ओशो की यह बात —

“बहुत ज्यादा अपने में ही निरंतर उत्सुक होना एक तरह का रोग है। थोड़ी उत्सुकता स्वयं में होनी चाहिए, लेकिन यह अत्यधिक सेल्फ-सेंटर्ड आदमी जो है वह कभी शांत नहीं हो सकता, क्योंकि यह भी अशांति का एक केंद्र है उसका कि मैं, मैं, मैं-मैं ठीक हो जाऊं, मैं ऐसा हो जाऊं, मैं वैसा हो जाऊं अगर यह अत्यधिक है उसके चित्त में, तो यही चीज उसको शांत नहीं होने देगी।”

— यह वाणी “अनंत की पुकार” के दसवें प्रवचन से ली गई है, और इसमें ओशो आत्म-विकास की उस सूक्ष्म सीमा की बात कर रहे हैं जहाँ आत्म-चिंतन ध्यान बन सकता है, और आत्म-मोह रोग बन जाता है।

1. “अपने में निरंतर उत्सुक होना” — आत्म-अवलोकन और आत्म-मोह के बीच की रेखा

ओशो कहते हैं, स्वयं में झाँकना आवश्यक है, क्योंकि जब तक तुम भीतर नहीं देखोगे, तब तक तुम यह नहीं जान सकते कि तुम्हारे भीतर कौन बैठा है।
लेकिन, जब यह झाँकना आसक्ति बन जाता है, जब व्यक्ति हर समय अपने बारे में सोचता रहता है — “मैं कैसा हूँ, मैं कब ठीक होऊँगा, मैं कब परिपूर्ण बनूँगा, मेरे ध्यान में क्या कमी है, मैं कब शांत होऊँगा?” — तब यह आत्म-अवलोकन नहीं, बल्कि स्वयं के प्रति रोगग्रस्त आसक्ति बन जाती है।

यह “मैं” केंद्र बार-बार अपना ही चक्कर लगाता रहता है — और इसी में अशांति का जन्म होता है।

ओशो कहते हैं, “थोड़ी उत्सुकता स्वयं में होनी चाहिए।”
क्योंकि अगर बिल्कुल उत्सुकता न हो, तो तुम आत्म-अज्ञान में सोए रहोगे।
लेकिन यदि यह उत्सुकता अत्यधिक हो जाए, तो यह तुम्हें स्वयं के चारों ओर घूमता हुआ पागल बना देती है।

2. “मैं, मैं, मैं” — यह केंद्र ही अशांति है

जब व्यक्ति के चित्त में “मैं” का केंद्र बहुत घना हो जाता है, तो वह जहाँ भी जाता है, वही “मैं” उसके आगे-आगे चलता है।
यह “मैं” ही उसकी दृष्टि का पर्दा बन जाता है।
वह ध्यान करे, प्रेम करे, सेवा करे, ज्ञान खोजे — लेकिन हर जगह उसका उद्देश्य रहता है — “मैं ठीक हो जाऊँ, मैं पूर्ण बन जाऊँ, मैं मोक्ष पा लूँ।”
अब देखो — यह सब प्रयास दिखने में आध्यात्मिक लगते हैं, लेकिन भीतर गहराई में वे स्वार्थ से भरे हैं।
और जहाँ स्वार्थ है, वहाँ शांति नहीं आ सकती।

ओशो कहते हैं — यह “मैं” कोई ठोस वस्तु नहीं है, यह केवल विचार का निर्माण है।
यह “मैं” तुम्हारे भीतर बना हुआ एक काल्पनिक केंद्र है, जो तुम्हें यह भ्रम देता है कि तुम पृथक हो, विशेष हो।
परंतु अस्तित्व में कोई पृथकता नहीं।
वहाँ सब कुछ एक तरंग की तरह बह रहा है — नदी में हर बूंद समुद्र की ओर गतिमान है।
तुम जब कहते हो “मैं”, तब तुम इस समग्रता से अलग हो जाते हो, और इसी अलगाव में अशांति जन्म लेती है।

3. अत्यधिक आत्म-केन्द्रता क्यों रोग बन जाती है

ओशो कहते हैं, यह “मैं” जब अत्यधिक सक्रिय हो जाता है, तो वह किसी न किसी रूप में खुद को बनाए रखने की चेष्टा करता है।
वह यह नहीं चाहता कि उसका विलय हो, क्योंकि विलय का अर्थ है — “मैं” का अंत।
इसलिए वह नए-नए रूप लेता है — कभी धार्मिक बनकर, कभी ध्यानकर्ता बनकर, कभी साधक बनकर।
और फिर कहता है — “मैं मोक्ष पाना चाहता हूँ।”

लेकिन ध्यान देना — जो “मैं” मोक्ष पाना चाहता है, वही “मैं” तुम्हें बंधन में रखेगा।
क्योंकि जब तक “मैं” है, तब तक कोई पाने वाला बचा हुआ है।
मोक्ष तो तब घटता है जब “मैं” मिटता है।

ओशो कहते हैं — जब यह आत्म-केन्द्रता टूटती है, तब ही पहली बार सच्चा मौन जन्म लेता है।
क्योंकि मौन तभी आता है जब भीतर कोई “केंद्र” नहीं बचता जो कुछ पाने की चेष्टा करे।

4. “मैं ठीक हो जाऊं” — सुधार का जाल

यह बहुत सूक्ष्म और आकर्षक जाल है।
मनुष्य सोचता है कि वह आध्यात्मिक पथ पर है, क्योंकि वह अपने सुधार की बात कर रहा है —
“मैं शांत हो जाऊँ, मैं ध्यान में गहराई पाऊँ, मैं अब क्रोध न करूँ।”

लेकिन यह सुधार का प्रयास ही तुम्हें अशांत बनाए रखता है।
क्योंकि हर सुधार की जड़ में एक अस्वीकार छिपा है —
तुम अपने वर्तमान को अस्वीकार कर रहे हो, अपने इस क्षण को नकार रहे हो।
तुम कह रहे हो — “मैं जैसा हूँ, वैसा ठीक नहीं; मुझे वैसा बनना है।”

यह “बनने” की आकांक्षा ही तुम्हारे भीतर निरंतर संघर्ष पैदा करती है।
और जहाँ संघर्ष है, वहाँ शांति नहीं हो सकती।

ओशो कहते हैं — शांति तब नहीं आती जब तुम “शांत होना” चाहते हो;
शांति तब आती है जब तुम उस चाह को भी देख लेते हो और उसे छोड़ देते हो।
जब “शांत होना” भी तुम्हारे लिए कोई लक्ष्य नहीं रह जाता — तब तुम मौन में गिर पड़ते हो।

5. अत्यधिक आत्म-चिंतन का परिणाम — विभाजित व्यक्तित्व

जब व्यक्ति हर समय स्वयं में ही उलझा रहता है —
“मैं कैसा हूँ?”, “मैं सही हूँ या गलत?”, “मेरा ध्यान गहरा क्यों नहीं?”, “मुझसे गलती क्यों होती है?” —
तो उसके भीतर एक निरंतर द्वंद्व चलता रहता है।

एक “मैं” है जो देख रहा है, और एक “मैं” है जिसे देखा जा रहा है।
यह दो भागों में बँटा हुआ मन हमेशा तनावग्रस्त रहता है।

ओशो कहते हैं, ध्यान का अर्थ है — देखना बिना विभाजन के।
सिर्फ देखना, बिना निर्णय, बिना सुधार की आकांक्षा के।
लेकिन जब तुम आत्म-केन्द्रित हो, तो देखने वाला भी “मैं” है और जिसके बारे में देखा जा रहा है, वह भी “मैं” है।
इसलिए यह देखने की प्रक्रिया कभी शांत नहीं हो सकती।

सच्चा ध्यान तब घटता है जब देखने वाला और देखा जाने वाला एक हो जाते हैं —
जहाँ केवल देखना बचता है, कोई “मैं” नहीं बचता।
और तब ही भीतर शांति उतरती है।

6. “मैं” की धारा से निकलना — अस्तित्व के साथ एक होना

ओशो कहते हैं — जब तक व्यक्ति “मैं” की सीमाओं में बंद रहता है, वह अस्तित्व से टकराव में रहता है।
वह अलग-थलग महसूस करता है, असुरक्षित महसूस करता है।
इसलिए वह निरंतर कुछ बनने, कुछ पाने की दौड़ में लगा रहता है।

पर अस्तित्व में शांति स्वाभाविक है।
जैसे वृक्ष खड़ा है — वह स्वयं को बदलने की चिंता नहीं करता।
जैसे फूल खिलता है — वह यह नहीं सोचता कि उसे और सुगंधित बनना चाहिए।
वह जो है, उसी में सम्पूर्ण है।
और इसी सम्पूर्णता में उसकी शांति है।

मनुष्य ने अपने “मैं” के कारण यह सहजता खो दी है।
वह कभी कहता है — “मुझे अच्छा बनना है,” कभी — “मुझे ईश्वर तक पहुँचना है।”
पर हर दिशा में उसका “मैं” सक्रिय है।
ओशो कहते हैं, जब यह “मैं” पिघलता है, तो व्यक्ति अपने चारों ओर के अनंत में विलीन हो जाता है।
फिर कोई प्रयास नहीं रहता, कोई तनाव नहीं रहता।
तब वह शांति नहीं ढूँढता — वह स्वयं शांति बन जाता है।

7. “थोड़ी उत्सुकता स्वयं में होनी चाहिए” — आत्म-अवलोकन की स्वस्थता

ओशो इस बात को एकदम स्पष्ट करते हैं — कि थोड़ा आत्म-अवलोकन आवश्यक है।
क्योंकि बिना आत्म-दर्शन के व्यक्ति पशु बना रहता है।
वह अपने विचारों, भावनाओं और प्रवृत्तियों के अधीन जीता है।
उसे यह भी नहीं पता कि वह कौन है, क्यों कुछ करता है।

इसलिए थोड़ा ध्यान, थोड़ा अवलोकन — यह आत्म-जागरूकता का द्वार है।
लेकिन इसकी मात्रा यदि बढ़ जाए, तो यह आत्म-जागरूकता नहीं रहती — यह आत्म-ग्रस्तता बन जाती है।

जैसे नमक भोजन को स्वादिष्ट बनाता है, पर यदि नमक ज्यादा डाल दो, तो भोजन कड़वा हो जाता है —
वैसे ही आत्म-दर्शन भी तब तक सुंदर है जब तक वह सहज है।
जब वह अत्यधिक हो जाता है, तब वह तुम्हें जीवन से काट देता है।

ओशो कहते हैं — “स्वयं को देखो, लेकिन स्वयं में उलझो मत।”
देखने का अर्थ है साक्षी होना,
और उलझने का अर्थ है पहचान बन जाना।
साक्षी हो जाना मुक्ति है, पहचान बन जाना बंधन है।

8. अशांति की जड़ — “मैं” की निरंतर सक्रियता

ओशो की दृष्टि में, समस्त अशांति का कारण यही “मैं” है।
मनुष्य सोचता है कि उसे बाहर से शांति नहीं मिलती, पर वास्तव में अशांति भीतर से उपजती है।
यह “मैं” हर समय कुछ करना चाहता है, कुछ पाना चाहता है, कुछ सिद्ध करना चाहता है।

यह “मैं” कभी शांत नहीं बैठ सकता — क्योंकि उसका अस्तित्व ही अशांति पर टिका है।
यदि वह शांत हो जाए, तो वह मिट जाएगा।

इसलिए वह बार-बार नई बेचैनियाँ खोजता है —
कभी धन के रूप में, कभी प्रेम के रूप में, कभी धर्म के रूप में।
यह “मैं” चाहे कितना भी आध्यात्मिक हो जाए, उसका मूल स्वभाव वही रहता है — अशांति।

इसलिए ओशो कहते हैं —

“यह अत्यधिक सेल्फ-सेंटर्ड आदमी जो है वह कभी शांत नहीं हो सकता।”

क्योंकि उसकी पूरी चेतना “मैं” की परिधि में घूम रही है।
शांति तभी आती है जब चेतना की दिशा “मैं” से बाहर, अनंत की ओर हो जाती है।

9. “अनंत की पुकार” — ओशो का संदेश

इस प्रवचनमाला में ओशो मनुष्य को उसकी सीमाओं से बाहर बुलाते हैं।
वह कहते हैं — अस्तित्व तुम्हें बुला रहा है, लेकिन तुम अपने “मैं” में इतने उलझे हो कि वह पुकार सुन ही नहीं पाते।

यह “अनंत की पुकार” केवल सुनाई तब देती है जब भीतर मौन हो।
और मौन तभी आता है जब “मैं” की आवाज़ धीमी हो जाती है।

जब तक तुम कहते रहोगे — “मैं ध्यान कर रहा हूँ, मैं समझ रहा हूँ, मैं बढ़ रहा हूँ” —
तब तक तुम अनंत की दिशा में नहीं बढ़ रहे, तुम अपने ही चारों ओर घूम रहे हो।

अनंत की दिशा में यात्रा तब शुरू होती है जब “मैं” ठहर जाता है।
जब तुम कह सको —

“मैं कुछ नहीं हूँ, बस अस्तित्व मुझे बहा रहा है।”

तब तुम अनंत की धारा में विलीन हो जाते हो।
तब कोई प्रयास नहीं बचता, केवल समर्पण बचता है।

10. समर्पण — आत्म-केन्द्रता का अंत

ओशो कहते हैं, समर्पण का अर्थ यह नहीं कि तुम किसी बाहरी गुरु या देवता के आगे झुको।
समर्पण का अर्थ है — अपने भीतर के “मैं” को छोड़ देना।
वह “मैं” जो हमेशा कुछ बनने की चाह में भागता है।
जब तुम उसे छोड़ देते हो, तो तुम अस्तित्व के साथ एक हो जाते हो।

अब तुम नहीं कहते “मैं ध्यान कर रहा हूँ” —
अब तुम कहते हो, “ध्यान घट रहा है।”
अब तुम नहीं कहते “मैं प्रेम करता हूँ” —
अब तुम कहते हो, “प्रेम बह रहा है।”

और इसी क्षण तुम पाते हो कि शांति कभी बाहर से नहीं आती;
वह तो तुम्हारे भीतर ही थी — बस “मैं” के कोलाहल ने उसे ढँक रखा था।

11. निष्कर्ष — शांति की कुंजी “मैं” का विसर्जन है

ओशो के इस वचन का सार यही है —
थोड़ी आत्म-जागरूकता आवश्यक है, पर अत्यधिक आत्म-केन्द्रता मन का रोग बन जाती है।
यह रोग तुम्हें निरंतर बेचैन रखता है, क्योंकि तुम्हारे सारे प्रयत्न “मैं” को बनाए रखने के लिए होते हैं।
और जब तक “मैं” है, तब तक द्वंद्व है, प्रयास है, अशांति है।

शांति तब आती है जब “मैं” स्वयं मिट जाता है,
जब तुम्हारी चेतना “मुझमें क्या हो रहा है” से निकलकर “क्या हो रहा है” पर ठहर जाती है।

तब तुम अपने अनुभवों के केंद्र नहीं रह जाते — तुम केवल साक्षी बन जाते हो।
और यही साक्षी होना ओशो के अनुसार ध्यान है, मुक्ति है, और शांति का द्वार है।

इसलिए ओशो कहते हैं —

“थोड़ी उत्सुकता स्वयं में होनी चाहिए, लेकिन अगर यह अत्यधिक हो जाए तो यही उत्सुकता तुम्हारी अशांति बन जाएगी।”

और जब यह बात तुम्हारे हृदय में उतर जाती है,
तब तुम अपने “मैं” से परे हो जाते हो —
तब तुम केवल जीवन की लय में बहते हो,
जहाँ कोई साधक नहीं, कोई साध्य नहीं —
सिर्फ मौन, सिर्फ अनंत का संगीत।

कोई टिप्पणी नहीं:

Blogger द्वारा संचालित.