यह एक गहरी और अद्भुत बात है — “शरीर तो मरणधर्मा है। शरीर के ही एक यंत्र से तुम जागते हो, और शरीर के ही दूसरे यंत्र से तुम सोते हो। सब सपने शरीर के हैं, सब जागना-सोना शरीर का है। इस शरीर के पीछे तुम छिपे हो — जो न कभी सोता है, न कभी जागता है।”
ओशो की यह वाणी केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि एक प्रत्यक्ष अनुभव की ओर संकेत है। यह वाणी उस बिंदु की बात करती है जहाँ मनुष्य का अस्तित्व शरीर से परे होता है, जहाँ “मैं” का असली स्वरूप उद्घाटित होता है।
1. शरीर — एक यंत्र, आत्मा नहीं
शरीर एक अद्भुत यंत्र है। यह चल रहा है, साँस ले रहा है, खा रहा है, देख रहा है, सुन रहा है। लेकिन यह सब कुछ यंत्रवत् हो रहा है। जैसे कोई कंप्यूटर कार्य करता है — भीतर कुछ कोड चलते हैं, विद्युत प्रवाह से सर्किट सक्रिय होते हैं — वैसे ही यह शरीर भी एक जैविक यंत्र है।
तुम्हारी चेतना, तुम्हारा “मैं” इस यंत्र में निवास करता है, लेकिन यह यंत्र तुम नहीं हो।
शरीर मरणधर्मा है — इसका अर्थ है कि यह नश्वर है, यह परिवर्तनशील है। बचपन से युवावस्था, फिर वृद्धावस्था — सब बदलाव शरीर में ही होते हैं। लेकिन इन सब परिवर्तनों के बीच कोई एक “स्थिर सत्ता” है, जो साक्षी है।
यह साक्षी — यही तुम हो। यही तुम्हारा सत्य है।
2. जागना और सोना — शरीर की क्रियाएँ
जब तुम कहते हो, “मैं जागा हूँ”, तो वास्तव में शरीर का एक तंत्र सक्रिय हुआ है। मस्तिष्क की कुछ तरंगें बदलती हैं, नेत्र खुलते हैं, शरीर प्रतिक्रिया करता है।
और जब तुम सो जाते हो, तब वही यंत्र विश्राम की अवस्था में चला जाता है।
परंतु, ध्यान देना — जो यह देख रहा है कि “अब मैं जागा”, “अब मैं सोया” — वह कौन है?
वह साक्षी न जागता है, न सोता है।
सोने-जागने का अनुभव होता है शरीर में, परंतु उसके पीछे जो “मैं” है, वह निरंतर बना रहता है।
जैसे सिनेमा स्क्रीन पर फिल्म चलती है — दृश्य बदलते हैं, पात्र आते-जाते हैं — पर पर्दा वही रहता है।
फिल्म में कभी दिन होता है, कभी रात; कभी प्रेम, कभी युद्ध; पर पर्दा कभी न जलता है, न मिटता है।
तुम्हारा शरीर फिल्म के पात्रों की तरह है, और तुम्हारा आत्मा पर्दे की तरह — स्थिर, अचल, शुद्ध।
3. सब सपने शरीर के हैं
सपने भी शरीर की ही क्रिया हैं। जब मस्तिष्क विश्राम में जाता है, तब भी वह पूरी तरह शांत नहीं होता। कुछ अवचेतन तरंगें चलती रहती हैं — यही सपने हैं।
ओशो कहते हैं — सपने आत्मा के नहीं होते, सपने शरीर के होते हैं।
क्योंकि आत्मा को कुछ चाहना नहीं है, कुछ डर नहीं है, कोई आकांक्षा नहीं है।
सपने वहीं आते हैं जहाँ इच्छा है, जहाँ अपूर्णता है। और इच्छा और अपूर्णता शरीर और मन के दायरे में आती हैं, आत्मा के नहीं।
इसलिए, जो व्यक्ति स्वयं को शरीर मान लेता है, वह स्वप्नों में उलझ जाता है।
और जो स्वयं को साक्षी रूप में देखता है, उसके लिए सपने केवल मस्तिष्क की क्रियाएँ हैं — जैसे बादल गुजरते हैं, वैसे ही वे भी गुजर जाते हैं।
4. आत्मा — जो कभी नहीं सोती, कभी नहीं जागती
यह वाक्य सबसे गूढ़ है — “जो न कभी सोता है, न कभी जागता है।”
क्योंकि आत्मा न क्रिया है, न अवस्था।
जागना और सोना — ये दोनों अवस्थाएँ हैं। लेकिन आत्मा तो साक्षी है, अवस्था नहीं।
वह इन दोनों को देखती है, पर इनमें भाग नहीं लेती।
तुम्हारे भीतर जो निरंतर है, वही आत्मा है।
सोने से पहले तुम कहते हो “मैं हूँ”; जागने के बाद भी कहते हो “मैं हूँ” — तो यह “मैं” कहाँ गया सोने के बीच?
शरीर सो गया, मन विश्राम में चला गया, पर चेतना की एक धारा बनी रही।
वही “मैं” जो सब अनुभवों का साक्षी है, वही आत्मा है।
यदि तुम इस साक्षी को पहचान लो, तो मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। क्योंकि जो सोता नहीं, वह मरता भी नहीं।
मृत्यु केवल शरीर की होती है — आत्मा का इससे कोई संबंध नहीं।
5. छिपे हुए तुम — साक्षी का रहस्य
“इस शरीर के पीछे तुम छिपे हो” — इसका अर्थ यह नहीं कि आत्मा किसी कोने में बैठी है।
यह छिपना रूपक है — क्योंकि हम अपनी पहचान को शरीर, नाम, संबंध, विचारों के साथ जोड़ लेते हैं।
हमारा असली स्वरूप इन सब पर पर्दे की तरह ढका रहता है।
तुम अपने नाम से पहचाने जाते हो — पर नाम तो तुम्हारा नहीं है, वह समाज ने दिया है।
तुम अपने पेशे, संबंध, विचार, धर्म से पहचाने जाते हो — पर ये सब तो बाहरी आवरण हैं।
असली “तुम” इन सबसे परे हो — मौन, निश्चल, असीम।
जब तक तुम अपने शरीर को “मैं” कहते रहोगे, तब तक तुम मृत्यु से डरोगे।
पर जब तुम देख लोगे कि “मैं शरीर नहीं, बल्कि साक्षी हूँ”, तब मृत्यु केवल एक परिवर्तन लगेगी — जैसे वस्त्र बदलना।
6. ओशो का दृष्टिकोण — अनुभव के पार जाना
ओशो हमेशा कहते हैं — सत्य को विचार से नहीं जाना जा सकता, केवल अनुभव से जाना जा सकता है।
यहाँ भी यही बात है।
तुम सैकड़ों बार सुनो कि “मैं आत्मा हूँ”, लेकिन जब तक तुम भीतर झाँककर उस साक्षी को अनुभव नहीं करोगे, यह वाणी केवल शब्द बनी रहेगी।
ध्यान इसका द्वार है।
जब तुम बैठते हो, आँखें बंद करते हो, और अपने भीतर की गतियों को देखते हो — विचार आते हैं, जाते हैं; भावनाएँ उठती हैं, मिटती हैं —
और तुम केवल देखते रहते हो — तब धीरे-धीरे तुम्हें आभास होता है कि “देखने वाला” इन सब से परे है।
वह साक्षी तुम्हारा असली स्वरूप है।
वह न शरीर है, न मन, न विचार।
वह केवल “होना” है — शुद्ध, शांत, निराकार।
7. शरीर से परे की यात्रा
शरीर तो केवल एक माध्यम है — एक वाहन।
यह जीवन के अनुभव के लिए आवश्यक है, पर यह अंतिम सत्य नहीं।
जैसे कोई साधक नदी पार करने के लिए नाव का उपयोग करता है, वैसे ही आत्मा शरीर का उपयोग करती है।
पर मूर्ख वही है जो नाव से चिपक जाता है और सोचता है — “यही सब कुछ है।”
शरीर की देखभाल करना आवश्यक है — क्योंकि यह मंदिर है जिसमें चेतना विराजमान है।
पर इसे “मैं” मान लेना सबसे बड़ी भूल है।
यही भूल सारे दुखों की जड़ है।
जब तक तुम स्वयं को शरीर समझते हो, तुम पीड़ा, भय, असुरक्षा और मृत्यु के अधीन रहोगे।
जैसे ही तुम स्वयं को साक्षी के रूप में पहचानते हो, तुम मुक्त हो जाते हो।
8. ओशो का संदेश — मृत्यु के पार जीवन
ओशो का कहना है कि जिसने मृत्यु को समझ लिया, उसने जीवन को समझ लिया।
क्योंकि मृत्यु केवल शरीर की है — और यदि तुम शरीर नहीं हो, तो मृत्यु का तुम पर कोई अधिकार नहीं।
जिसने यह जान लिया कि “मैं वह हूँ जो न कभी सोता है, न कभी जागता है”, उसके लिए जीवन और मृत्यु दोनों एक ही नृत्य के दो पक्ष बन जाते हैं।
फिर हर क्षण एक उत्सव बन जाता है — क्योंकि अब कुछ खोने का भय नहीं रहता।
फिर सोना भी ध्यान बन जाता है, जागना भी ध्यान बन जाता है।
फिर शरीर के साथ जीना भी आनंद है, और शरीर से मुक्त होना भी आनंद है।
9. समापन — साक्षी का अनुभव ही मुक्ति
ओशो की इस वाणी का सार यही है —
तुम्हारा शरीर नश्वर है, तुम्हारी आत्मा शाश्वत है।
जागना और सोना शरीर के चक्र हैं, आत्मा के नहीं।
जो यह पहचान लेता है, वह जन्म और मृत्यु के पार चला जाता है।
वह साक्षी बन जाता है — जैसे आकाश सब कुछ देखता है, पर किसी चीज़ में उलझता नहीं।
यही ध्यान की परम परिणति है — “मैं यह शरीर नहीं, मैं यह मन नहीं, मैं साक्षी हूँ।”
और जब यह अनुभूति स्थिर हो जाती है, तब जीवन स्वयं ध्यान बन जाता है, और हर श्वास मुक्ति का गीत गाने लगती है।
इसलिए ओशो कहते हैं —
“शरीर तो मरणधर्मा है। शरीर के ही एक यंत्र से तुम जागते हो, और शरीर के ही दूसरे यंत्र से तुम सोते हो। सब सपने शरीर के हैं, सब जागना-सोना शरीर का है। इस शरीर के पीछे तुम छिपे हो — जो न कभी सोता है, न कभी जागता है।”
यह वाणी तुम्हें याद दिलाने के लिए है कि तुम वही हो — जो सब कुछ देख रहा है, पर किसी में नहीं उलझा।
और जब तुम उस साक्षी को पहचान लोगे — तभी तुम वास्तव में जागोगे।

कोई टिप्पणी नहीं: