नमस्कार साथियों,
आज मैं आपसे एक ऐसे विषय पर बात करना चाहता हूँ, जो हमारी आत्मा की गहराइयों से जुड़ा है—"उस आज्ञा का पालन कभी मत करना जो तुम्हारे भीतर से न आती हो!!" यह ओशो की उक्ति हमें एक ऐसी जीवन यात्रा की ओर इशारा करती है, जहाँ बाहरी आदेशों का अंधानुकरण छोड़कर, अपनी आंतरिक आवाज़, अपनी आत्मा की पुकार पर विश्वास करना आवश्यक हो जाता है। आइए, इस प्रवचन में हम विस्तार से समझें कि कैसे बाहरी आदेश हमारे अस्तित्व पर हावी होते हैं और कैसे ध्यान, आत्म-जागरूकता तथा आंतरिक सत्य की खोज हमें सच्ची स्वतंत्रता, आनंद और चेतना के पथ पर अग्रसर कर सकती है।
1. बाहरी आज्ञाओं का जाल
हमारी बचपन की शिक्षा में ही हमें यह सिखाया जाता है कि माता-पिता, गुरु, शिक्षक, समाज और यहाँ तक कि धार्मिक संस्थान भी हमें बताते हैं कि हमें क्या करना है और क्या नहीं। यह आज्ञाकारिता एक प्रकार की सुरक्षा कवच होती है, जिसके बिना हम अनजान रास्तों पर भी निडर होकर चल सकते हैं। लेकिन जब यह सुरक्षा कवच धीरे-धीरे हमारी अपनी सोच, समझ और निर्णय को दबा देता है, तो वह हमें एक ऐसे जाल में फँसा देता है जहाँ हम अपनी स्वयं की आवाज़ सुनने में असमर्थ हो जाते हैं।
एक व्यक्ति का उदाहरण लेते हैं—रामलाल। रामलाल एक साधारण सा व्यक्ति था, जिसने अपने पूरे जीवन में समाज के नियमों का अंधानुकरण किया। गाँव में एक नया नियम आया—"हर शुक्रवार को नदी में स्नान अनिवार्य है।" बिना सोचे-समझे इस नियम का पालन करते-करते, रामलाल एक ठंडी सर्दी की सुबह नदी में स्नान करने गया। उस दिन का तापमान इतना कम था कि उसे ठंड से गंभीर बीमारी हो गई। इस घटना ने रामलाल के मन में एक गहरी खलल पैदा की—क्या वास्तव में वह स्वयं के निर्णय पर चल रहा था या बस समाज की आज्ञाओं का पालन कर रहा था? यह वही क्षण था जब उसे एहसास हुआ कि उसने अपनी भीतरी आवाज़ को अनसुना कर दिया था।
2. आंतरिक सत्य की खोज
ओशो का कहना है कि सत्य हमारे भीतर ही निहित है, इसे कहीं और खोजने की जरूरत नहीं। जब हम अपने अंदर झांकते हैं, ध्यान करते हैं और आत्म-जागरूकता प्राप्त करते हैं, तभी हम उस वास्तविकता से रूबरू हो पाते हैं जो हमारी आत्मा की पुकार है। इस सत्य की खोज एक ऐसी यात्रा है जो हमें बाहरी शोरगुल से मुक्त कर देती है और हमें अपने वास्तविक स्वरूप से जोड़ देती है।
ध्यान की प्रक्रिया में, जब हम अपने मन को स्थिर करते हैं, तो एक अजीब सी शांति हमें घेरे लेती है। यह शांति हमें उस भीतरी सत्य से जोड़ती है जिसे हमने कभी महसूस नहीं किया। यह वही शांति है जो एक नदी की मधुर धारा की तरह बहती है, बिना किसी विघ्न के, और हमें उस अनंत ऊर्जा से जोड़ देती है जो हमारे भीतर निवास करती है। ओशो कहते हैं: **"ध्यान का अर्थ है कि आपका शरीर, आपका मन, आपकी आत्मा सभी इतनी समरसता में हों, कि वे एक लय में एक साथ नृत्य करें।"** यह एक अद्भुत अनुभव है, जो हमें याद दिलाता है कि असली स्वतंत्रता बाहरी आदेशों से नहीं, बल्कि हमारी भीतरी चेतना से आती है।
3. समाज का दबाव और उसकी जंजीरें
समाज हमेशा से एक ऐसा मंच रहा है जहाँ हमें एक निश्चित ढांचे में बाँध कर रखा जाता है। जब हम बिना सोचे-समझे समाज की आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो हम उस ढांचे की जंजीरों में उलझ जाते हैं। यह जंजीरें हमारे विचारों, भावनाओं और इच्छाओं को नियंत्रित कर देती हैं। समाज के नियम, परंपराएँ, रीति-रिवाज—ये सभी हमें एक ढांचे में बाँधने का प्रयास करते हैं, जिससे हमारी स्वयं की पहचान दब जाती है।
यहाँ एक व्यंग्यात्मक उदाहरण सामने आता है। कल्पना कीजिए, एक छोटे से कस्बे में एक नया नियम लागू किया जाता है—"सड़कों पर चलने वाले लोगों को सिर पर टोपी पहननी अनिवार्य है।" कोई यह नियम सोच-समझकर अपनाता नहीं, बल्कि केवल आज्ञा मानकर टोपी पहनता है। यहाँ टोपी पहनना एक प्रकार की नक़ली पहचान बन जाती है, जो व्यक्ति की आंतरिक सोच और उसकी स्वायत्तता का बखान नहीं कर पाती। इस व्यंग्यात्मक स्थिति में व्यक्ति अपनी स्वयं की पहचान खो देता है और केवल समाज की बनावट में फिट होने का प्रयास करता है।
4. आत्म-जागरूकता: मुक्तिवाणी की कुंजी
इस पूरी यात्रा में आत्म-जागरूकता का महत्व अतुलनीय है। आत्म-जागरूकता का अर्थ है अपने भीतर झांकना, अपने मन, शरीर और आत्मा को समझना, और उस आंतरिक सत्य को पहचानना जो हमारे अस्तित्व का मूल है। जब हम जागरूक होते हैं, तो हम अपने अंदर की आवाज़ को सुनते हैं, जो हमें यह बताती है कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। यह वह आवाज़ है जो हमें बाहरी आदेशों के अंधेरे से बाहर निकालकर, उजाले में ले जाती है।
ध्यान से जुड़ी यह जागरूकता हमें बाहरी शोरगुल से दूर ले जाती है और हमें हमारे अंदर के शांति, प्रेम और आनंद की अनुभूति कराती है। ओशो कहते हैं: **"जाग्रत होकर जियो, अपने जीवन के हर पल को आत्मिक ऊर्जा से भर दो।"** यह एक न केवल एक आह्वान है, बल्कि एक जीवन दर्शन भी है, जो हमें यह समझाता है कि बाहरी आदेशों का पालन करने से पहले, हमें अपने भीतर झाँककर यह देखना चाहिए कि क्या वह आदेश हमारे आत्मिक स्वरूप के अनुरूप है।
5. आत्म-निर्णय और सच्ची स्वतंत्रता
जब हम केवल बाहरी आदेशों का पालन करते हैं, तो हम एक प्रकार की मानसिक गुलामी में फंस जाते हैं। हमें लगता है कि समाज के नियमों का पालन करना ही सही है, लेकिन वास्तव में यह हमें उस स्वतंत्रता से वंचित कर देता है, जो हमारे अंदर निहित है। आत्म-निर्णय का मतलब है—अपने फैसले स्वयं लेना, अपनी आवाज़ को पहचानना, और उस निर्णय पर चलना जो हमारे आंतरिक सत्य से मेल खाता हो।
इसलिए, यदि कोई व्यक्ति समाज की आज्ञाओं के अंधानुकरण में जी रहा है, तो उसे यह समझना चाहिए कि असली स्वतंत्रता तब आती है जब हम अपनी आंतरिक आवाज़ को सुनते हैं। यह आत्म-निर्णय ही है जो हमें जीवन के प्रति एक नई समझ, एक नई दिशा देता है। बाहरी आदेश हमें एक दिशा तो दिखा सकते हैं, लेकिन सही मार्गदर्शन तो हमारे भीतर से ही आता है।
6. एक कहानी: आत्म-साक्षात्कार की यात्रा
अब मैं आपको एक और कहानी सुनाना चाहता हूँ, जो इस बात का प्रतीक है कि कैसे बाहरी आदेशों का अंधानुकरण व्यक्ति को उसकी स्वयं की चेतना से दूर कर देता है।
एक बार की बात है, एक शहर में एक युवक था जिसका नाम अर्जुन था। अर्जुन हमेशा समाज के नियमों और परंपराओं का पालन करता था। उसके माता-पिता, शिक्षक और समाज की बड़ी-बड़ी संस्थाएँ उसे यह संदेश देती थीं कि "जो कुछ भी प्रचलित है, वही सही है।" अर्जुन ने इन सभी आज्ञाओं का पालन बिना किसी प्रश्न के किया। उसने अपनी पसंद-नापसंद, अपने विचारों और इच्छाओं को समाज के नियमों के अनुसार ढाल लिया।
एक दिन अर्जुन के शहर में एक नया नियम आया—"हर व्यक्ति को सुबह-सुबह एक विशेष मंत्र का उच्चारण करना अनिवार्य है।" यह मंत्र सुनकर, अर्जुन ने बिना सोचे-समझे उसे अपने दिनचर्या का हिस्सा बना लिया। लेकिन जल्द ही उसे महसूस हुआ कि यह मंत्र उसके दिल के करीब नहीं है। उसमें वह गहराई, वह सच्चाई नहीं थी, जो उसे अंदर से महसूस होनी चाहिए थी।
अर्जुन ने सोचा, "क्या मैंने कभी अपने मन से पूछा कि मुझे क्या सही लगता है? या मैंने हमेशा बाहरी आदेशों का पालन किया है?" इस प्रश्न ने उसकी चेतना में हलचल मचा दी। उसने ध्यान करना शुरू किया, स्वयं से संवाद स्थापित किया, और धीरे-धीरे अपनी भीतरी आवाज़ को सुनना सीखा। उसने महसूस किया कि उसके भीतर एक अनकही सच्चाई थी, जो समाज की अपेक्षाओं से बिल्कुल अलग थी।
अर्जुन ने अपने जीवन की उस दिशा को बदलने का निर्णय लिया। उसने समाज के निर्धारित नियमों को छोड़ दिया और अपने अंदर की आवाज़ के अनुसार चलने लगा। इस परिवर्तन के साथ ही, उसका जीवन नई ऊर्जा, नई रचनात्मकता और नए उत्साह से भर गया। उसने जाना कि असली स्वतंत्रता वही है, जब हम बाहरी आदेशों से मुक्त होकर, अपने स्वयं के निर्णय पर चलें। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि बाहरी नियमों का पालन करना हमें एक निर्धारित पथ पर तो ले जा सकता है, लेकिन असली विकास तभी संभव है जब हम अपने अंदर की सच्चाई को अपनाएँ।
7. हास्य और व्यंग्य के साथ चेतना का संदेश
ओशो की भाषा शैली में व्यंग्य और हास्य का भी अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। हम अक्सर देखते हैं कि समाज किस प्रकार छोटे-छोटे नियमों के नाम पर हमें नियंत्रित करने की कोशिश करता है। उदाहरण के तौर पर, imagine कीजिए कि किसी कार्यालय में नियम यह हो कि "प्रत्येक कर्मचारी को अपने डेस्क पर एक पौधा रखना अनिवार्य है।" यहाँ पौधा रखना एक सुंदर विचार हो सकता है, पर अगर हर कोई केवल नियम के पालन के लिए पौधा रख ले, तो क्या वह पौधा वास्तव में उनके दिल की इच्छाओं से उगता है? शायद नहीं। इस व्यंग्य में एक गहरी सच्चाई छुपी है—जब हम बिना सोचे-समझे नियमों का पालन करते हैं, तो हम उस रचनात्मक ऊर्जा को दबा देते हैं, जो हमारी आत्मा को जीवंत करती है।
यह व्यंग्य हमें याद दिलाता है कि हमारी अपनी स्वायत्तता, हमारी अपनी आत्मा की पुकार कहीं और नहीं, बल्कि हमारे भीतर है। हमें उस छोटी-छोटी बातों में भी अपनी आत्मा की आवाज़ सुननी चाहिए, और अगर कोई नियम उस आवाज़ के विरुद्ध जाता है, तो उसे स्वीकार करने से पहले अपने भीतर झांकना चाहिए। यही ओशो का संदेश है—बाहरी आदेशों का पालन करना आसान हो सकता है, परंतु असली स्वतंत्रता उसी में है जब हम अपने मन की सुनें।
8. ध्यान: आत्मा की कुंजी
ध्यान करना, स्वयं के भीतर झांकना और आत्म-जागरूकता प्राप्त करना, यही हमारे जीवन की सच्ची कुंजी है। ध्यान के माध्यम से हम अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों की गहराई तक जा सकते हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो हमें बाहरी दुनिया के शोर से दूर ले जाती है और हमें अपने भीतर की असीम शांति, प्रेम और आनंद से परिचित कराती है।
ओशो अक्सर कहते थे, "सत्य तुम्हारे भीतर है, इसे कहीं और मत खोजो।" यह वाक्यांश न केवल एक आध्यात्मिक निर्देश है, बल्कि एक चेतावनी भी है। यह हमें यह बताता है कि बाहरी स्रोतों में सच्चा आनंद और स्वतंत्रता नहीं मिल सकती, बल्कि यह सब हमारे अंदर के अज्ञात, अनकहे सत्य में ही निहित है। ध्यान के अभ्यास से हम उस अज्ञात को जान सकते हैं, उसे समझ सकते हैं और अंततः अपनी स्वयं की आवाज़ बन सकते हैं।
ध्यान की प्रक्रिया में हमें अपने विचारों को, अपनी भावनाओं को और अपनी प्रतिक्रियाओं को बिना किसी पूर्वाग्रह के देखना होता है। जब हम ऐसा करते हैं, तो हम न केवल स्वयं को समझते हैं, बल्कि हमें यह भी ज्ञात होता है कि कौन से आदेश हमारे लिए सही हैं और कौन से आदेश केवल बाहरी दबाव के कारण हैं। इस समझ के साथ हम अपने जीवन में एक नई दिशा और नया उद्देश्य पा सकते हैं।
9. समाज और स्वयं के बीच संतुलन
समाज के नियम और परंपराएँ हमारे जीवन का हिस्सा हैं, और उनमें से कई हमारे विकास में सहायक भी होती हैं। परंतु, जब हम उन नियमों का अंधानुकरण करते हैं, तो हम अपनी स्वयं की पहचान और स्वतंत्रता खो देते हैं। यह संतुलन बनाना अत्यंत महत्वपूर्ण है—जहाँ हम समाज के सकारात्मक नियमों का पालन भी करें, लेकिन साथ ही अपनी भीतरी आवाज़ को भी महत्व दें।
इस संतुलन की कुंजी यह है कि हम अपने भीतर झांकें, अपनी आत्मा की पुकार को सुनें, और फिर उस आधार पर अपने निर्णय लें। बाहरी आदेश तभी सही होते हैं, जब वे हमारी आंतरिक सत्यता के अनुरूप हों। यदि कोई आदेश हमारे दिल से नहीं आता, तो उसे स्वीकार करने से पहले हमें अपने भीतर की गहराई में जाकर यह देखना चाहिए कि क्या वह हमारे आत्मिक विकास में सहायक है या नहीं।
10. ओशो के अन्य विचार: जीवन का सतत उत्सव
ओशो के शिक्षण में हमेशा यह बात प्रमुख रही है कि जीवन एक सतत उत्सव है, एक ऐसी यात्रा है जहाँ हर पल, हर क्षण का महत्व है। उन्होंने हमें यह भी सिखाया कि हमे केवल बाहरी परंपराओं और नियमों में नहीं उलझ जाना चाहिए, बल्कि अपने भीतर के उत्सव को महसूस करना चाहिए। ओशो कहते हैं: **"जाग्रत होकर जियो, अपने जीवन के हर पल को आत्मिक ऊर्जा से भर दो।"** यह संदेश हमें यह बताता है कि जब हम अपने भीतर जागरूक होते हैं, तभी हम अपने जीवन को पूरी तरह से जी सकते हैं।
इस बात को समझने के लिए हमें यह समझना होगा कि जीवन में उत्साह, आनंद और स्वतंत्रता केवल बाहरी साधनों से नहीं आते, बल्कि हमारी आंतरिक चेतना से आते हैं। जब हम बाहरी आदेशों का पालन करते हैं, तो हम एक तरह की 'कॉलाज' बना लेते हैं, जहाँ हमारे असली स्व से दूर हो जाते हैं। लेकिन जब हम जागरूक होते हैं, तब हमारे अंदर एक ऐसी ऊर्जा उत्पन्न होती है जो हमें सच्चे अर्थों में जीवन का उत्सव मनाने के लिए प्रेरित करती है।
11. निष्कर्ष: अपनी आंतरिक आवाज़ का सम्मान करें
इस प्रवचन का सार यह है कि हमें हमेशा उस आज्ञा का पालन करना चाहिए, जो हमारे भीतर से आती है। बाहरी आदेश, नियम और परंपराएँ केवल तभी सहायक हो सकती हैं जब वे हमारी आंतरिक चेतना से मेल खाती हों। जब हम अपने भीतर झांकते हैं, तो हमें पता चलता है कि हमारे अंदर एक अनंत स्रोत है, एक ऐसी ऊर्जा है जो हमें सही दिशा दिखाती है।
हमें यह समझना चाहिए कि समाज की बनाई हुई जंजीरें हमें बाँध सकती हैं, परंतु हमारी भीतरी आवाज़ हमें आज़ाद कर सकती है। हमें उस आवाज़ को सुनना चाहिए जो हमें बताती है कि हमें क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए। यह आवाज़ हमारे भीतर की सच्चाई है, जो हमें एक पूर्ण, स्वतंत्र और आनंदमय जीवन की ओर ले जाती है।
ओशो के शब्दों में कहें तो, "सत्य तुम्हारे भीतर है, इसे कहीं और मत खोजो।" यह वाक्य हमें यह याद दिलाता है कि बाहरी दुनिया में खोजी गई सत्यता केवल एक प्रतिबिंब है, जबकि असली सत्य हमारे अंदर निहित है।
12. आत्मा की पुकार और स्वतंत्रता की ओर यात्रा
हमारी यात्रा उस पल शुरू होती है जब हम अपनी आंतरिक आवाज़ को सुनना शुरू करते हैं। यह एक ऐसी यात्रा है जहाँ हम बाहरी आदेशों के शोर से परे जाकर, अपनी आत्मा की पुकार को महसूस करते हैं। यह पुकार हमें बताती है कि हमें किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, किस निर्णय को अपनाना चाहिए।
जब हम अपने भीतर की इस पुकार को सुनते हैं, तब हम एक नई ऊर्जा, नए उत्साह और नई रचनात्मकता के साथ अपने जीवन की राह चुनते हैं। यह स्वतंत्रता हमें उस मानसिक गुलामी से मुक्त कर देती है, जहाँ हम समाज के नियमों में उलझकर अपनी स्वयं की पहचान खो देते हैं।
एक बार फिर याद दिलाता चलूँ—जब भी आपको कोई बाहरी आदेश प्रस्तुत किया जाए, तो पहले एक गहरी साँस लें, अपने मन को शांत करें, और पूछें: "क्या यह आदेश मेरे भीतर की आवाज़ से मेल खाता है?" यदि उत्तर सकारात्मक हो, तो उसे स्वीकार करें, परंतु यदि नकारात्मक हो, तो उसे अस्वीकार करने का साहस जुटाएं। यही वह पथ है जो आपको आत्मिक स्वतंत्रता की ओर ले जाएगा।
13. हास्य, व्यंग्य और कहानी के माध्यम से सीख
हास्य और व्यंग्य का प्रयोग भी ओशो की शिक्षाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ये हमें उस गंभीरता से हटाकर, जीवन के उन पहलुओं को भी समझने में मदद करते हैं जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। व्यंग्य हमें इस बात का अहसास दिलाता है कि समाज के द्वारा थोपे गए नियम कभी-कभी कितने हास्यास्पद होते हैं। उदाहरण के लिए, कल्पना कीजिए कि किसी ऑफिस में नियम हो कि "प्रत्येक कर्मचारी को हर दिन एक समान पोशाक पहननी होगी।" इससे कर्मचारी अपनी रचनात्मकता खो देते हैं और हर दिन एक तरह के ही दिखते हैं। यह नियम दिखाता है कि कैसे बाहरी आदेश व्यक्ति की अनूठी पहचान को दबा देते हैं।
इस तरह की व्यंग्यात्मक कहानियाँ हमें यह सीख देती हैं कि हमें अपने अंदर की विविधता, अपनी अनूठी पहचान को संजोकर रखना चाहिए। यदि हम बाहरी आदेशों के अंधानुकरण में फंस जाते हैं, तो हमारी यह अनूठी पहचान धुंधली पड़ जाती है, और हम एक ऐसे समूह में मिल जाते हैं जहाँ हर व्यक्ति एक जैसी सोच और व्यवहार अपनाने लगता है।
14. ध्यान, आत्म-जागरूकता और जीवन का उत्सव
ध्यान और आत्म-जागरूकता का अभ्यास हमारे जीवन में परिवर्तन लाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब हम नियमित ध्यान करते हैं, तो हम अपने मन की गहराइयों तक पहुँचते हैं और वहां छिपी हुई अनंत संभावनाओं का अनुभव करते हैं। यह अभ्यास हमें इस बात का एहसास कराता है कि जीवन का असली आनंद वही है, जो हमारे भीतर निहित है।
जब हम ध्यान के माध्यम से अपनी भीतरी ऊर्जा को महसूस करते हैं, तब हम उस ऊर्जा से परिपूर्ण हो जाते हैं जो हमें न केवल बाहरी दुनिया से लड़ने में मदद करती है, बल्कि हमें अपने भीतर के शांति, प्रेम और आनंद से भी भर देती है। इस प्रकार, हम जीवन के हर पल को जागरूकता और आनंद के साथ जी पाते हैं।
15. समाज, आदेश और आपकी आत्मा का संवाद
समाज के आदेश चाहे कितने भी कठोर या सुन्दर क्यों न हों, अगर वे आपकी आत्मा की पुकार से मेल नहीं खाते, तो वे आपके लिए सही नहीं हो सकते। हमारी आत्मा एक ऐसी संगीतमय धारा है, जो निरंतर हमारे भीतर बहती रहती है। इसे सुनने के लिए हमें अपने मन को शांत करना होगा और बाहरी शोर को दूर करना होगा।
जब हम अपने भीतर के उस संगीत को सुनते हैं, तो हमें पता चलता है कि असली स्वतंत्रता क्या है। यह स्वतंत्रता हमें बाहरी आदेशों के दबाव से मुक्त कर देती है और हमें एक ऐसी दिशा में ले जाती है, जहाँ हम स्वयं के निर्माता बन जाते हैं। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बाहरी आदेश केवल तभी सही होते हैं, जब वे हमारे अंदर की आवाज़ के अनुरूप हों।
16. समग्र दृष्टिकोण: बाहरी और भीतरी के बीच संतुलन
इस प्रवचन का अंतिम संदेश यह है कि हमें बाहरी आदेशों और अपने भीतर की आवाज़ के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। समाज के नियम, परंपराएँ और आदेश हमें एक दिशा तो दिखाते हैं, लेकिन हमारे अंदर की चेतना हमें सही मार्गदर्शन देती है। जब हम दोनों का संतुलन बनाए रखते हैं, तो हमारा जीवन एक नई ऊंचाइयों को छूने लगता है।
ओशो की शिक्षाएं हमें यही कहती हैं—"जाग्रत होकर जियो।" इसका अर्थ है कि हर पल, हर क्षण अपने भीतर के सत्य को महसूस करो और उसी के अनुसार अपने फैसले लो। बाहरी आदेश हमें एक प्रकार की संरचना तो प्रदान करते हैं, परंतु असली जीवन वही है जो हमारे अंदर की ऊर्जा, प्रेम और स्वतंत्रता से भरपूर हो।
17. एक आह्वान: अपनी भीतरी आवाज़ को पहचानें
मित्रों, आइए हम एक बार फिर अपने आप से प्रश्न करें—क्या हम वास्तव में अपने भीतर की आवाज़ सुनते हैं? क्या हम अपने मन की गहराई में जाकर उस असीम सत्य को पहचानते हैं, जो हमारे अस्तित्व का मूल है? अगर नहीं, तो यह समय है जागने का, अपने भीतर झांकने का और उस आवाज़ को सुनने का जो आपको बताती है कि आपका वास्तविक मार्ग क्या है।
जब हम बाहरी आदेशों का अंधानुकरण करते हैं, तो हम स्वयं को एक ऐसे जंजीर में बाँध लेते हैं, जहाँ हमारी असली स्वतंत्रता, हमारी असली रचनात्मकता और हमारी आत्मिक ऊर्जा धुंधली पड़ जाती है। परंतु जब हम अपनी भीतरी आवाज़ को पहचानते हैं और उस पर विश्वास करते हैं, तो हम स्वयं को एक नए, स्वतंत्र और सशक्त जीवन की ओर ले जाते हैं।
18. जीवन में परिवर्तन की आवश्यकता
अंततः, यह समझना आवश्यक है कि बाहरी आदेश और नियम हमें एक ढांचे में बाँध सकते हैं, परंतु हमारे भीतर की ऊर्जा ही वह चिंगारी है, जो हमें जीवन में परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित करती है। ओशो कहते हैं, "सत्य तुम्हारे भीतर है, इसे कहीं और मत खोजो।" इस सत्य का अर्थ यह है कि बाहरी दुनिया में जितनी भी चमक-धमक है, वह केवल एक प्रतिबिंब है; असली शक्ति, असली ज्ञान और असली स्वतंत्रता हमारे भीतर निहित है।
इसलिए, हमें यह सीख लेना चाहिए कि जीवन में कोई भी आदेश, नियम या परंपरा तभी मान्य है, जब वह हमारी आंतरिक चेतना से मेल खाता हो। जब हम इस सिद्धांत को आत्मसात कर लेते हैं, तो हमारा जीवन न केवल अधिक संतुलित होता है, बल्कि उसमें एक नई ऊर्जा, नई रचनात्मकता और सच्ची स्वतंत्रता भी आ जाती है।
19. समापन विचार: एक सतत यात्रा
मित्रों, यह प्रवचन केवल एक संदेश नहीं है, बल्कि एक सतत यात्रा का आह्वान है। एक ऐसी यात्रा जहाँ हम बाहरी आदेशों को चुनौतियों के रूप में लेते हैं, लेकिन अपने भीतर की आवाज़ को सुनकर, अपने अंदर के सत्य को पहचानते हुए आगे बढ़ते हैं। यह यात्रा हमें सिखाती है कि असली स्वतंत्रता और आनंद केवल उसी समय संभव हैं, जब हम अपने स्वयं के निर्माता बन जाते हैं।
ओशो के विचार हमें यह भी बताते हैं कि बाहरी आदेशों का पालन करना, चाहे वह कितना भी सरल या सहज क्यों न लगे, एक दिन हमें उस वास्तविकता से दूर कर सकता है जो हमारी आत्मा को जीने के लिए आवश्यक है। इसलिए, हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि जीवन का असली उद्देश्य बाहरी आदेशों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपे असीम सत्य में है।
20. एक अंतिम संदेश
जैसे ही आप इस प्रवचन को पढ़ते हैं, अपने मन में एक गहरी जागरूकता पैदा करें। बाहरी आदेशों और नियमों का पालन करने से पहले, एक पल ठहरकर अपने भीतर झांकें, उस सच्चाई को महसूस करें जो आपके दिल की पुकार है। यदि वह आदेश आपके भीतर से नहीं आता, तो उसे स्वीकार करने से पहले अपने मन की सुनें। यही वह मार्ग है जो आपको सच्ची स्वतंत्रता, आनंद और आत्मिक विकास की ओर ले जाएगा।
साथियों, चलिए इस आज्ञा को अपनाएँ—"उस आज्ञा का पालन कभी मत करना जो तुम्हारे भीतर से न आती हो!!" इस संदेश को अपने जीवन में गहराई से उतारिए, और हर दिन अपने भीतर की उस सच्चाई को महसूस कीजिए जो आपके अस्तित्व का मूल है। बाहरी आदेशों के जाल से मुक्त होकर, अपनी आत्मा की आवाज़ को सुनिए, और जीवन के हर क्षण को जागरूकता, प्रेम और आनंद से भर दीजिए।
इस प्रवचन के माध्यम से हमने देखा कि कैसे बाहरी आदेश हमारे जीवन में बाधाएँ उत्पन्न करते हैं, और कैसे ध्यान, आत्म-जागरूकता तथा अपने भीतर झांकने की प्रक्रिया हमें असली स्वतंत्रता प्रदान करती है। याद रखिए, बाहरी आदेश चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, जब तक हम अपनी आंतरिक आवाज़ को पहचानने का साहस नहीं जुटाते, तब तक हम अपने वास्तविक स्व से दूर ही रहेंगे।
जागो, स्वयं से संवाद करो, और वह आवाज़ सुनो जो कहती है—"सत्य तुम्हारे भीतर है, इसे कहीं और मत खोजो।" इसी सच्चाई में छुपा है आपका जीवन, आपकी रचनात्मकता और आपकी अनंत स्वतंत्रता।
इस प्रवचन के माध्यम से मैं आप सभी से यही निवेदन करता हूँ कि अपने जीवन के हर निर्णय में, हर छोटे-बड़े कदम में, पहले अपने भीतर झांकें। समाज की परंपराओं और नियमों का अंधानुकरण न करें, बल्कि उस सच्चाई को अपनाएँ जो आपके दिल से निकलती है। यही वह मार्ग है जो आपको आत्मिक रूप से समृद्ध बनाएगा, आपको सच्चा आनंद देगा और आपको एक स्वतंत्र, रचनात्मक जीवन जीने की प्रेरणा देगा।
याद रखिए, जीवन एक सतत यात्रा है, और इस यात्रा में असली साथी आपके भीतर की आवाज़ है। इसे सुनिए, इसे समझिए, और इसे अपनाइए। क्योंकि जब आप अपने भीतर के सत्य को पहचानते हैं, तब ही आप वास्तव में अपने जीवन के स्वामी बन सकते हैं।
धन्यवाद, और सदैव जाग्रत होकर जियें।
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