क्षणभंगुरता का बोध और जीवन का उत्सव : ओशो के सनातन धम्म का सार

मनुष्य का जीवन एक गहरी विडंबना में जीता है। वह जानता है कि मृत्यु निश्चित है, फिर भी वह ऐसे जीता है जैसे मृत्यु कभी आने वाली ही नहीं। वह जानता है कि समय क्षणभंगुर है, फिर भी वह जीवन को कल पर टालता रहता है। यही टालना, यही स्थगन, यही “कल” की आदत मनुष्य को जीवन से दूर ले जाती है। ओशो इसी मूल भ्रांति को तोड़ने का प्रयास करते हैं। वे कहते हैं कि क्षणभंगुरता का बोध ही धर्म की शुरुआत है

जब किसी व्यक्ति को यह बोध हो जाता है कि जो क्षण अभी है, वही अंतिम भी हो सकता है, तो उसके जीवन में एक क्रांतिकारी परिवर्तन घटित होता है। फिर वह जीवन को उधार में नहीं जीता। फिर वह प्रेम को स्थगित नहीं करता, आनंद को टालता नहीं, उत्सव को भविष्य पर नहीं छोड़ता। क्योंकि वह जान गया है—आज के पार कुछ भी सुनिश्चित नहीं है

क्षण का सत्य और मन की चालाकी

मन बहुत चालाक है। वह हमेशा कहता है—“अभी नहीं, कल।”
कल प्रेम करेंगे।
कल ध्यान करेंगे।
कल जीवन को जीएँगे।

लेकिन वह कल कभी आता नहीं। कल हमेशा भविष्य में ही रहता है। और इस तरह जीवन हाथ से फिसलता चला जाता है। ओशो कहते हैं कि मन समय में जीता है, लेकिन जीवन क्षण में जीता है। समय एक मनोवैज्ञानिक धारणा है; क्षण एक जीवंत सत्य है।

जब तुम इस क्षण में पूरी तरह उपस्थित होते हो—बिना भविष्य की चिंता, बिना अतीत के बोझ—तभी जीवन घटता है। अन्यथा तुम केवल जीवन के बारे में सोचते रह जाते हो, जीते नहीं।

मृत्यु का बोध जीवन को गहरा बनाता है

सामान्य धारणा यह है कि मृत्यु का विचार भय पैदा करता है। लेकिन ओशो का दृष्टिकोण बिल्कुल विपरीत है। वे कहते हैं—मृत्यु का बोध ही जीवन को तीव्र, सघन और सुंदर बनाता है

जिस व्यक्ति को यह स्मरण है कि मृत्यु कभी भी आ सकती है, वह छोटे-छोटे पलों को भी व्यर्थ नहीं जाने देता। उसके लिए एक कप चाय पीना भी ध्यान बन जाता है, किसी को देख लेना भी प्रेम बन जाता है, सांस लेना भी प्रार्थना हो जाता है।

मृत्यु का इनकार जीवन को उथला बना देता है। और मृत्यु की स्वीकृति जीवन को गहराई दे देती है।

आज ही है पूजा, आज ही है प्रेम

ओशो के अनुसार धर्म कोई भविष्य की उपलब्धि नहीं है। वह कोई स्वर्गीय पुरस्कार नहीं है। धर्म कोई “कल” की चीज नहीं है। धर्म का अर्थ है—इस क्षण को पूरी तरह जीना

यदि तुम कहते हो—कल पूजा करेंगे, तो तुम पूजा को मार रहे हो।
यदि तुम कहते हो—कल प्रेम करेंगे, तो तुम प्रेम से भाग रहे हो।

क्योंकि जो प्रेम आज नहीं है, वह कभी नहीं होगा।
जो ध्यान अभी नहीं है, वह भविष्य में भी नहीं होगा।

इसलिए ओशो कहते हैं—
आज ही है उत्सव।
आज ही है पूजा।
आज ही है प्रेम।

उत्सवमय जीवन : सनातन धम्म की आत्मा

“एस धम्मो सनंतनो”—यह सूत्र केवल नैतिकता का नहीं है, यह जीवन के उत्सव का सूत्र है। सनातन धम्म कोई कठोर नियमों की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह जीवन के साथ बहने की कला है।

जब व्यक्ति जीवन को बोझ समझकर जीता है, तो वह धर्म से दूर है।
जब व्यक्ति जीवन को उत्सव की तरह जीता है, तो वह धर्म में है।

हँसते हुए, नाचते हुए, गाते हुए, प्रेम में डूबे हुए—यदि तुम जीवन को स्वीकार करते हो, तो वही सनातन धम्म है।

जिम्मेदारी और स्वतंत्रता

क्षण में जीने का अर्थ लापरवाही नहीं है। ओशो यह स्पष्ट करते हैं कि क्षण में जीना उच्चतम जिम्मेदारी है। क्योंकि जब तुम अभी में होते हो, तब तुम्हारा प्रत्येक कर्म पूर्ण चेतना से निकलता है।

जो व्यक्ति भविष्य के डर से या अतीत के अपराधबोध से कर्म करता है, वह अचेतन है। लेकिन जो व्यक्ति इस क्षण की संपूर्णता से कर्म करता है, वही जिम्मेदार है।

स्वतंत्रता भी यहीं से जन्म लेती है।
कल पर जीने वाला व्यक्ति गुलाम है।
आज में जीने वाला व्यक्ति मुक्त है।

ध्यान : क्षण में उतरने की विधि

ध्यान कोई अभ्यास नहीं है जिसे भविष्य में सिद्ध करना हो। ध्यान का अर्थ है—इस क्षण में पूरी तरह उपस्थित होना

जब तुम चल रहे हो, तो केवल चलो।
जब तुम सुन रहे हो, तो केवल सुनो।
जब तुम प्रेम कर रहे हो, तो केवल प्रेम करो।

यही ध्यान है।
और यही धर्म है।

निष्कर्ष : जीवन को टालो मत

ओशो का पूरा संदेश एक ही वाक्य में समाया जा सकता है—
जीवन को टालो मत।

क्योंकि जो टलता है, वह जीवन नहीं होता।
जीवन वही है जो अभी है।

यदि तुम इस क्षण को चूक गए, तो तुम सब कुछ चूक गए।
और यदि तुम इस क्षण में उतर गए, तो तुमने सब कुछ पा लिया।

यही सनातन धम्म है।
यही एस धम्मो सनंतनो।

कोई टिप्पणी नहीं:

Blogger द्वारा संचालित.