"किसी और की इच्छा से अगर स्वतंत्रता भी मिले तो वह बंधन, अगर अपनी इच्छा से कोई बंधन में भी जाए तो स्वतंत्रता है।"
प्रस्तावना
मेरे प्यारे साथियों, आज हम एक ऐसे गहन सत्य की खोज में उतरने जा रहे हैं, जिसे समझने के लिए मन, हृदय और आत्मा – तीनों को खोलना आवश्यक है। अक्सर हम अपने जीवन में 'स्वतंत्रता' शब्द सुनते हैं, लेकिन क्या हम वास्तव में समझ पाते हैं कि स्वतंत्रता क्या है? क्या वह केवल बाहरी मुक्ति का प्रतीक है या फिर हमारे भीतर छुपी उस अनंत चेतना का द्योतक है, जिसे हम कभी पहचान नहीं पाते? आज का यह प्रवचन हमें उसी दिशा में ले जाएगा, जहाँ हम यह समझेंगे कि जो स्वतंत्रता हमें दूसरों द्वारा दी जाती है, वह अंतर्निहित रूप से बंधन में बदल जाती है, जबकि हमारी स्वयं की इच्छा से अपनाया गया बंधन, एक गहरी स्वतंत्रता का प्रमाण होता है।
1. स्वतंत्रता और बंधन की परिभाषा
बाहरी स्वतंत्रता बनाम आंतरिक बंधन
हमारी संस्कृति, समाज और परंपराएँ हमें यह सिखाती हैं कि स्वतंत्रता का अर्थ है – बिना रोक-टोक जीना, बिना किसी प्रतिबंध के अपने जीवन के निर्णय लेना। लेकिन क्या यही वास्तविक स्वतंत्रता है?
जब किसी और की इच्छा, किसी बाहरी सत्ता या समाज के नियमों द्वारा हमें एक 'स्वतंत्रता' का उपहार दिया जाता है, तो वह उपहार अक्सर एक झूठी मुक्ति होती है। ऐसे उपहार में एक अदृश्य नियंत्रण होता है, एक छुपा हुआ बंधन, जो हमारी सोच और कर्मों को एक निश्चित दिशा में मोड़ देता है। उदाहरण के लिए, जब सरकार या कोई संगठन हमें कुछ विशेष अधिकार प्रदान करता है, तो अक्सर उसके साथ कुछ शर्तें जुड़ी होती हैं। उन शर्तों के अनुसार हमारा व्यवहार करना पड़ता है, हमारी सोच सीमित हो जाती है। यही वह बंधन है जिसे हम अनजाने में स्वीकार कर लेते हैं।
स्वेच्छा का बंधन – असली स्वतंत्रता की कुंजी
दूसरी ओर, जब हम स्वयं अपनी इच्छा से किसी नियम या प्रतिबंध को अपनाते हैं, तो वह हमारे आत्म-साक्षात्कार का एक हिस्सा बन जाता है। यह वह बंधन है जिसे हमने अपने स्वयं के निर्णय, अपनी समझ और अपने आंतरिक अनुभव से चुना है। यहाँ बंधन का अर्थ है – एक ऐसी सीमा जिसे हमने जानबूझकर स्वीकार किया है, ताकि हम अपनी मानसिक ऊर्जा को नियंत्रित कर सकें, अपनी आत्मा की आवाज़ सुन सकें और अपनी दिशा स्वयं तय कर सकें। इस प्रकार का बंधन हमें एक नई दिशा, एक नया उद्देश्य प्रदान करता है।
2. ओशो का विचार और दर्शन
बाहरी इच्छा से मिली स्वतंत्रता का भ्रम
ओशो हमें अक्सर यह समझाने का प्रयास करते हैं कि बाहरी मुक्ति की ओर बढ़ने का हमारा झुकाव, वास्तव में एक गहरी भ्रांति है। उनका कहना है कि जब कोई हमें स्वतंत्रता देता है – चाहे वह राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक क्षेत्र में हो – तो उस स्वतंत्रता में अक्सर हमारे ऊपर एक प्रकार का नियंत्रण लगाया जाता है। यह नियंत्रण हमारी सोच को सीमित करता है, हमारे निर्णयों में बाधा डालता है। ऐसे में, हमें जो स्वतंत्रता प्राप्त होती है, वह केवल एक बाहरी आवरण होती है, जिसके पीछे हमारी आत्मा की गहराई छिपी रहती है।
ओशो कहते हैं, "जब तक तुम अपनी आत्मा की आवाज़ नहीं सुनते, तब तक तुम्हारा जीवन केवल एक नकली प्रतिरूप होता है।" इस कथन में यह निहित है कि असली स्वतंत्रता केवल बाहरी उपलब्धियों या अधिकारों में नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार में निहित है। यदि आप अपने भीतर झांकेंगे, तो आपको वह असीम शक्ति मिलेगी, जिसे कोई बाहरी शक्ति नियंत्रित नहीं कर सकती।
स्वेच्छा से अपनाए गए बंधन का महत्व
ओशो का एक और महत्वपूर्ण संदेश है – यदि आप स्वयं की इच्छा से किसी बंधन को स्वीकार करते हैं, तो वह आपके आत्म-निर्णय का प्रतीक होता है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति ध्यान, योग या साधना का अभ्यास करता है, तो वह स्वयं की इच्छा से उन नियमों का पालन करता है। वह जानता है कि इन बंधनों के माध्यम से ही वह अपनी आंतरिक शक्ति को जागृत कर सकता है। इस प्रकार का बंधन, जिसे आपने स्वयं चुना है, आपको बाहरी दबावों से मुक्त करता है, आपको स्वयं की गहराई तक ले जाता है।
ओशो ने कहा है कि "अपने अंदर झाँकने की क्षमता ही तुम्हारी सच्ची स्वतंत्रता है।" इसका अर्थ है कि बाहरी दुनिया से दूर हटकर, जब तुम अपने भीतर की आवाज़ सुनते हो, तभी तुम वास्तविक स्वतंत्रता का अनुभव कर सकते हो। इस आत्म-जागृति की प्रक्रिया में, आपके द्वारा चुना गया प्रत्येक बंधन आपको एक नई दिशा, एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है।
3. व्यावहारिक जीवन में उदाहरण और कहानियाँ
कहानी 1: समाज द्वारा निर्धारित जीवन
एक समय की बात है, एक युवक था जिसका नाम अर्जुन था। अर्जुन का जीवन समाज के नियमों, पारंपरिक सोच और बाहरी दबावों में उलझा हुआ था। उसके माता-पिता, शिक्षक और समाज – सभी ने उसकी राह तय कर दी थी। उसे एक प्रतिष्ठित नौकरी, एक सुंदर परिवार और सामाजिक मान्यता के लिए तैयार किया गया था। उसे बताया गया था कि यही असली सफलता है, यही स्वतंत्रता है।
परंतु, अर्जुन के मन में एक खालीपन था। वह महसूस करता था कि उसके भीतर कोई अनकही शक्ति है, एक अनजानी ऊर्जा है जो उसे अपने अंदर बुला रही है। लेकिन उसे डर था – डर था कि अगर वह समाज द्वारा निर्धारित पथ से हटकर अपने स्वप्नों और अपनी आत्मा की पुकार सुनेगा, तो उसे कौन समझेगा? वह सोचता था कि समाज की परिभाषा में ही उसकी पहचान है।
एक दिन, जब अर्जुन को एक पुराने संत से मिलने का अवसर मिला, तो उस संत ने उससे पूछा, "क्या तुम स्वयं को जानते हो?" इस प्रश्न ने अर्जुन के मन में हलचल मचा दी। उसने पहली बार अपने जीवन में यह सवाल उठाया कि क्या वास्तव में वह वही है जो समाज ने उसे बनाया है, या फिर उसके भीतर कोई अनकही आवाज़ है जिसे उसने अनसुना किया है।
अर्जुन ने धीरे-धीरे समाज की परिभाषाओं से दूरी बनाना शुरू की। उसने अपनी पसंद, अपनी स्वेच्छा और अपने आंतरिक अनुभव के आधार पर जीवन जीना शुरू किया। उस परिवर्तन के साथ, उसने महसूस किया कि बाहरी स्वतंत्रता, जो उसे पहले दी गई थी, वह केवल एक झूठा आवरण थी। वास्तविक स्वतंत्रता उसी बंधन में थी जिसे उसने स्वयं चुना था – ध्यान, साधना, और आत्म-खोज की ओर अग्रसर होकर।
कहानी 2: स्वेच्छा से अपनाई गई सीमाएँ
एक अन्य उदाहरण लेते हैं – एक महिला, जिसका नाम रेखा था। रेखा एक समाज में पली-बढ़ी जहाँ महिलाओं के अधिकारों की सीमाएँ पहले से निर्धारित थीं। उसे बताया गया था कि उसके जीवन की दिशा पूर्वनिर्धारित है, और उसकी स्वतंत्रता एक निश्चित ढांचे में ही सीमित है। पर रेखा ने अपने भीतर की उस आग को महसूस किया जो उसे बताती थी कि वह कुछ बड़ा कर सकती है।
रेखा ने अपने जीवन में बदलाव लाने का साहस किया। उसने समाज की उस सीमित परिभाषा को चुनौती दी और स्वयं की इच्छा से एक नया पथ चुना। उसने शिक्षा, कला और आत्म-प्रकाशन के माध्यम से अपनी पहचान बनाई। वह जानती थी कि उसके द्वारा चुनी गई सीमाएँ – नियमित अभ्यास, अध्ययन और आत्म-खोज – उसे वास्तविक स्वतंत्रता प्रदान करेंगी। वह अपने निर्णयों की स्वामित्व लेती थी, और यही स्वामित्व उसे अंदर से मजबूत बनाता था।
इस प्रकार, रेखा ने साबित कर दिया कि स्वेच्छा से अपनाए गए बंधन, चाहे वे कितने भी कठिन क्यों न हों, वास्तव में हमारे अंदर की स्वतंत्रता का परिचायक होते हैं। जब हमने अपनी सीमाओं को खुद चुना, तो हमने पाया कि हम उस नियंत्रण से बाहर निकलकर अपने भीतर की अनंत संभावनाओं को उजागर कर सकते हैं।
4. दार्शनिक और आध्यात्मिक आयाम
आत्म-खोज की अनंत यात्रा
ओशो के अनुसार, जीवन एक ऐसी यात्रा है जिसमें हमें सबसे पहले अपने अंदर झांकना होता है। जब तक हम बाहरी उपलब्धियों या दूसरों द्वारा निर्धारित मानदंडों में उलझे रहेंगे, तब तक हमारी आत्मा की वास्तविक आवाज़ छिपी रहेगी। आत्म-खोज का अर्थ है – उस अंधेरे को उजागर करना जिसमें हमारी असली पहचान छुपी होती है। यह एक साहसिक और कठिन यात्रा है, परंतु एक बार जब आप उस यात्रा पर निकल पड़ते हैं, तो आपको अपनी आत्मा की वह दिव्यता दिखने लगती है, जो किसी भी बाहरी स्वतंत्रता से कहीं अधिक है।
ध्यान और मौन की शक्ति
ओशो अक्सर कहते हैं कि ध्यान और मौन की शक्ति ही वह कुंजी है जो आपको आपके भीतर की आवाज़ सुनने में सक्षम बनाती है। जब आप बाहर की दुनिया के शोर से दूर हटकर केवल अपने आप में होते हैं, तभी आपकी आत्मा का वास्तविक स्वर प्रकट होता है। यह ध्यान का मंत्र है – बाहरी झंझटों से मुक्ति, स्वयं के साथ ईमानदारी और आत्म-जागृति। ध्यान के माध्यम से, आप न केवल अपने भीतर के सोए हुए प्राण को जागृत करते हैं, बल्कि उस अनंत प्रेम और ऊर्जा का भी अनुभव करते हैं जो आपके अस्तित्व का आधार है।
बाहरी नियंत्रण और आंतरिक मुक्ति
दार्शनिक दृष्टिकोण से, यह देखा जा सकता है कि बाहरी स्वतंत्रता में हमेशा एक प्रकार का नियंत्रण निहित रहता है। यह नियंत्रण आपको सीमित करता है, आपकी सोच को एक निर्धारित रूप में ढाल देता है। जब आप किसी बाहरी शक्ति की इच्छा से 'स्वतंत्रता' स्वीकारते हैं, तो आप अनजाने में उस शक्ति के हाथ में अपने जीवन की कुंजी सौंप देते हैं। वहीं, अगर आप स्वयं की इच्छा से, स्वयं के निर्णय से जीवन के नियम तय करते हैं, तो वह एक ऐसी स्वतंत्रता है जिसमें आपका आत्म-साक्षात्कार निहित होता है।
यह सत्य हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वास्तव में हम स्वतंत्र हैं या फिर हमारी स्वतंत्रता किसी और की इच्छा के अधीन है। ओशो का यह संदेश हमें बताता है कि सच्ची स्वतंत्रता बाहरी उपहारों में नहीं, बल्कि आत्म-निर्णय, आत्म-खोज और आत्म-जागृति में छिपी है।
5. समाज, परंपराओं और आधुनिक जीवन में स्वतंत्रता
समाज के दबाव और निर्धारित पहचान
हमारे समाज में बहुत सी परंपराएँ और नियम हैं, जो हमें एक निश्चित ढांचे में बाँधने का प्रयास करते हैं। बचपन से ही हमें बताया जाता है कि हमारी पहचान किस प्रकार होनी चाहिए, हमारा करियर क्या होना चाहिए, और हमारे निर्णय किस दिशा में लेने चाहिए। इन बाहरी दबावों के कारण हम अक्सर अपनी स्वयं की आवाज़ को अनसुना कर देते हैं। समाज की परिभाषा में खो जाने के कारण, हमारी आत्मा का वह अनंत प्रकाश, जो हमारी वास्तविक पहचान का प्रतीक है, कहीं खो जाता है।
जब हम समाज की इच्छा से ही अपने जीवन के निर्णय लेते हैं, तो हम केवल एक नकली प्रतिरूप में बदल जाते हैं। यह प्रतिरूप हमारे भीतर के वास्तविक स्वतंत्रता के प्रकाश को छिपा देता है। समाज हमें एक निश्चित ढांचे में बाँधता है, जिससे हम अपने असली स्व से दूर हो जाते हैं। यही वह स्थिति है, जहाँ बाहरी स्वतंत्रता, जो हमें दी जाती है, वह केवल एक झूठा दिखावा बन जाती है।
आधुनिक जीवन में स्वतंत्रता की सीमाएँ
आज के आधुनिक युग में, सोशल मीडिया, विज्ञापन और तकनीकी प्रगति ने हमें एक नई परिभाषा दी है – 'स्वतंत्रता' की। लेकिन इस स्वतंत्रता के साथ एक गहरी विरोधाभासी स्थिति भी जुड़ी हुई है। हम जितना भी स्वतंत्र महसूस करते हैं, हमारी सोच और हमारे निर्णय लगातार बाहरी प्रवाह द्वारा प्रभावित होते रहते हैं। हमें बताया जाता है कि हमें स्वतंत्र होना चाहिए, परंतु वास्तविकता में हमें एक निश्चित मानदंडों के भीतर ही रहना पड़ता है।
उदाहरण के तौर पर, जब हमें सोशल मीडिया पर स्वतंत्रता का दावा किया जाता है, तो हम देखते हैं कि उस स्वतंत्रता के साथ एक अदृश्य सीमा भी होती है – कौन सी पोस्ट स्वीकार्य है, कौन सी नहीं, किसका समर्थन करना है, किसका विरोध करना है। इसी प्रकार, आधुनिक जीवन में बहुत सी स्वतंत्रता के दावे केवल एक बाहरी छाप होते हैं, जो हमें समाज की निर्धारित धाराओं में बांध लेते हैं।
स्वेच्छा और आत्म-निर्णय का महत्व
जब हम बाहरी दबावों से मुक्त होकर स्वयं के निर्णय लेते हैं, तभी हम असली स्वतंत्रता का अनुभव कर पाते हैं। यह वही स्वतंत्रता है, जो समाज की झंझटों से परे, हमारे अंदर के आत्म-निर्णय और स्वेच्छा पर आधारित होती है। यह वही स्वतंत्रता है, जहाँ हम अपने जीवन के नियम स्वयं तय करते हैं, और इसी निर्णय में हमारी आत्मा की आवाज़ सुनाई देती है।
ओशो कहते हैं कि "स्वतंत्रता का असली अर्थ वह है, जिसे तुम स्वयं ने चुना हो।" इस प्रकार की स्वतंत्रता, जो कि स्वेच्छा से अपनाई गई सीमाओं में निहित होती है, वह आपको बाहरी दबावों से मुक्त कर देती है। यह आपको उस आत्म-जागृति की ओर ले जाती है, जहाँ आप न केवल अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेते हैं, बल्कि अपनी आत्मा की गहराई से जुड़कर, एक सच्चे और पूर्ण अस्तित्व का अनुभव करते हैं।
6. निष्कर्ष और व्यक्तिगत चिंतन
स्वयं के साथ संवाद का महत्व
इस प्रवचन का सार यह है कि हमें अपने जीवन में सच्चाई से जीने की आवश्यकता है। बाहरी दुनिया की झंझटों और सामाजिक नियमों में उलझकर अगर हम अपने आप को भूल जाते हैं, तो हमारी आत्मा उस वास्तविक स्वतंत्रता को कभी प्रकट नहीं कर पाती। अपने भीतर झांकिए, अपने आप से संवाद कीजिए – यही वह प्रक्रिया है, जिससे आप उस अनंत ऊर्जा, उस असीम प्रेम और उस दिव्यता को पहचान पाएंगे, जो आपके अंदर छुपी हुई है।
अपने जीवन में कुछ पल निकालिए, जहाँ आप बिना किसी बाधा के मौन में बैठ सकें, ध्यान कर सकें, और अपने दिल की गहराइयों में उतर सकें। उस मौन में, आपको अपनी आत्मा की आवाज़ सुनाई देगी – वह आवाज़, जो कहेगी कि "तुम वही हो, तुम अनंत हो, और तुम्हारा अस्तित्व उस भीड़ के परे है जो तुम्हें नियंत्रित करने की कोशिश करती है।" यही वह सत्य है, जिसे हमें अपनाना है।
अपने निर्णय की स्वामित्व
हमारी स्वतंत्रता का असली अर्थ तभी समझ में आता है, जब हम अपने निर्णय स्वयं लेते हैं। बाहर की दुनिया चाहे जितनी भी स्वतंत्रता का दावा करे, वह केवल एक बाहरी आवरण है। वास्तविक स्वतंत्रता वह है, जिसे हम स्वयं की इच्छा, स्वयं के निर्णय और आत्म-जागृति से अपनाते हैं। जब आप स्वयं के साथ ईमानदार होते हैं, तब आप उस बंधन को चुनते हैं, जो आपके भीतर के अनंत प्रकाश को जागृत करता है।
यह बात हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं, या फिर हम अपने जीवन के निर्णयों में दूसरों की इच्छा को प्राथमिकता दे रहे हैं। यदि हम स्वयं के निर्णय की स्वामित्व लेते हैं, तो हमारी आत्मा स्वतंत्र हो जाती है। यही वह मार्ग है, जो हमें वास्तविक स्वतंत्रता और आत्म-साक्षात्कार तक ले जाता है।
अंतर्मुखी यात्रा का आह्वान
मेरे प्यारे मित्रों, आज के इस प्रवचन का अंतिम संदेश यही है कि अपने अंदर की गहराईयों में उतरें, उस मौन को महसूस करें जहाँ केवल आप और आपकी आत्मा मौजूद होती है। समाज की बाहरी परतों को त्याग कर, अपनी स्वेच्छा से चुने गए नियमों को अपनाएं। इस यात्रा में, आप पाएंगे कि जो बंधन आपने स्वयं चुने हैं, वे आपको न केवल नियंत्रित नहीं करते, बल्कि आपके जीवन को एक नई दिशा, एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं।
आपसे यह आग्रह है कि अपने जीवन में आत्म-जागृति की प्रक्रिया को अपनाएं। अपने अंदर की आवाज़ सुनें, उस अनंत ऊर्जा को महसूस करें जो आपको बताती है कि आप कितने अद्वितीय हैं, कितने मुक्त हैं। यह स्वतंत्रता, जो आपके स्वयं के निर्णय से आती है, वह बाहरी किसी भी दबाव से कहीं अधिक प्रबल और स्थायी होती है।
व्यक्तिगत अनुभव और चिंतन
कई बार हमें लगता है कि हमें समाज से मिली स्वतंत्रता ही हमारे लिए पर्याप्त है, परंतु वास्तव में वह केवल एक भौतिक मुक्ति है। जब तक हम अपने भीतर की आत्मा को जगाने का प्रयास नहीं करते, तब तक हम सिर्फ एक नकली पहचान में ही उलझे रहते हैं। एक बार जब आपने महसूस किया कि आपकी आत्मा कितनी विशाल है, तब आपको एहसास होगा कि असली स्वतंत्रता वही है, जो आपके भीतर निहित है।
सोचिए, यदि आप हर दिन अपने अंदर झांकने का समय निकालें – चाहे वह सुबह की पहली किरण हो या रात की शांति – तो आप देखेंगे कि आपकी आत्मा में एक अनंत प्रकाश है। यह प्रकाश किसी बाहरी आदेश या किसी और की इच्छा से नहीं, बल्कि आपकी स्वयं की स्वीकृति और आपके आत्म-निर्णय से प्रकट होता है। यही वह स्वतंत्रता है, जिसे हमने हमेशा खोजा है।
निष्कर्ष
अंत में, यह प्रवचन हमें यह संदेश देता है कि बाहरी स्वतंत्रता, चाहे वह कितनी भी आकर्षक क्यों न हो, अंतर्निहित रूप से एक बंधन है। जब आपको स्वतंत्रता किसी और की इच्छा से दी जाती है, तो वह आपके ऊपर नियंत्रण की एक अदृश्य जंजीर रख देती है। वहीं, जब आप स्वयं की इच्छा से, अपने आत्म-निर्णय से किसी भी प्रतिबंध या नियम को अपनाते हैं, तो वह आपके जीवन में एक नई दिशा, एक नई ऊर्जा और एक सच्चे अस्तित्व का परिचायक बन जाता है।
मेरे प्यारे साथियों, आज के इस प्रवचन से यह सीखिए कि आपके पास असली स्वतंत्रता का उपहार है – वह उपहार जो बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि आपके भीतर छुपी हुई अनंत चेतना में निहित है। समाज की झंझटों, परंपराओं और बाहरी दबावों से ऊपर उठकर, अपने अंदर झांकिए और अपनी आत्मा की आवाज़ को सुनिए। वह आवाज़ आपको बताएगी कि आप कितने विशाल, कितने मुक्त और कितने अद्वितीय हैं।
समापन: आत्म-जागृति का आह्वान
इस प्रवचन के समापन में मैं आप सभी से यही कहना चाहूँगा कि अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में आत्म-जागृति की ओर अग्रसर हों। बाहरी स्वतंत्रता के मोह से दूर हटकर, स्वयं के निर्णय और स्वेच्छा से जीना सीखें। अपने भीतर की गहराईयों में उतरें, उस मौन का अनुभव करें जहाँ केवल आप और आपकी आत्मा हो। उस मौन में ही आपको अपनी असली पहचान मिलेगी, वह पहचान जो आपको बताती है कि वास्तविक स्वतंत्रता वही है जिसे आपने स्वयं चुना है।
याद रखिए, किसी और की इच्छा से मिली स्वतंत्रता केवल एक दिखावा है, जो आपको बाहरी नियंत्रण के अधीन रखती है। परंतु जब आप स्वयं की इच्छा से, अपने आत्म-निर्णय से जीवन के नियम तय करते हैं, तो वह नियम आपके अंदर के अनंत प्रकाश को जगाते हैं। यही है सच्ची स्वतंत्रता, यही है वह आज़ादी, जो आपके भीतर की गहराई से आती है।
आज का यह प्रवचन एक निमंत्रण है – एक निमंत्रण अपने अंदर की आवाज़ सुनने का, अपने भीतर छुपे अनंत ऊर्जा को पहचानने का, और समाज की झंझटों से ऊपर उठकर स्वयं के साथ सच्चाई से जीने का। आप अपनी स्वेच्छा से जितने भी बंधन स्वीकार करेंगे, वे आपके आत्म-साक्षात्कार का प्रमाण बनेंगे। यही वह मार्ग है, जिससे आप बाहरी प्रतिबंधों से मुक्त होकर एक स्वतंत्र, स्वावलंबी और सच्चे जीवन का अनुभव कर पाएंगे।
मेरे प्यारे साथियों, चलिए आज से ही उस दिशा में कदम बढ़ाते हैं जहाँ हम स्वयं के निर्णय लेते हैं, जहाँ हम अपनी आत्मा की आवाज़ को सुनते हैं, और जहाँ हम बाहरी झंझटों से ऊपर उठकर, अपने अंदर के अनंत प्रेम और प्रकाश को पहचानते हैं। यही है वह स्वतंत्रता, जिसे कोई भी बाहरी सत्ता हमें नहीं दे सकती – वह केवल आपके अंदर से आती है, आपके स्वयं के निर्णयों से होती है।
इसलिए, जब भी आप किसी भी परिस्थिति में बाहरी स्वतंत्रता का दावा सुनें, तो याद रखिए – असली स्वतंत्रता वही है, जिसे आप स्वयं की इच्छा से अपनाते हैं। अपने जीवन के प्रत्येक निर्णय में आत्म-जागृति का संचार करें, और देखिए कि कैसे आपका हर कदम आपको उस अनंत ऊर्जा की ओर ले जाता है, जो आपके भीतर निहित है।
अंत में, मैं यही कहूँगा कि जीवन में सच्ची स्वतंत्रता का अनुभव तभी हो सकता है, जब हम बाहरी झंझटों, समाज के दबावों और पारंपरिक मान्यताओं से परे जाकर अपने अंदर की आत्मा की सुनते हैं। उस सुनसान, मौन अवस्था में जब केवल आपकी आत्मा बोलती है, तभी आपको अपने अस्तित्व का असली अर्थ समझ में आता है। और यही वह स्वतंत्रता है, जिसे किसी और की इच्छा से पाने की अपेक्षा, स्वयं की इच्छा से अपनाने में ही वास्तविक आज़ादी निहित है।
मेरे प्यारे दोस्तों, यह प्रवचन आपके लिए एक आह्वान है – एक आह्वान अपने अंदर की गहराईयों में उतरकर, अपने भीतर छुपे अनंत प्रकाश को पहचानने का। बाहरी दुनिया की झंझटों से मुक्त होकर, अपने स्वयं के निर्णय की स्वामित्व लीजिए, और उस स्वेच्छा से चुने गए बंधन में ही सच्ची स्वतंत्रता का अनुभव कीजिए। यही है वह सत्य, यही है वह चेतना, और यही है वह अनंत यात्रा, जो आपको आपके असली अस्तित्व तक ले जाएगी।
जागिए, उठिए, और उस अनंत शक्ति को पहचानिए जो आपके भीतर छुपी हुई है। अपने भीतर की आवाज़ को सुनिए, और देखिए कि कैसे आपके हर निर्णय में, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, आपकी आत्मा की स्वतंत्रता की झलक मिलती है। यही है जीवन का असली उद्देश्य, यही है वह संदेश जिसे ओशो ने हमें सिखाया है – कि असली स्वतंत्रता वह है, जिसे आप स्वयं की इच्छा से अपनाते हैं, और जिसे आप अपने अंदर की अनंत चेतना से अनुभव करते हैं।
इस प्रकार, इस प्रवचन के माध्यम से हमने यह समझने की कोशिश की है कि बाहरी स्वतंत्रता, जो किसी और की इच्छा से प्राप्त होती है, वह अंतर्निहित रूप से एक बंधन है।
वहीं, स्वेच्छा से चुना गया प्रत्येक बंधन, चाहे वह ध्यान, साधना या किसी नियम का पालन क्यों न हो, असली स्वतंत्रता का प्रतीक है, क्योंकि वह आपके स्वयं के निर्णय और आत्म-जागृति का हिस्सा होता है।
मेरे प्यारे साथियों, यह संदेश आपको प्रेरित करे कि आप बाहरी झंझटों से ऊपर उठकर अपने अंदर की आवाज़ सुनें, अपने आत्म-निर्णय की स्वामित्व लें, और उस स्वेच्छा से चुने गए मार्ग पर चलें जो आपको सच्चे आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है। यही वह जीवन है, यही वह आज़ादी है, और यही वह सत्य है जिसे अपनाने में आपकी आत्मा हमेशा उजागर होती रहेगी।
समाप्ति में, मैं आप सभी से यह निवेदन करता हूँ कि इस प्रवचन को न केवल शब्दों के रूप में ग्रहण करें, बल्कि इसे अपने जीवन में उतारें। बाहरी स्वतंत्रता के मोह में न पड़ें, बल्कि अपनी स्वयं की इच्छा से चुने गए नियमों, प्रतिबंधों और बंधनों को आत्मसात करें। इन बंधनों में ही वह गहरी स्वतंत्रता निहित है, जो आपकी आत्मा को जीवंत करती है, आपको असली पहचान प्रदान करती है, और आपको उस अनंत प्रेम और प्रकाश से जोड़ती है जो आपके भीतर हमेशा से मौजूद है।
जागिए, उठिए, और अपने अंदर के उस सोए हुए प्राण को फिर से जीवंत करें। यही है आपका मार्ग, यही है आपकी आज़ादी, और यही है वह सच्चाई जो आपको जीवन भर प्रेरित करती रहेगी।
इस प्रकार, मेरे प्यारे मित्रों, बाहरी स्वतंत्रता के झंझटों से ऊपर उठकर, अपने अंदर झांकिए, अपने स्वयं के निर्णय की स्वामित्व लीजिए, और देखिए कि कैसे आपकी आत्मा आपको सच्ची, अद्वितीय, और असीम स्वतंत्रता का अनुभव कराती है। यही वह सत्य है जिसे हम सभी को समझना और अपनाना है – कि जब आप स्वयं की इच्छा से चुनिंदा बंधनों को स्वीकार करते हैं, तो आप वास्तव में मुक्त होते हैं।
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