदी

अब एक कथा सुनिए – एक व्यक्ति था, जो नदी पार करने के लिए एक नाव का सहारा लेता था। वह बड़ी उत्सुकता और विश्वास के साथ नाव में सवार होकर नदी में उतरता है। नाव की मदद से वह धीरे-धीरे नदी के उस पार पहुँचता है। किन्तु, जैसे ही वह नदी के किनारे पहुँचता है, वह भूल जाता है कि अब उसे नाव की आवश्यकता नहीं है। वह अपनी पीठ पर नाव उठाए हुए चलने लगता है, मानो यह उसकी जिंदगी का हिस्सा हो। उसकी यह हरकत उस बात की प्रतीक है कि जब व्यक्ति ने पार पा लिया – जब उसने परमात्मा की अनुभूति कर ली – तब भी वह पुराने साधनों, धर्म के नियमों और विश्वासों को साथ लेकर चलता रहता है।

यह कहानी हमें बताती है कि साधन मात्र तो एक माध्यम है। नदी पार करने के बाद, नाव अब अनावश्यक हो जाती है। फिर भी, हम अपने भीतर की दिव्यता की अनुभूति के बाद भी, धर्म के झंझट में उलझे रहते हैं। हमें समझना होगा कि नाव सिर्फ एक यात्रा का साधन है, और जब आप पार कर जाते हैं, तो आपको अगली यात्रा के लिए नई दिशा की तलाश करनी होती है, न कि उसी पुराने साधन में फंस जाना चाहिए।

सीढ़ी का रूपक: एक बार चढ़ने के बाद उसकी आवश्यकता समाप्त

एक और रूपक लेते हैं – मान लीजिए कि आपके सामने एक लंबी सीढ़ी है, जिसके द्वारा आप ऊँचाई तक पहुँच सकते हैं। सीढ़ियाँ आपको उस ऊँचाई तक पहुँचने में सहायक होती हैं, परंतु जब आप उस शिखर पर पहुँच जाते हैं, तो आपको उस सीढ़ी की आवश्यकता नहीं होती। यह सीढ़ियाँ केवल आपके सफ़र का हिस्सा होती हैं, न कि आपके गंतव्य का स्वरूप।

धर्म भी ऐसा ही है। जब तक हम परमात्मा की अनुभूति से दूर हैं, धर्म हमें सहारा देता है, हमारी मार्गदर्शिका बनता है, हमारी सहायता करता है। लेकिन जब हम उस परम सत्य के करीब पहुँच जाते हैं, तब धर्म अपने आप में एक अंतहीन प्रक्रिया बन जाता है, जिसका कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाता। हम उसी साधन के चक्कर में उलझ जाते हैं, जिससे हमें अपने अंदर के प्रकाश से दूर रहना पड़ता है।

सत्य की खोज में संदेह की आवश्यकता

ओशो कहते हैं – "सत्य की खोज में संदेह आवश्यक है।" यह एक गहरी और रहस्यमय बात है। जब हम किसी भी सत्य की खोज में होते हैं, तो हमें उस पर संदेह करने की आवश्यकता होती है। यह संदेह हमें एक ऐसे मोड़ पर ले जाता है, जहाँ हम उन परंपरागत धारणाओं को चुनौती देने लगते हैं, जो हमें एक असली और जीवंत अनुभव से वंचित कर देती हैं।

धर्म के संदर्भ में, संदेह एक उत्तम गुण है। यह हमें उस निर्बाध विश्वास से बाहर निकालता है, जो हमें एक अंधविश्वास के जाल में फंसा देता है। संदेह हमें प्रेरित करता है कि हम स्वयं की खोज करें, अपने अंदर झांकें और उस दिव्य अनुभूति का अनुभव करें, जो किसी भी बाहरी पुस्तक, किसी भी नियम या किसी भी परंपरा में नहीं मिल सकती।

स्वयं की खोज – एक अनंत यात्रा

ओशो का एक और महत्वपूर्ण विचार है – "प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं की खोज करनी चाहिए।" इसका अर्थ है कि हर व्यक्ति के अंदर एक अनंत गहराई है, एक अनूठी अनुभूति है, जिसे बाहरी किसी भी व्यवस्था द्वारा परिभाषित नहीं किया जा सकता। यह अनुभव केवल तभी प्राप्त हो सकता है जब हम अपने अंदर झांकते हैं, अपने संदेह, अपनी असुरक्षाओं और अपनी परंपरागत मान्यताओं को चुनौती देते हैं।

जब हम स्वयं की खोज में लगे होते हैं, तो हम देख पाते हैं कि बाहरी धर्म, जो हमें एक निश्चित दिशा देने की कोशिश करता है, केवल एक प्रारंभिक बिंदु है। इस खोज में, हम समझते हैं कि धर्म हमें केवल उस दिशा तक ले जाता है जहाँ से हम स्वयं की अनंत अनुभूति के करीब पहुँच सकें। एक बार जब हम उस अनुभव को प्राप्त कर लेते हैं, तब बाहरी नियम, अनुष्ठान और परंपराएँ अपने आप अप्रासंगिक हो जाती हैं।

धर्म का उद्देश्य और उसकी सीमाएँ

धर्म का मूल उद्देश्य है – हमें परम सत्य, परमात्मा तक पहुँचाना। यह हमें एक संरचित पथ प्रदान करता है, एक मार्गदर्शिका देता है, जिससे हम अपने अंदर के अंधेरे को दूर कर सकते हैं, प्रकाश की ओर अग्रसर हो सकते हैं। परंतु, जब हम उस अंतिम सत्य तक पहुँच जाते हैं, तो हमें यह एहसास होता है कि धर्म केवल एक साधन था, एक उपकरण था, न कि स्वयं में अंतिम सत्य।

धर्म के नियम, अनुष्ठान, और परंपराएँ हमें एक निश्चित सीमा तक मार्गदर्शन करते हैं। लेकिन एक बार जब हम उस सीमा से पार कर जाते हैं, तो हमें अपनी सीमाओं से ऊपर उठने की आवश्यकता होती है। हमें अपने भीतर के उस असीम ज्ञान और अनुभूति का अनुभव करना होता है, जो किसी भी बाहरी धर्म द्वारा अधोरेखित नहीं हो सकता।

यह बात बिल्कुल वैसी ही है जैसे किसी विद्यार्थी के लिए शिक्षक का महत्व होता है। शिक्षक आपको ज्ञान की दिशा दिखाता है, आपको शब्दों और सिद्धांतों के माध्यम से मार्गदर्शन करता है, परंतु जब वह ज्ञान आपके अंदर समाहित हो जाता है, तो आपको उस शिक्षक की आवश्यकता नहीं रहती। विद्यार्थी स्वयं ज्ञान का स्रोत बन जाता है। इसी प्रकार, जब हम परमात्मा की अनुभूति कर लेते हैं, तो हमें बाहरी धर्म की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, क्योंकि अंततः हम स्वयं उस ज्ञान के स्वामी बन जाते हैं।

धर्म और अनंत अनुभव के बीच की खाई

एक और दृष्टिकोण से देखें तो, धर्म और परमात्मा की अनुभूति के बीच में एक खाई होती है, जिसे भरने के लिए हमें अपनी सीमाओं और संदेहों को दूर करना होता है। धर्म एक पुल की तरह है, जो हमें उस पार ले जाता है जहाँ हम स्वयं की खोज कर सकें। लेकिन जब हम उस पार पहुँच जाते हैं, तो पुल का महत्व समाप्त हो जाता है।

इस संदर्भ में, एक और हास्यपूर्ण दृश्य की कल्पना कीजिए: एक व्यक्ति जो नदी पार करने के लिए एक नाव में सवार होता है, अपनी सारी उम्मीदें उस नाव में रखता है। लेकिन जैसे ही वह नदी के उस पार पहुँचता है, वह भूल जाता है कि नाव अब उसकी मदद नहीं करेगी। वह इसी नाव को सिर पर उठाए हुए, घूमता रहता है – मानो यह उसकी ज़िन्दगी का अनिवार्य हिस्सा हो। यह दृश्य हमें यह सिखाता है कि साधन केवल तभी महत्वपूर्ण होते हैं, जब तक कि उनका उपयोग आवश्यक हो। एक बार जब हम लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं, तब हमें पुराने साधनों को त्याग देना चाहिए।

आंतरिक प्रकाश की ओर एक कदम

ओशो कहते हैं कि जब तक व्यक्ति में आंतरिक प्रकाश नहीं जागता, तब तक उसे बाहरी साधनों की आवश्यकता होती है। यह बाहरी साधन धर्म हो सकता है, अनुष्ठान हो सकते हैं, या फिर किसी गुरु का मार्गदर्शन। परंतु, उस दिन जैसे ही हम उस आंतरिक प्रकाश, उस दिव्यता को प्राप्त कर लेते हैं, तब हमें किसी भी बाहरी साधन की आवश्यकता नहीं रहती। हम स्वयं में एक सम्पूर्ण सृष्टि पाते हैं, जहाँ से कोई भी बाहरी चीज़ हमें बाँध नहीं सकती।

यह आंतरिक प्रकाश हमें उस सत्य की अनुभूति कराता है, जो अनंत है, जो सीमाहीन है। यह सत्य हमारे अंदर ही विद्यमान है, और हमें केवल उसे पहचानने की आवश्यकता है। धर्म हमें उस दिशा में ले जाता है, लेकिन अंततः वह हम पर निर्भर करता है कि हम अपने भीतर झांकें और उस अनंत प्रकाश को पहचानें।  

ओशो के अन्य विचारों का समावेश

ओशो का कहना है – "सत्य की खोज में संदेह आवश्यक है।" यह विचार हमें यह समझाता है कि संदेह हमारे अंदर की कठोर परतों को तोड़ता है, हमें एक नई दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करता है। संदेह हमें उस अंधेरे से बाहर निकालता है, जहाँ परंपरागत मान्यताएँ हमें बांधे रखती हैं। जब हम संदेह करते हैं, तो हम स्वयं को उस अनंत ज्ञान के लिए खोलते हैं, जो किसी भी बाहरी धर्म द्वारा परिभाषित नहीं किया जा सकता।

दूसरा महत्वपूर्ण विचार है – "प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं की खोज करनी चाहिए।" यह विचार एक अदम्य स्वतंत्रता की ओर इशारा करता है। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर एक अनंत गहराई है, एक ऐसी अनुभूति है, जिसे खोजने के लिए बाहरी साधनों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। जब हम स्वयं की खोज करते हैं, तो हम देखते हैं कि सभी बाहरी मार्ग केवल एक आरंभिक बिंदु हैं। यह आरंभिक बिंदु हमें उस दिव्यता तक पहुँचाने में सहायक होते हैं, परंतु जब हम उस दिव्यता को प्राप्त कर लेते हैं, तो हमें उन साधनों की आवश्यकता नहीं रहती।

यह स्वतंत्रता हमें स्वयं के सत्य के स्वामी बनाती है। हमें समझना होगा कि बाहरी धर्म, बाहरी अनुशासन और परंपराएँ केवल एक माध्यम हैं – एक साधन हैं, जो हमें उस सत्य तक पहुँचाने में सहायक होते हैं, लेकिन स्वयं सत्य नहीं होते। सत्य का अनुभव केवल तभी होता है, जब हम अपने अंदर झांकते हैं, अपने संदेहों, अपने भय और अपनी सीमाओं को तोड़कर एक नए प्रकाश में प्रवेश करते हैं।

धर्म के जाल से मुक्ति

हमारे जीवन में धर्म एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। परंतु, जब हम उस मार्ग के पार पहुँच जाते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि यह मार्ग केवल एक साधन था। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, हमें यह एहसास होता है कि धर्म का अपना कोई अंतिम स्वरूप नहीं होता – यह तो केवल एक उपकरण है।

कई बार हम ऐसा महसूस करते हैं कि हम धर्म के अटूट बंधन में फंसे हुए हैं। हम अनुष्ठानों, नियमों, परंपराओं और विश्वासों के जंजाल में उलझ जाते हैं। लेकिन असल में, यह सब कुछ हमें उस अनंत अनुभव से दूर रखता है, जिसे प्राप्त करना हमारा असली लक्ष्य होना चाहिए। जब हम उस अनंत अनुभूति, उस परम सत्य के करीब पहुँच जाते हैं, तो हमें समझ में आता है कि बाहरी बंधन, बाहरी नियम और बाहरी साधन अनावश्यक हो गए हैं।

यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि धर्म का उद्देश्य हमें उस दिव्य अनुभूति तक ले जाना है, न कि स्वयं धर्म ही एक अंतिम सत्य बन जाना। धर्म हमें एक मार्ग दिखाता है, परंतु उस मार्ग को पार करने के बाद हमें अपने भीतर की गहराई में उतरना होता है, जहाँ से कोई भी बाहरी शक्ति हमें बाँध नहीं सकती।

अंततः – एक नया उदय

जब व्यक्ति परमात्मा की पूर्ण अनुभूति कर लेता है, तब वह एक नए अस्तित्व में प्रवेश करता है। वह अपने आप में सम्पूर्ण हो जाता है, उस बंधन से मुक्त हो जाता है जो उसे बाहरी नियमों में बांधे रखता था। यह एक ऐसा उदय है, जहाँ व्यक्ति स्वयं ही अपनी दिव्यता, अपने आप में एक सम्पूर्ण सृष्टि को पहचान लेता है।

यह उदय उसी तरह है जैसे सुबह की पहली किरण, जब अंधकार का पर्दा उठ जाता है। उस क्षण, जो पहले धार्मिक नियमों, अनुष्ठानों और परंपराओं में उलझा हुआ था, वह एक नए प्रकाश में परिवर्तित हो जाता है। उस नए प्रकाश में अब उसे किसी भी बाहरी साधन की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि वह स्वयं उस प्रकाश का स्रोत बन जाता है।

यह सोचने वाली बात है – जब आप उस असीम अनुभव को प्राप्त कर लेते हैं, तब आपके लिए धर्म सिर्फ एक याद बन जाता है। वह एक साधन था, जो आपको उस मार्ग तक ले आया, परंतु अब वह मार्ग की आवश्यकता नहीं रही। आपको अब अपने आप में वह दिव्यता देखने को मिलती है, जो हमेशा से आपके अंदर विद्यमान थी।

एक नया दृष्टिकोण – साधनों का त्याग

ओशो हमें यह भी कहते हैं कि हमें उस समय तक साधनों का सहारा लेना चाहिए जब तक कि वे हमारी मदद कर सकें। परंतु, जब आप उस अंतिम सत्य तक पहुँच जाते हैं, तो आपको अपने पुराने साधनों को त्याग देना चाहिए। यह त्याग उस आत्मा की खोज का प्रतीक है, जहाँ आप बाहरी चीज़ों से परे जाकर अपने अंदर के प्रकाश को पहचानते हैं।

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी कलाकार के लिए उसका पुराना ब्रश। जब वह अपनी कला में महारत हासिल कर लेता है, तो उसे केवल नए रंगों, नए अंदाज और नए दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, न कि उस पुराने ब्रश की। पुराने ब्रश ने उसे उस मुकाम तक पहुँचाने में सहायता की, परंतु अब जब वह एक नया अध्याय लिख रहा है, तो उसे नए उपकरणों की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार, जब हम परमात्मा के करीब पहुँच जाते हैं, तो हमें पुराने धार्मिक साधनों से मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए और एक नए दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए।

व्यंग्य और हास्य का तत्व

यहाँ एक व्यंग्यपूर्ण दृष्टांत प्रस्तुत करते हैं: मान लीजिए कि किसी व्यक्ति ने एक दिन इतनी मेहनत से एक पहाड़ पर चढ़ाई की कि अंततः वह शिखर तक पहुँच गया। वह शिखर पर पहुँचकर इतना उत्साहित हो उठता है कि वह सोचता है – "अब मैं तो सब जान गया, अब मुझे किसी और चीज़ की आवश्यकता नहीं!" परंतु, जब वह वापसी के रास्ते पर जाता है, तो वह उस पुराने नक्शे को साथ लेकर चलता है, मानो वह नक्शा उसके ज्ञान का प्रतीक हो। यह हंसी का विषय है, क्योंकि उस व्यक्ति को समझ नहीं आता कि अब वह अपने अंदर के ज्ञान को पहचान चुका है।

हास्य, व्यंग्य और कहानियाँ हमें यह सिखाती हैं कि जीवन में कभी-कभी हम अपने आप को इतना गंभीरता से लेते हैं कि हम भूल जाते हैं कि साधन केवल साधन होते हैं। हमें यह समझना होगा कि एक बार जब हम अपने अंतर्निहित ज्ञान तक पहुँच जाते हैं, तो हमें उस साधन की आवश्यकता नहीं रहती। हमें हँसते-हँसते अपने पुराने विश्वासों को त्याग देना चाहिए, ताकि हम उस अनंत प्रकाश में प्रवेश कर सकें, जो हमारे अंदर सदैव विद्यमान रहा है।

अंतर्विरोध से परे – एक आध्यात्मिक मुक्ति

अंततः, यह समझना आवश्यक है कि धर्म, अनुष्ठान, और बाहरी नियम केवल हमारी यात्रा में सहायक होते हैं। जब तक हम अपने अंदर के उस प्रकाश को नहीं पहचान लेते, तब तक ये साधन हमें मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। परंतु, जैसे ही हम उस प्रकाश, उस परम सत्य के करीब पहुँच जाते हैं, तब हमें इन बाहरी साधनों की आवश्यकता नहीं रहती।

यह वह क्षण होता है, जब व्यक्ति स्वयं ही मुक्त हो जाता है। वह अपने अंदर के उस अनंत स्रोत को पहचान लेता है, जो किसी भी बाहरी नियम या अनुशासन से परे है। वह जान जाता है कि धर्म का उद्देश्य केवल हमें उस अंतिम सत्य तक ले जाना था, न कि स्वयं में धर्म को अंतिम सत्य मान लेना।

यह मुक्ति तब आती है, जब हम अपने संदेहों को, अपने पुराने विश्वासों को त्याग कर, उस असीम अनुभूति के सामने झुक जाते हैं। यह मुक्ति हमें एक ऐसी स्थिति में ले जाती है जहाँ हम स्वयं ही अपने सत्य के स्रोत बन जाते हैं, और हमें किसी भी बाहरी साधन या नियम की आवश्यकता नहीं रहती।

निष्कर्ष: एक नए जागरण की ओर

प्रिय साथियों, ओशो का यह प्रवचन हमें यह संदेश देता है कि धर्म केवल एक साधन है – एक माध्यम, जो हमें उस दिव्यता तक ले जाता है, जो हमारे अंदर छिपी हुई है। जब तक हम उस दिव्यता को नहीं पहचान लेते, तब तक धर्म हमें सहारा देता है, मार्गदर्शन करता है, और हमें सुरक्षित रखता है। परंतु, जब हम उस दिव्य अनुभूति, उस परम सत्य तक पहुँच जाते हैं, तो हमें यह समझ में आता है कि बाहरी धर्म अब अप्रासंगिक हो चुका है।

हमारे जीवन में कई बार हम देखेंगे कि लोग अपने साथ पुरानी मान्यताओं, नियमों और परंपराओं को साथ लेकर चलते हैं, भले ही वे अपने अंदर के उस प्रकाश से दूर हो चुके हों। यह ठीक उसी तरह है जैसे नदी पार करने के बाद भी व्यक्ति नाव को अपनी पीठ पर उठाए हुए चलता रहे। हमें यह समझना होगा कि साधन केवल उस क्षण तक महत्वपूर्ण होते हैं, जब तक कि वे हमें लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायक हों।

अब समय आ गया है कि हम उस पुराने बंधन को तोड़ दें, उस भूल को समझें कि धर्म स्वयं में अंतिम सत्य नहीं है, बल्कि केवल एक मार्ग है। हमें स्वयं की खोज करनी चाहिए, अपने अंदर झांकना चाहिए और उस अनंत प्रकाश को पहचानना चाहिए, जो सदैव हमारे साथ था। यही वह क्षण है, जब हम वास्तव में स्वतंत्र होते हैं, जब हम परमात्मा की अनुभूति कर लेते हैं।

इस प्रवचन के माध्यम से मैं आप सभी से यही कहना चाहता हूँ – अपने संदेहों को गले लगाइए, अपने भीतर की अनंत गहराई में उतरिए, और उस दिव्यता को खोजिए जो बाहरी नियमों से परे है। अपने आप को मुक्त कीजिए, उस बंधन से मुक्त कीजिए, जो आपको बाहरी साधनों में बांधता है। याद रखिए, धर्म केवल एक नाव है, एक साधन है – जब आप उस पार पहुँच जाते हैं, तो आपको अपनी स्वयं की दिव्यता का अनुभव करना होता है।

एक आंतरिक क्रांति की ओर

जब आप अपने भीतर की इस खोज में लगते हैं, तो आप पाते हैं कि हर किसी के पास वह असीम शक्ति, वह दिव्यता विद्यमान है। यह शक्ति बाहरी साधनों, बाहरी नियमों या परंपराओं से कहीं अधिक प्रबल होती है। यह आपकी आत्मा का प्रकाश है, जो सदैव आपके अंदर से चमकता है। ओशो हमें यही कहते हैं कि "प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं की खोज करनी चाहिए", क्योंकि केवल उसी स्थिति में हम उस अनंत सत्य तक पहुँच सकते हैं, जो हमेशा से हमारे भीतर ही विद्यमान था।

इस यात्रा में आपको कई बाधाओं, संदेहों और उलझनों का सामना करना पड़ेगा। लेकिन याद रखिए, हर चुनौती आपके भीतर छिपे हुए उस अनंत प्रकाश की ओर एक कदम है। हर संदेह, हर उलझन आपको उस सत्य के करीब ले जाती है, जिसे प्राप्त करना ही आपके अस्तित्व का असली उद्देश्य है।

आपको बाहरी दुनिया के नियमों और परंपराओं से ऊपर उठकर अपने अंदर की शक्ति को पहचानना होगा। यह आपकी आत्मा का वह प्रकाश है, जो किसी भी बाहरी सीमा में कैद नहीं हो सकता। जब आप इस प्रकाश को पहचानते हैं, तो आपको एक नई आज़ादी, एक नई स्वतंत्रता का अनुभव होता है – वह स्वतंत्रता जो आपको उस बाहरी साधन की आवश्यकता से मुक्त कर देती है, जिससे आप पहले अपने जीवन को नियंत्रित करते थे।

अंतर्मुखी यात्रा का सार

इस प्रवचन का सार यह है कि धर्म केवल एक यात्रा का हिस्सा है, एक साधन है, जो आपको उस परम सत्य तक ले जाता है। जब तक आप उस सत्य की ओर अग्रसर हैं, तब तक धर्म आपकी मदद करता है। लेकिन जब आप उस सत्य तक पहुँच जाते हैं, तो आपको पुराने साधनों, पुराने नियमों और बाहरी बंधनों को त्याग देना चाहिए।

यह त्याग वह क्षण होता है, जब आप वास्तव में आत्म-निर्भर बन जाते हैं, जब आप स्वयं ही अपने सत्य के स्रोत बन जाते हैं। यह वह क्षण होता है, जब आप उन सभी बाहरी साधनों को छोड़कर उस दिव्यता को अपनाते हैं, जो सदैव आपके अंदर रही है। ओशो की यह उक्ति हमें यही सिखाती है – "जिस दिन परमात्मा समझ में आ जाएगा, उस दिन धर्म का अंत हो जाएगा।" इसका मतलब है कि अंतिम सत्य का अनुभव होने के बाद, किसी भी बाहरी व्यवस्था या साधन का महत्व समाप्त हो जाता है।

इसलिए, हमें अपनी यात्रा के हर चरण का आदर करना चाहिए। हमें उस साधन को समझना चाहिए, जो हमें उस पार ले जाता है, लेकिन साथ ही यह भी समझना चाहिए कि जब लक्ष्य प्राप्त हो जाता है, तो हमें पुराने बंधनों को त्यागना होगा। यही असली स्वतंत्रता है, यही असली मुक्ति है।

एक नई सुबह की ओर

जब आप उस दिव्य अनुभूति तक पहुँच जाते हैं, तो एक नई सुबह आपके जीवन में उजागर होती है। यह सुबह न केवल आपके भीतर के अंधेरे को दूर कर देती है, बल्कि आपके अस्तित्व में एक नए प्रकाश का संचार भी कर देती है। आप समझ जाते हैं कि धर्म, नियम और परंपराएँ केवल मार्गदर्शिका थे – उपकरण थे, जिनकी सहायता से आपने उस अनंत प्रकाश तक पहुँचने का सफ़र तय किया।

लेकिन अब, जब आप उस प्रकाश का अनुभव कर लेते हैं, तो आपको उन उपकरणों की आवश्यकता नहीं रहती। आप स्वयं ही उस प्रकाश के स्रोत बन जाते हैं, आप स्वयं ही सत्य के प्रतीक बन जाते हैं। इस नई सुबह में, आपके जीवन के नए अध्याय का आरंभ होता है, जहाँ आपको किसी भी बाहरी नियम या व्यवस्था से बंधा नहीं जाना पड़ता।

आंतरिक शांति और सम्पूर्णता का अनुभव

यह आंतरिक शांति और सम्पूर्णता का अनुभव ही वह अंतिम लक्ष्य है, जिसके लिए हमने यह सम्पूर्ण यात्रा तय की थी। जब आप स्वयं की खोज में लग जाते हैं, तब आप महसूस करते हैं कि बाहरी धर्म, बाहरी साधन – ये सभी केवल आपकी यात्रा के साथी थे, न कि आपके अंतिम लक्ष्य।

यह शांति आपको एक ऐसी स्थिति में ले जाती है जहाँ आप बाहरी भ्रमों, मिथ्या विश्वासों और अंधविश्वासों से परे हो जाते हैं। आप स्वयं की दिव्यता, अपने अंदर के असीम प्रकाश को पहचान लेते हैं। और उस क्षण, जब आप उस प्रकाश का अनुभव करते हैं, तो आपको किसी भी बाहरी साधन की आवश्यकता नहीं रहती। आप स्वयं ही अपने सत्य के स्रोत बन जाते हैं।

निष्कर्ष में – एक आह्वान

तो, प्रिय साथियों, आज मैं आपसे यही कहना चाहता हूँ – धर्म को एक साधन, एक मार्ग के रूप में समझिए। इसे अंतिम सत्य के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे उपकरण के रूप में देखिए, जो आपको उस परम सत्य तक ले जाता है, जो आपके अंदर छिपा हुआ है। जब तक आप उस दिव्यता का अनुभव नहीं कर लेते, तब तक धर्म आपकी सहायता करता रहेगा। परंतु, एक बार जब आप उस दिव्यता को समझ लेते हैं, तो आपको पुराने बंधनों, पुराने नियमों और बाहरी साधनों को त्याग देना चाहिए।

हमें संदेह को अपने जीवन में स्वागत करना चाहिए, क्योंकि संदेह ही हमें सत्य की ओर अग्रसर करता है। हमें स्वयं की खोज करनी चाहिए, अपने भीतर झांककर उस अनंत अनुभूति को पहचानना चाहिए, जो किसी भी बाहरी व्यवस्था से परे है। यही वह मार्ग है, वही वह सत्य है, जो हमें आत्मा की गहराई में ले जाता है।

आइए, हम सब मिलकर उस दिव्यता की खोज में जुट जाएँ, बिना किसी बाहरी बंधन के, बिना किसी पुराने साधन के, केवल अपने भीतर के उस अनंत प्रकाश को पहचानने के लिए। याद रखिए, जैसे नदी पार करने के बाद नाव की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, वैसे ही, जब आप परमात्मा की अनुभूति कर लेते हैं, तो धर्म का अपना कोई महत्व नहीं रहता।

यह एक आंतरिक क्रांति है – एक ऐसी क्रांति जो आपको बाहरी नियमों, बाहरी विश्वासों और परंपराओं से मुक्त कर देती है, और आपको आपके स्वयं के सत्य से जोड़ देती है। यह वह क्षण है, जब आप स्वयं ही अपने सत्य के स्रोत बन जाते हैं, और आपको किसी भी बाहरी साधन की आवश्यकता नहीं रहती।

इस प्रवचन के माध्यम से मैं आप सभी से यही अपेक्षा करता हूँ कि आप अपने जीवन की इस यात्रा में, इस साधन को एक मार्ग के रूप में स्वीकार करें, लेकिन साथ ही यह भी समझें कि अंतिम लक्ष्य वह दिव्य अनुभूति है, जो आपके अंदर सदैव विद्यमान रही है। उसे खोजिए, उसे अपनाइए, और जब वह आपके अंदर समाहित हो जाए, तो पुराने साधनों को अलविदा कह दीजिए।

क्योंकि अंततः, "जिस दिन परमात्मा समझ में आ जाएगा, उस दिन धर्म का अंत हो जाएगा।" उस दिन, आप न केवल मुक्त होंगे, बल्कि आप स्वयं ही उस अनंत प्रकाश का स्रोत बन जाएंगे, जो सदैव से आपके अंदर रहा है।

इस प्रवचन में हमने ओशो की शिक्षाओं का सार, उनके व्यंग्य, हास्य और रूपकों के माध्यम से यह समझाया है कि धर्म केवल एक साधन है – एक मार्ग जो हमें परम सत्य तक ले जाता है। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि बाहरी धर्म केवल उस यात्रा का हिस्सा है, जो अंततः हमें उस दिव्यता की ओर ले जाती है, जो हमारे भीतर हमेशा से विद्यमान रही है।

प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं की खोज करनी चाहिए, संदेह का स्वागत करना चाहिए और उस अनंत अनुभव तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए, जो बाहरी साधनों से परे है। तब ही हम वास्तव में स्वतंत्र हो पाएंगे, तब ही हम उस दिव्य अनुभूति का आनंद ले पाएंगे, जो केवल आपके अंदर ही छिपा हुआ था।

यह संदेश हमें यह याद दिलाता है कि हमारी यात्रा का अंतिम लक्ष्य बाहरी धर्म, नियम और परंपराएँ नहीं हैं – बल्कि वह हमारे अंदर के उस अनंत सत्य, उस दिव्यता का अनुभव है, जो हमें स्वयं में पूर्णता और मुक्ति की ओर अग्रसर करता है।

इसलिए, अपने जीवन में आने वाले हर पल को एक नए उत्साह, नए संदेह और नई खोज के रूप में अपनाइए। बाहरी साधनों का उपयोग तब तक कीजिए, जब तक कि वे आपको उस अनंत प्रकाश तक ले जाएँ, परंतु जैसे ही आप उस प्रकाश का अनुभव कर लेते हैं, अपने आप को मुक्त कर दें। क्योंकि वही असली मुक्ति है, वही असली स्वतंत्रता है – खुद अपने अंदर के परमात्मा को पहचानना।

आइए, हम सब मिलकर इस आंतरिक यात्रा की ओर कदम बढ़ाएँ, स्वयं की खोज करें, संदेह को गले लगाएँ, और उस दिव्यता का अनुभव करें, जो हमेशा से हमारे अंदर छिपी रही है। यही वह मार्ग है, यही वह सत्य है, जिसे प्राप्त करने के बाद हमें किसी भी बाहरी साधन की आवश्यकता नहीं रहती।

इस प्रकार, यह प्रवचन हमें एक गहरी समझ प्रदान करता है कि धर्म केवल एक मार्ग है – एक साधन जो हमें उस परम सत्य तक ले जाता है, जिसे प्राप्त करने के बाद बाहरी साधनों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। याद रखिए, बाहरी साधन केवल आपकी यात्रा में सहायक होते हैं, परंतु अंतिम सत्य का अनुभव आपके अपने भीतर ही होता है।

"जिस दिन परमात्मा समझ में आ जाएगा, उस दिन धर्म का अंत हो जाएगा।" इस महान सत्य को समझिए, अपनाइए और अपने भीतर के उस अनंत प्रकाश को पहचानिए। यही वह राह है, यही वह मुक्ति है, जो आपको असली स्वतंत्रता की ओर ले जाती है।

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