"कृष्ण मेरे लिए आनंद के संन्यासी हैं। कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊँचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं, रोते हुए नहीं हैं।" — ओशो

कृष्ण एक पहेली हैं।
कृष्ण एक विरोधाभास हैं।
कृष्ण संन्यास भी हैं और संसार भी।
कृष्ण ध्यान भी हैं और प्रेम भी।
कृष्ण गीता के गंभीर श्लोक भी हैं और बांसुरी की मस्ती भी।
कृष्ण युद्ध के मैदान में भी हैं और रासलीला में भी।
और यही उनकी महानता है।
यही उनका रहस्य है।
यही उन्हें सबसे अनूठा बनाता है।
"कृष्ण आनंद के संन्यासी हैं!"
यह वाक्य ही संन्यास की परिभाषा को बदल देता है।
क्योंकि आज तक संन्यासी का अर्थ त्याग से जोड़ा गया था, तपस्या से जोड़ा गया था, गंभीरता से जोड़ा गया था।
लेकिन कृष्ण तो नाचते हुए संन्यासी हैं।
वे हँसते हुए, खेलते हुए, प्रेम करते हुए, युद्ध करते हुए भी संन्यास में हैं।
उनके लिए संन्यास कोई बोझ नहीं, बल्कि सहजता है।
तो चलो, इस सत्य को गहराई से समझते हैं।

1. कृष्ण गंभीर क्यों नहीं हैं?

ओशो कहते हैं, "जो सत्य को जान लेता है, वह हँस पड़ता है।"
तुमने देखा होगा—बच्चे कितना हँसते हैं, कितना खेलते हैं।
क्यों?
क्योंकि उनके पास कोई बोझ नहीं है, कोई विचार नहीं है, कोई भविष्य की चिंता नहीं है।
लेकिन जैसे-जैसे आदमी बड़ा होता जाता है, वह गंभीर होता जाता है। क्योंकि उसे सिखाया जाता है कि "गंभीर बनो, जिम्मेदार बनो, चिंता करो, दुखी रहो, त्याग करो, संन्यासी बनो!"
लेकिन कृष्ण इन सबके पार चले गए।
कृष्ण जानते हैं कि जीवन एक खेल है।
"जो खेल को खेल की तरह जी ले, वही कृष्ण की तरह जी सकता है!"
गंभीरता अज्ञान का परिणाम है।
जो व्यक्ति सत्य को नहीं जानता, वही जीवन को भारी बनाता है।
लेकिन जिसने सत्य को जान लिया, उसके लिए जीवन एक उत्सव बन जाता है।
कृष्ण उसी उत्सव के प्रतीक हैं।

2. कृष्ण धर्म के शिखर पर भी हैं और आनंद से भरे भी!

अब तक के संतों को देखो—
- महावीर को देखो, वे संन्यास में हैं, लेकिन गहन गंभीरता में हैं।
- बुद्ध को देखो, वे ध्यान में हैं, लेकिन उनकी आँखों में मौन की गहराई है।
- शंकराचार्य को देखो, वे अद्वैत में हैं, लेकिन उनका ज्ञान एक दार्शनिक गूढ़ता लिए हुए है।
लेकिन कृष्ण को देखो—
वे शुद्ध प्रेम हैं, वे संन्यास में भी मस्त हैं, वे युद्ध में भी आनंदित हैं।
"कृष्ण जितने धार्मिक हैं, उतने ही सांसारिक भी!"
- वे गोपियों संग प्रेम करते हैं, लेकिन आसक्ति नहीं रखते।
- वे अर्जुन को युद्ध का उपदेश देते हैं, लेकिन स्वयं युद्ध से अलग रहते हैं।
- वे राजा भी हैं, लेकिन योगी भी हैं।
"कृष्ण पूर्णता हैं!"
वे धर्म को उदासी और गंभीरता से मुक्त करते हैं।
वे हमें दिखाते हैं कि धर्म का मतलब त्याग नहीं, बल्कि पूर्णता में जीना है।

3. संन्यास का सही अर्थ: आनंद

ओशो कहते हैं, "सच्चा संन्यास त्याग में नहीं, बल्कि आनंद में है।"
अब तक के संन्यास को देखो—
- कोई कहता है, "संसार छोड़ दो!"
- कोई कहता है, "माया छोड़ दो!"
- कोई कहता है, "इच्छा छोड़ दो!"
लेकिन कृष्ण कुछ छोड़ने को नहीं कहते।
कृष्ण कहते हैं—"बस जागो!"
"अगर तुम जाग गए, तो कुछ छोड़ने की जरूरत नहीं। तब संसार तुम्हारे लिए बंधन नहीं रहेगा। तब संसार तुम्हें जकड़ेगा नहीं।"
कृष्ण हमें सिखाते हैं कि असली संन्यास भागने में नहीं, बल्कि गहराई से जीने में है।
वे कहते हैं—
- जीवन को जीयो, लेकिन होश में रहो।
- प्रेम करो, लेकिन गुलाम मत बनो।
- नाचो, गाओ, खेलो—लेकिन जागरूक रहो।
यही कृष्ण का संन्यास है—आनंद का संन्यास!

4. कृष्ण की लीला: जीवन को खेल की तरह जियो

ओशो कहते हैं, "कृष्ण की सबसे बड़ी विशेषता उनकी लीला है!"
कृष्ण के हर कर्म को देखो—
वे उसे बहुत सहजता से करते हैं, जैसे खेल रहे हों।
- वे प्रेम भी खेल की तरह करते हैं।
- वे राजनीति भी खेल की तरह करते हैं।
- वे युद्ध भी खेल की तरह करते हैं।
कृष्ण हमें सिखाते हैं कि जीवन को गंभीरता से मत लो, इसे एक खेल की तरह लो।
"जब जीवन खेल बन जाता है, तब उसमें कोई तनाव नहीं रहता, कोई संघर्ष नहीं रहता, कोई बोझ नहीं रहता।"
लेकिन हमने जीवन को बहुत भारी बना लिया है।
हम हर चीज को लेकर गंभीर हो जाते हैं—
- "क्या होगा?"
- "क्या लोग कहेंगे?"
- "क्या मेरा भविष्य सुरक्षित है?"
लेकिन कृष्ण कहते हैं, "जियो! अभी और यहीं।"
क्योंकि यह क्षण ही सत्य है।
बाकी सब तो कल्पना है।

5. कृष्ण और ओशो: दोनों आनंद के संन्यासी

ओशो स्वयं कृष्ण की इस ऊर्जा को जीते थे।
वे स्वयं संन्यास के नाम पर गंभीरता को नहीं मानते थे।
वे कहते थे, "संन्यास का मतलब जीवन को बोझ बनाना नहीं, बल्कि उसे हल्का करना है!"
ओशो का संन्यास भी आनंद का संन्यास था—
- नाचो, गाओ, ध्यान करो।
- प्रेम करो, लेकिन बंध मत जाओ।
- स्वतंत्र रहो, लेकिन जिम्मेदार भी रहो।
ओशो ने कृष्ण के संन्यास को आधुनिक भाषा में समझाया। वे कहते हैं, "अगर कृष्ण आज होते, तो वे भी हमारी तरह जीते—लेकिन होश के साथ!"

6. निष्कर्ष: आनंद ही संन्यास है!

तो इस पूरी चर्चा का सार क्या है?
1. धर्म को गंभीरता की जरूरत नहीं, उत्सव की जरूरत है।
2. संन्यास त्याग में नहीं, बल्कि जागरूकता में है।
3. जीवन को खेल की तरह जियो, तभी वह सुंदर होगा।
4. प्रेम करो, लेकिन बिना अधिकार के, बिना डर के।
5. ध्यान और आनंद दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
कृष्ण ने यह सिद्ध किया कि "संन्यास का अर्थ जीवन से भागना नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह से जीना है।"
ओशो ने इस संदेश को आधुनिक भाषा में दोहराया।
तो तुम भी अपने भीतर के कृष्ण को जाग्रत करो।
गंभीर मत बनो, उदास मत बनो।
नाचो, गाओ, प्रेम करो, ध्यान करो।
क्योंकि यही सच्चा संन्यास है—आनंद का संन्यास!

कोई टिप्पणी नहीं:

Blogger द्वारा संचालित.