🌿 अशांति को समझने की कला — ओशो के “एस धम्मो सनंतनो” का रहस्य

मनुष्य का जीवन एक अद्भुत विरोधाभास है। वह शांति चाहता है, परंतु हर क्षण अशांत रहता है। वह प्रेम चाहता है, परंतु भय से भरा रहता है। वह सत्य की खोज में निकलता है, परंतु भ्रमों से चिपका रहता है। और जब बुद्ध या ओशो जैसे आचार्य यह कहते हैं कि “अशांति को समझो, शांति अपने आप उतर आएगी”, तो यह कथन सीधा नहीं है — यह हमारी जड़ता को हिला देने वाला है। यही वाणी ओशो ने “एस धम्मो सनंतनो” में कही — सनातन धर्म का यही रहस्य है कि शांति कोई साध्य नहीं, वह समझ की परिणति है।

1. चित्त की अस्थिरता का अर्थ

ओशो कहते हैं, “जिसका चित्त अस्थिर है…” — यहाँ चित्त का अर्थ केवल मन से नहीं है, बल्कि वह समग्र चेतना से है जिसमें विचार, भावनाएँ, इच्छाएँ और स्मृतियाँ सब समाहित हैं। अस्थिर चित्त वह है जो लगातार किसी न किसी आकर्षण या भय में डोलता रहता है।
हम सुबह कुछ चाहते हैं, शाम को कुछ और। कभी ध्यान की आकांक्षा होती है, कभी भोग की। कभी हम ईश्वर के चरणों में समर्पित होते हैं, तो कभी अहंकार में डूब जाते हैं। इस निरंतर डांवाडोल मनोभूमि में कोई स्थायित्व नहीं है।

अस्थिरता का कारण है अज्ञान — हम अपने भीतर के केंद्र को नहीं जानते। बाहर की घटनाओं से, विचारों से, दूसरों की राय से हम निरंतर प्रभावित होते रहते हैं। और जब तक हम स्वयं को जान नहीं लेते, हमारा चित्त एक पेंडुलम की तरह झूलता रहेगा — सुख से दुख, आशा से निराशा, प्रेम से घृणा तक।

2. सद्धर्म का न जानना

ओशो “सद्धर्म” शब्द का प्रयोग बुद्ध की परंपरा से लेते हैं — “सद्” यानी शुद्ध, और “धर्म” यानी वह जो धारण करने योग्य है।
सद्धर्म का अर्थ बाहरी रीति-रिवाज नहीं है; यह किसी पंथ या संप्रदाय का नाम नहीं। सद्धर्म का अर्थ है — अंतरदृष्टि

जो अपने भीतर की प्रकृति को, अपने अस्तित्व के शुद्ध स्वरूप को पहचानता है, वही सद्धर्म को जानता है।
बाकी सब केवल बौद्धिक जानकारी है।
धर्म ग्रंथों का अध्ययन सद्धर्म नहीं है; धर्म को जीना सद्धर्म है।

जब ओशो कहते हैं कि “जो सद्धर्म को नहीं जानता,” तो उनका आशय यह है कि वह व्यक्ति अभी भी उधार की मान्यताओं में जी रहा है — माता-पिता, समाज, परंपरा, पुरोहितों की बातें — सब उधार की। जब तक व्यक्ति अपनी आंखों से नहीं देखता, तब तक वह धर्म को नहीं जानता, केवल उसकी नकल करता है।

3. श्रद्धा का डांवाडोल होना

श्रद्धा का अर्थ विश्वास नहीं है। विश्वास हमेशा किसी वस्तु या व्यक्ति पर होता है, जबकि श्रद्धा भीतर की गुणवत्ता है।
ओशो कहते हैं — श्रद्धा का अर्थ है खुले हृदय से स्वीकार करना
जो व्यक्ति हर बात पर संदेह करता है, जो लगातार तर्क और प्रतितर्क में उलझा है, उसकी श्रद्धा डांवाडोल रहती है।

परंतु ध्यान रहे, ओशो अंधविश्वास के विरोधी हैं। वे कहते हैं कि श्रद्धा कोई अंधी स्वीकृति नहीं, बल्कि जागृत स्वीकृति है।
जब तुम स्वयं अनुभव करते हो, जब तुम्हें भीतर से सत्य की गंध आती है, तब श्रद्धा जन्म लेती है।
ऐसी श्रद्धा कभी डांवाडोल नहीं होती।

4. प्रज्ञा की परिपूर्णता

ओशो का यह कथन — “जिसकी श्रद्धा डांवाडोल है, उसकी प्रज्ञा परिपूर्ण नहीं हो सकती” — यही इस प्रवचन का हृदय है।
प्रज्ञा यानी विवेक, बुद्धि नहीं, बल्कि बुद्धत्व

बुद्धि विश्लेषण करती है, प्रज्ञा देखती है।
बुद्धि विचार करती है, प्रज्ञा साक्षी रहती है।

जब व्यक्ति का चित्त स्थिर होता है, श्रद्धा निर्मल होती है, तब भीतर एक ऐसी दृष्टि जन्म लेती है जो चीजों को जैसे हैं वैसे देखने लगती है — बिना विकृति, बिना टिप्पणी। यही प्रज्ञा है।

और ओशो कहते हैं — अगर प्रज्ञा परिपूर्ण नहीं, तो व्यक्ति अपूर्ण रहेगा।
क्योंकि पूर्णता तभी आती है जब भीतर का भ्रम समाप्त हो।
अपूर्ण व्यक्ति हमेशा कुछ खोज में रहेगा — सुख, प्रेम, ईश्वर या मुक्ति।

5. अपूर्णता और अशांति का संबंध

अपूर्णता का अर्थ है कि तुम अभी भी कुछ बनने की चेष्टा में हो।
तुम्हारा मन कहता है — “जब मैं यह पा लूंगा, तब सुखी हो जाऊंगा।”
पर यही तो अशांति की जड़ है।

ओशो कहते हैं, “और तुम अपूर्ण रहो, तो अशांति रहेगी।”
जो अपने आप में संतुष्ट नहीं, वह हमेशा भविष्य में दौड़ेगा।
भविष्य की यह दौड़ ही अशांति है।

यह अशांति केवल सामाजिक या आर्थिक नहीं, यह अस्तित्वगत है।
हमारे भीतर एक गहरी बेचैनी है — “कुछ तो कमी है, कुछ तो अधूरापन है।”
यह अधूरापन ही हमें बाहरी उपलब्धियों की ओर धकेलता है, और जब एक मिल जाती है, तो दूसरी की कमी महसूस होती है।

6. दो उपाय — खोज या समझ

अब ओशो कहते हैं — “जब तुम अशांत रहो, तो दो उपाय हैं — एक, शांति को खोजो; और दो, अशांति को समझो।”
यहाँ सबसे बड़ा मोड़ है।
आम मनुष्य हमेशा पहला उपाय चुनता है — वह शांति को खोजने निकल पड़ता है।

वह ध्यान के शिविरों में जाता है, गुरुओं के पास जाता है, पहाड़ों में जाता है, मंदिरों में जाता है।
परंतु ओशो कहते हैं, यह सब खोज व्यर्थ है।
क्योंकि खोजने वाला स्वयं अशांत है — और जब खोजने वाला अशांत है, तो जो भी वह पाएगा, उसमें वही अशांति प्रतिबिंबित होगी।

शांति कोई वस्तु नहीं जिसे पाया जा सके;
शांति तो तुम्हारे भीतर की समझ से प्रकट होती है

इसलिए दूसरा उपाय — “अशांति को समझो” — बुद्ध का उपाय है।

7. अशांति को समझने का अर्थ

अशांति को समझना यानी उससे भागना नहीं, उसे देखना।
जब तुम ध्यान से अपनी अशांति को देखते हो — बिना उसे बदलने की कोशिश किए — तब तुम्हें उसका स्वरूप समझ में आने लगता है।

तुम पाओगे कि अशांति तुम्हारे विचारों से बनती है, तुम्हारी इच्छाओं से, तुम्हारी अस्वीकृति से।
तुम्हारी अपेक्षाएँ, तुम्हारा “मैं”, तुम्हारा नियंत्रण का भाव — सब मिलकर एक तूफान रचते हैं।

और जब तुम उस तूफान को केवल देखते हो — बिना हस्तक्षेप — तो धीरे-धीरे तूफान शांत होने लगता है।
जैसे कोई बच्चा रो रहा हो और तुम बस उसे प्रेम से देखो, तो उसका रोना थम जाता है।

अशांति को समझना कोई तंत्र या क्रिया नहीं; यह दृष्टि की परिवर्तन है।
तुम अब अपनी भावनाओं के साथ तादात्म्य नहीं करते, बल्कि उन्हें घटित होते देखते हो।

8. बुद्ध का उपाय बनाम साधारण उपाय

ओशो इसलिए कहते हैं कि “अशांति को समझना बुद्ध का उपाय है।”
क्योंकि बुद्ध ने कभी शांति की खोज नहीं की।
उन्होंने केवल अपने भीतर की अशांति को देखा, समझा, और उस समझ से ही शांति उत्पन्न हो गई।

बुद्ध ने शांति को परिणाम के रूप में देखा, लक्ष्य के रूप में नहीं।
शांति खोजने वाला हमेशा संघर्ष में रहेगा — क्योंकि खोज का अर्थ है कमी का स्वीकार।

पर बुद्ध कहते हैं — “बस देखो, जो है उसे समझो।”
समझ ही मुक्ति है।

9. अशांति से पलायन क्यों अशांति को बढ़ाता है

जब हम अशांति से भागते हैं, तो हम उसे दबा देते हैं।
दबी हुई अशांति और गहरी हो जाती है।
वह हमारे अवचेतन में जाकर ऊर्जा बनती है — और किसी क्षण विस्फोट के रूप में फूट पड़ती है।

तुम देखोगे, जो व्यक्ति बाहर से बहुत शांत दिखाई देता है, भीतर से अक्सर सबसे अधिक अशांत होता है।
उसकी मुस्कान, उसका धर्म, उसकी पूजा — सब मुखौटे हैं।

ओशो कहते हैं — “शांति की तलाश में निकल गया, तो नई-नई अशांतियाँ मोल ले लेता है।”
क्योंकि खोज स्वयं ही अशांति है।
खोज का अर्थ है कि अभी जो है, वह पर्याप्त नहीं।
और जब तक यह भावना है कि “जो है, वह पर्याप्त नहीं,” तब तक शांति असंभव है।

10. समझ की यात्रा — ध्यान का सार

अब प्रश्न उठता है — “अशांति को समझना कैसे संभव है?”
ओशो कहते हैं — ध्यान इसका उत्तर है।

पर ध्यान का अर्थ कोई विशेष मुद्रा या जप नहीं।
ध्यान का अर्थ है — जागरूकता।
तुम चलो, खाओ, बोलो, काम करो — पर हर क्षण जागरूक रहो कि “मैं क्या कर रहा हूँ?”

जब तुम अपनी अशांति को बिना निर्णय के देखना सीख लेते हो, तो धीरे-धीरे एक अलग आयाम खुलता है — साक्षीभाव
तुम देखते हो कि अशांति तुम्हारे भीतर उठती है, पर तुम उससे अलग हो।
तुम सागर हो, लहर नहीं।

यह अनुभव ही शांति है।

11. ओशो की दृष्टि में “एस धम्मो सनंतनो”

एस धम्मो सनंतनो” — अर्थात् “यही सनातन धर्म है।”
सनातन धर्म का अर्थ है — वह जो कालातीत है, जो हर युग में सत्य है।

अशांति को समझने की यह प्रक्रिया कोई पंथ या मत नहीं है।
यह स्वयं अस्तित्व की व्यवस्था है।
जो समझ में आता है, वही शांत होता है।

यह धर्म बुद्ध के समय भी सत्य था, ओशो के समय भी, और आज भी।
मनुष्य चाहे किसी भी संस्कृति में जन्म ले, यदि वह अपनी अशांति को समझने की कला सीख जाए, तो वही सनातन धर्म का अनुयायी बन जाता है।

12. आधुनिक जीवन में इसका प्रयोग

आज का मनुष्य पहले से अधिक अशांत है।
प्रौद्योगिकी, प्रतिस्पर्धा, संबंधों की जटिलता — सबने हमारे भीतर निरंतर हलचल पैदा कर दी है।
हम “माइंडफुलनेस” या “योगा” में शांति खोजते हैं, परंतु वह टिकती नहीं।
क्योंकि मूल समस्या — अशांति से भागना — अभी भी जारी है।

यदि हम ओशो के इस सूत्र को समझ लें —
कि “शांति खोजने की नहीं, समझने की चीज़ है” —
तो हमारी जीवन-दिशा बदल सकती है।

हम हर घटना, हर भावना को देखने की साधना शुरू कर सकते हैं।
जब गुस्सा आए, तो उसे दबाओ मत; बस देखो।
जब डर आए, तो भागो मत; बस समझो कि यह क्यों है।
यह समझ ही धीरे-धीरे भीतर की परतें खोल देती है।

13. निष्कर्ष — समझ ही मुक्ति है

ओशो के इस प्रवचन का सार यही है —
शांति कोई साध्य नहीं, समझ का स्वाभाविक परिणाम है।
जो व्यक्ति अशांति को समझता है, वही शांत हो जाता है।

चित्त की स्थिरता, सद्धर्म का ज्ञान, श्रद्धा की दृढ़ता — ये सब एक ही दिशा में संकेत करते हैं — अंतरदृष्टि
जब दृष्टि भीतर जाती है, जब व्यक्ति अपने मन के खेलों को देखता है, तब प्रज्ञा परिपूर्ण होती है।
और जब प्रज्ञा परिपूर्ण होती है, तब व्यक्ति पूर्ण होता है।
पूर्णता में ही शांति है।

“एस धम्मो सनंतनो” — यही सनातन धर्म है।
यह धर्म न हिंदू है, न बौद्ध, न जैन; यह मनुष्य का धर्म है — देखने का, समझने का, जागने का धर्म

✨ अंतिम वचन

ओशो हमें यह नहीं सिखा रहे कि हम किसी आदर्श शांति की कल्पना करें।
वे हमें यह सिखा रहे हैं कि हम अपनी वास्तविकता को निहारेँ —
वह जैसी भी है, उसे स्वीकारें, समझें, देखें।
समझ में ही परिवर्तन है।

और जब समझ पूर्ण होती है, तो न कुछ पाने की चाह रह जाती है, न कुछ खोने का भय।
वहीं से शांति का उदय होता है।
वहीं से प्रेम और करुणा का प्रवाह शुरू होता है।

“अशांति को समझो, शांति अपने आप उतर आएगी।”
यही बुद्ध का उपाय है, यही ओशो का संदेश है, यही सनातन धर्म का सार है।

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