"कृष्ण कह रहे हैं कि तू सब छोड़ दे। बुरा-भला सब मुझ पर छोड़ दे। तू जो भी कर रहा है, उसमें तू करने वाला मत रह। तू जान कि मैं तेरे भीतर से कर रहा हूं। तू ऐसा अर्पित हो जा।" — ओशो
भूमिका: जीवन की सबसे बड़ी कला—अर्पण
कृष्ण का यह संदेश साधारण नहीं है।
यह केवल धार्मिक शिक्षा नहीं है, बल्कि यह जीवन की सबसे गहरी कला है—अर्पण की कला।
और जब ओशो इस पर बोलते हैं, तो यह कोई रूढ़िवादी प्रवचन नहीं रह जाता,
बल्कि यह जीवन के पूर्ण उत्सव की चाबी बन जाता है।
"अर्पण" का अर्थ क्या है?
"सब छोड़ देना" का मतलब क्या है?
क्या यह भाग जाना है?
क्या यह संन्यास है?
क्या यह कर्म से पलायन है?
नहीं!
कृष्ण जब कहते हैं, "सब छोड़ दे", तो वे कायरता की बात नहीं कर रहे।
वे कह रहे हैं—
- "सब छोड़, लेकिन कर्म मत छोड़।"
- "कर्तापन छोड़, लेकिन कर्तव्य मत छोड़।"
- "इच्छाएं छोड़, लेकिन प्रेम मत छोड़।"
- "अहंकार छोड़, लेकिन जीवन का आनंद मत छोड़।"
यही गीता का सार है।
यही कृष्ण का रहस्य है।
यही ओशो हमें समझाना चाहते हैं।
तो चलो, इसे गहराई से समझते हैं।
1. क्या वास्तव में हम करने वाले हैं?
तुम सोचते हो कि तुम जीवन चला रहे हो।
लेकिन क्या यह सच है?
अगर तुम जीवन चला रहे होते,
- तो तुम कभी दुखी न होते।
- तो तुम्हें कोई समस्या न होती।
- तो तुम जैसा चाहते, वैसा ही सब कुछ होता।
लेकिन ऐसा नहीं है।
कभी-कभी तुम्हारा पूरा प्रयास असफल हो जाता है।
तुम सोचते कुछ हो, और होता कुछ और है।
तो कौन कर रहा है?
कौन चला रहा है इस पूरे खेल को?
ओशो कहते हैं,
"जिस दिन तुम्हें अहसास हो गया कि तुम कुछ भी नहीं कर रहे,
उस दिन पहली बार तुम सच में जीना शुरू करोगे।"
2. कर्तापन अहंकार को जन्म देता है
हम मानते हैं कि हम ही करने वाले हैं।
और यह अहंकार की जड़ है।
तुम देखोगे—
जब तुम कुछ अच्छा कर लेते हो, तो तुम्हें गर्व होता है।
तुम्हें लगता है कि "मैंने किया!"
और जब कुछ गलत हो जाता है, तो तुम या तो खुद को दोषी मानते हो, या फिर किसी और को दोषी ठहराते हो।
लेकिन कृष्ण कहते हैं—
"न तुम करने वाले हो, न कोई और।
बस जीवन बह रहा है, बस अस्तित्व काम कर रहा है।"
अगर यह समझ आ जाए,
तो सारा तनाव खत्म हो जाता है।
फिर कोई चिंता नहीं रहती।
फिर तुम सहज हो जाते हो।
3. अर्पण का अर्थ क्या है?
"अर्पण" का मतलब पलायन नहीं है।
"अर्पण" का मतलब समर्पण है।
लेकिन किसको अर्पण?
- किसी व्यक्ति को नहीं।
- किसी संस्था को नहीं।
- किसी धर्म को नहीं।
- किसी गुरु को नहीं।
अर्पण करना है "अस्तित्व को", उस शक्ति को जो हमें चला रही है।
ओशो कहते हैं,
"जब तुम अर्पण कर देते हो, तब पहली बार जीवन में बहना शुरू होता है।"
तुमने देखा होगा—
नदी खुद को सागर को अर्पित कर देती है।
और जब वह सागर में मिलती है, तो उसकी पहचान मिट जाती है।
वह अब सिर्फ "नदी" नहीं रहती, वह "समुद्र" बन जाती है।
यही तुम्हारे साथ हो सकता है।
अगर तुम कृष्ण की इस बात को समझ सको,
तो तुम पहली बार व्यक्तिगत जीवन से अस्तित्व के महासागर में प्रवेश कर सकते हो।
4. कृष्ण और अर्पण की कला
कृष्ण ही ऐसे हैं जो पूर्ण अर्पण को जीते हैं।
वे न तो योगी हैं, न ही सन्यासी।
वे न तो भागे हुए हैं, न ही संन्यास की कठोर साधना में लगे हैं।
वे हर जगह हैं—
- कभी वे रणभूमि में हैं,
- कभी वे गोपियों के साथ नृत्य कर रहे हैं,
- कभी वे अर्जुन को गीता का ज्ञान दे रहे हैं,
- और कभी वे माखन चुरा रहे हैं।
फिर भी वे हर क्षण शांत हैं, सहज हैं, अर्पित हैं।
वे कुछ भी कर सकते हैं, लेकिन उनमें अहंकार नहीं है।
वे सब कुछ छोड़ चुके हैं, फिर भी जीवन को पूरी तरह जी रहे हैं।
यही असली रहस्य है।
यही कृष्ण का जादू है।
5. आज के समय में अर्पण का अर्थ
आज के समय में लोग कहते हैं—
"सब छोड़ देने का क्या मतलब है? क्या हम अपने काम छोड़ दें?
क्या हम अपने परिवार को छोड़ दें? क्या हम जिम्मेदारियों से भाग जाएं?"
नहीं!
कृष्ण का संदेश यह नहीं है कि तुम संन्यासी बन जाओ और जंगल में भाग जाओ।
कृष्ण कहते हैं—
"जिम्मेदारी निभाओ, लेकिन कर्तापन मत रखो।
जीवन को पूरी तरह जियो, लेकिन उसमें अटको मत।"
अगर तुम यह समझ गए, तो तुम्हारे भीतर एक अजीब हल्कापन आ जाएगा।
तुम्हारा जीवन एक खेल की तरह बन जाएगा।
फिर तुम चिंता नहीं करोगे कि क्या होगा, क्या नहीं होगा।
6. ध्यान और अर्पण का गहरा संबंध
ओशो कहते हैं—
"ध्यान ही अर्पण की कुंजी है।"
जब तुम ध्यान में बैठते हो, तो धीरे-धीरे
- विचार कम हो जाते हैं,
- मन हल्का हो जाता है,
- कर्तापन का भाव मिटने लगता है।
और जब यह पूरी तरह मिट जाता है,
तब तुम समझते हो कि "मैं कुछ नहीं कर रहा, सब कुछ स्वयं हो रहा है।"
तब पहली बार तुम पूर्ण अर्पण में आ जाते हो।
7. निष्कर्ष: जीवन एक नृत्य बन सकता है!
अगर तुम इस पूरी बात को समझ सको,
तो तुम्हारा जीवन एक नृत्य बन सकता है।
फिर तुम्हें चिंता नहीं होगी कि क्या सही है, क्या गलत है।
फिर तुम हर क्षण को पूरी तरह जी सकोगे।
तो सार क्या है?
1. तुम कुछ नहीं कर रहे—यह समझना ही पहला कदम है।
2. कर्तापन अहंकार को जन्म देता है—इसे छोड़ना होगा।
3. अर्पण का मतलब जिम्मेदारी से भागना नहीं, बल्कि उसे सहजता से निभाना है।
4. कृष्ण ने इसे पूरी तरह जिया, हम भी इसे जी सकते हैं।
5. ध्यान ही अर्पण की कुंजी है।
अगर तुम इस रहस्य को समझ सको,
तो तुम्हारा जीवन भी कृष्ण की तरह आनंदमय, सहज और मुक्त हो सकता है।
अब सवाल यह है—
क्या तुम अर्पण करने को तैयार हो?
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