विज्ञान बहुत जानता है, लेकिन जीवन को नहीं जानता

ओशो जब कहते हैं कि हम सिर्फ पदार्थ के संबंध में विज्ञान को जानते हैं, तो वे किसी वैज्ञानिक को गाली नहीं दे रहे। वे एक साधारण-सी बात कह रहे हैं, जिसे हम सब अपने रोज़मर्रा के जीवन में देख सकते हैं।

आप डॉक्टर के पास जाते हैं। डॉक्टर आपका ब्लड टेस्ट करता है, एक्स-रे करता है, रिपोर्ट देखता है और कहता है — “सब नॉर्मल है।” लेकिन आप भीतर से जानते हैं कि कुछ नॉर्मल नहीं है। आपके मन में बेचैनी है, नींद नहीं आती, जीवन में रस नहीं बचा।

अब सवाल यह है —
अगर सब कुछ “नॉर्मल” है, तो यह खालीपन कहाँ से आ रहा है? यही ओशो का इशारा है।

विज्ञान शरीर को जानता है, लेकिन जीवन को नहीं
वह मशीन को जानता है, लेकिन चालक को नहीं

पदार्थ को तोड़ना आसान है, जीवन को नहीं

विज्ञान की पूरी पद्धति तोड़ने पर टिकी है।
कोई चीज़ समझ में नहीं आती — तो उसे छोटे हिस्सों में बाँट दो।

घड़ी खराब हो जाए — खोल दो।
मोबाइल खराब हो जाए — पार्ट्स बदल दो।

लेकिन जीवन घड़ी नहीं है।

अगर जीवन को भी तोड़ दिया जाए —
शरीर अलग, मन अलग, भावना अलग, आत्मा अलग —
तो हाथ में क्या बचता है?
लाश

ओशो कहते हैं —
जीवन को समझने के लिए उसे जोड़कर देखना पड़ता है, तोड़कर नहीं। कृष्ण का विज्ञान यही था।

कृष्ण का विज्ञान: प्रयोगशाला का नहीं, जीवन का विज्ञान

कृष्ण के सामने जो विज्ञान था, वह किसी लैब में नहीं पैदा हुआ। वह खेतों में, युद्धभूमि में, राजदरबार में, प्रेम में, अकेलेपन में — हर जगह काम करता था।

यह विज्ञान पूछता था:

      -  आदमी किस उम्र में क्या सहज होता है?

      -  कब क्या स्वाभाविक है?

      -  जीवन किस गति से आगे बढ़ता है?

आज हम बच्चों से पूछते हैं — “तुम बड़े होकर क्या बनोगे?”
कृष्ण का विज्ञान पूछता था —
“अभी तुम क्या हो, और उसे पूरा जी रहे हो या नहीं?”

जीवन को चार हिस्सों में बाँटना: सुविधा के लिए नहीं, समझ के लिए

ओशो कहते हैं कि उस विज्ञान ने जीवन को चार हिस्सों में बाँटा था।
आज हम जैसे चीज़ों को बाँटते हैं — फाइलें, कैटेगरी, बॉक्स — वैसा नहीं।

यह विभाजन वैसा था जैसे:

      -  सुबह

      -  दोपहर

      -  शाम

      -  रात

सुबह को रात बनने की ज़िद नहीं होती।
और रात को सुबह से शर्मिंदा नहीं किया जाता।

पहला हिस्सा: जब जीवन शरीर है (शूद्र अवस्था)

यह जीवन का सबसे पहला और सबसे ज़रूरी चरण है।
यहाँ आदमी काम करना सीखता है, सोचने से ज़्यादा।

आज के समय में इसे आप ऐसे समझिए:

एक बच्चा साइकिल सीख रहा है।
अगर आप उससे कहें —
“पहले साइकिल का सिद्धांत समझो, फिर चलाना”
तो वह कभी नहीं सीख पाएगा।

पहले गिरना होता है।
पहले शरीर सीखता है।

ओशो कहते हैं —
जो आदमी शरीर से भागता है, वह कभी ध्यान तक नहीं पहुँचता।

आज हम इस चरण को नीचा मानते हैं।
काम करने वाले, हाथ से मेहनत करने वाले, सर्विस देने वाले —
हम उन्हें “लोअर” समझ लेते हैं।

कृष्ण के विज्ञान में यह नींव थी।

दूसरा हिस्सा: जब जीवन इच्छा बन जाता है (वैश्य अवस्था)

फिर एक समय आता है जब आदमी सिर्फ काम करके संतुष्ट नहीं होता।
वह चाहता है:

      -  बेहतर जीवन

      -  पैसे

      -  सुरक्षा

      -  परिवार

      -  पहचान

आज का मिडिल क्लास यहीं जी रहा है।

ओशो यहाँ बहुत साफ़ हैं —
यह चरण गलत नहीं है।
गलत तब होता है जब आदमी यहीं अटक जाता है

पैसा साधन है, मंज़िल नहीं।
जो आदमी पैसे को मंज़िल बना लेता है, वह जीवन खो देता है।

तीसरा हिस्सा: जब जीवन जिम्मेदारी माँगता है (क्षत्रिय अवस्था)

अब जीवन कहता है —
“सिर्फ अपने लिए मत जियो।”

यह वह समय है जब आदमी:

       -  नेतृत्व करता है

       -  जिम्मेदारी उठाता है

       -  किसी और के लिए खड़ा होता है

आज यह नेता, अफसर, शिक्षक, एक्टिविस्ट — किसी भी रूप में हो सकता है।

लेकिन यहाँ खतरा भी है।
अगर शक्ति में करुणा न हो, तो क्षत्रिय राक्षस बन जाता है।

ओशो कहते हैं —
शक्ति ध्यान के बिना अंधी होती है।

चौथा हिस्सा: जब जीवन समझ बन जाता है (ब्राह्मण अवस्था)

यह जीवन का आख़िरी पड़ाव नहीं, बल्कि गहराई है।

यहाँ आदमी:

      -  कुछ साबित नहीं करना चाहता

      -  कुछ जमा नहीं करना चाहता

      -  कुछ बनना नहीं चाहता

यहाँ आदमी देखता है।

जैसे कोई नदी के किनारे बैठकर बहते पानी को देख रहा हो —
न उसमें कूदने की जल्दी, न उसे रोकने की इच्छा।

ब्राह्मण वह नहीं जो जानता है, ब्राह्मण वह है जो देखता है

समस्या कहाँ हुई?

समस्या तब हुई जब हमने इन अवस्थाओं को जन्म से जोड़ दिया

जो बच्चा अभी शरीर की अवस्था में है, उससे हम ब्राह्मण जैसा व्यवहार चाहते हैं।
और जो बूढ़ा है, उससे हम अभी भी दौड़ की उम्मीद करते हैं।

यहीं जीवन की धारा टूट गई।

आधुनिक आदमी की बेचैनी

आज का आदमी सब कुछ कर रहा है —
काम, पैसा, जिम्मेदारी —
लेकिन वह यह नहीं जानता कि वह किस चरण में है

इसलिए वह हर जगह गलत महसूस करता है।

ओशो कहते हैं —
दुख इसलिए नहीं है कि जीवन कठिन है,
दुख इसलिए है कि हम जीवन की लय के खिलाफ जी रहे हैं।

कृष्ण का विज्ञान आज क्यों ज़रूरी है

आज हमारे पास टेक्नोलॉजी है, सुविधा है, स्पीड है —
लेकिन दिशा नहीं।

कृष्ण का विज्ञान दिशा देता है, नियम नहीं।

यह कहता है —
जो जहाँ है, वहीं से पूरा हो।

अंत: कोई निष्कर्ष नहीं, एक ठहराव

ओशो का यह पूरा विचार किसी सुधार की योजना नहीं है।
यह एक आईना है।

अगर आप इसे पढ़कर थोड़ी देर चुप हो जाएँ —
और अपने जीवन को देखें —
तो यही इसकी सफलता है।

क्योंकि जीवन को समझने का पहला कदम
रुकना होता है।

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