कर्म कोई सज़ा नहीं, एक दर्पण है

ओशो का यह कथन साधारण दिखाई देता है, लेकिन इसके भीतर जो विस्फोट छुपा है, वह आदमी की पूरी जीवन-दृष्टि को हिला सकता है। सामान्य धारणा में कर्म का अर्थ लिया जाता है — अच्छा करो, अच्छा मिलेगा; बुरा करो, बुरा मिलेगा। लेकिन ओशो इस नैतिक गणित को तोड़ते हैं। वे कर्म को किसी न्यायालय की तरह नहीं देखते, जहाँ कोई जज बैठा हुआ है, जो हिसाब लगा रहा है। उनके लिए कर्म कानून नहीं, प्रक्रिया है

जब ओशो कहते हैं कि “कर्म का कुल इतना ही अर्थ है कि तुम जो करते हो, अंततः तुम्हीं को मिल जाता है”, तो वे किसी भविष्य के स्वर्ग-नर्क की बात नहीं कर रहे। वे इस क्षण की बात कर रहे हैं। वे यह नहीं कह रहे कि कोई और तुम्हें फल देगा; वे कह रहे हैं कि कर्म ही फल बन जाता है। जैसे बीज और वृक्ष अलग नहीं होते, वैसे ही कृत्य और परिणाम अलग नहीं हैं।

“तुम जो करते हो, अंततः तुम्हीं को मिल जाता है” — कारण और दंड नहीं, पहचान और प्रतिध्वनि

यह वाक्य बहुत सी धार्मिक भ्रांतियों को तोड़ देता है। अधिकतर धर्मों ने आदमी को यह सिखाया है कि कोई ऊपर बैठा हुआ हिसाब रख रहा है — ईश्वर, न्याय, प्रकृति, या कोई अदृश्य शक्ति। ओशो इस पूरी अवधारणा को खारिज कर देते हैं।

वे कहते हैं — तुम जो करते हो, वही बनते हो।
कर्म कोई बाहरी क्रिया नहीं है; कर्म तुम्हारी चेतना की गुणवत्ता है।

अगर तुम क्रोध में जीते हो, तो तुम क्रोध पैदा नहीं कर रहे, तुम क्रोध हो जाते हो। और जो क्रोध हो जाता है, वह उसी संसार में जीता है, जहाँ क्रोध ही उसका वातावरण बन जाता है।

इसलिए ओशो कर्म को “सज़ा” की भाषा में नहीं, “परिणति” की भाषा में समझाते हैं। बीज को सज़ा नहीं मिलती कि उससे काँटे उग आए — यह उसकी प्रकृति थी। उसी तरह, आदमी को दंड नहीं मिलता; वह बस वही काटता है, जो उसने अपने भीतर बोया है।

“देर-अबेर हो सकती है” — समय का भ्रम और चेतना की गति

यहाँ ओशो एक बहुत सूक्ष्म बात कह रहे हैं। अगर कर्म तुरंत फल दे, तो आदमी सीखने के बजाय डरने लगे। और अगर कर्म कभी फल न दे, तो आदमी जिम्मेदारी खो दे।

देर-अबेर का अर्थ यह नहीं कि कोई देरी से सज़ा आएगी। इसका अर्थ है कि चेतना की गति और समय की गति अलग-अलग होती है

कभी-कभी परिणाम तुरंत दिखाई नहीं देता, क्योंकि बीज अभी गहरे पड़ा है। कभी-कभी परिणाम वर्षों बाद आता है, क्योंकि चेतना ने उसे पचाने में समय लिया।

लेकिन ओशो यह साफ कर देते हैं कि देर-अबेर से भ्रम मत पालो। इसका अर्थ यह नहीं कि तुम बच गए। इसका अर्थ यह है कि प्रक्रिया चल रही है, दिख नहीं रही।

“इसलिए तुम वही करना, जो तुम चाहते हो कि तुम्हें मिले” — नैतिक आदेश नहीं, आत्म-जिम्मेदारी

यह वाक्य सुनने में उपदेश जैसा लगता है, लेकिन असल में यह नैतिकता का अंत है।

ओशो यहाँ यह नहीं कह रहे कि “अच्छा बनो”। वे कह रहे हैं — सचेत बनो
अगर तुम जो कर रहे हो, वही तुम्हें बनना पड़ेगा, तो सोचो — क्या तुम वही बनना चाहते हो?

यह कोई धार्मिक भय नहीं पैदा करता, बल्कि एक गहरी स्वतंत्रता देता है।
अब तुम किसी ग्रंथ के आदेश से नहीं जी रहे, बल्कि अपने ही भविष्य की जिम्मेदारी उठा रहे हो।

“तुम अगर इतने नर्क में खड़े हो…” — नर्क कोई स्थान नहीं, मनःस्थिति है

ओशो के लिए नर्क और स्वर्ग कोई भौगोलिक जगहें नहीं हैं। वे चेतना की अवस्थाएँ हैं।

नर्क वह स्थिति है, जहाँ आदमी खुद से भाग रहा है।
जहाँ पछतावा है, अपराध-बोध है, भय है, तुलना है।

और ओशो यहाँ सबसे क्रांतिकारी बात कहते हैं —
अगर तुम नर्क में खड़े हो, तो किसी और के कारण नहीं

यह वाक्य आदमी के सारे बहाने छीन लेता है। समाज, माता-पिता, परिस्थितियाँ, भाग्य — सब गिर जाते हैं।

यह कठोर लगता है, लेकिन यही मुक्ति की शुरुआत है। क्योंकि जब तक दोष बाहर है, परिवर्तन असंभव है।

“जन्मों-जन्मों में जो तुमने किया है” — पुनर्जन्म से अधिक स्मृति की बात

इस वाक्य को लोग अक्सर literal पुनर्जन्म के अर्थ में पकड़ लेते हैं। लेकिन ओशो के यहाँ “जन्मों-जन्मों” का अर्थ केवल शारीरिक जन्म नहीं है।

हर दिन, हर क्षण, तुम नए जन्म लेते हो।
हर आदत, हर पैटर्न, हर प्रतिक्रिया — एक पुराना जन्म है।

तुम्हारा वर्तमान अतीत का संचित रूप है।
और वह अतीत केवल पिछले जीवन नहीं, पिछले क्षणों का भी जोड़ है।

कर्म और स्वतंत्रता का संबंध

लोग सोचते हैं कि अगर कर्म का नियम है, तो स्वतंत्रता कहाँ गई?
ओशो कहते हैं — यही तो स्वतंत्रता है।

अगर कर्म का नियम न हो, तो तुम्हारे चुनाव का कोई अर्थ नहीं।
कर्म का नियम तुम्हें गुलाम नहीं बनाता; वह तुम्हें जिम्मेदार स्वतंत्रता देता है।

कर्म से मुक्ति कैसे?

यहाँ ओशो सबसे बड़ा रहस्य खोलते हैं —
कर्म से मुक्ति कर्म छोड़ने से नहीं, कर्ता छोड़ने से होती है।

जब तुम कर्ता नहीं रहते, केवल साक्षी रहते हो, तब कर्म बीज नहीं बनता।
तब क्रिया होती है, लेकिन संग्रह नहीं होता।

यही संन्यास है। यही ध्यान है। यही जागरण है।

निष्कर्ष नहीं, एक मौन

ओशो का यह कथन किसी निष्कर्ष पर नहीं ले जाता। यह तुम्हें तुम्हारे सामने खड़ा कर देता है।

यह कहता है —
देखो, जो तुम हो, वही तुम्हारा संसार है।
जो तुम कर रहे हो, वही तुम्हारा भविष्य नहीं, तुम्हारा वर्तमान भी है।

और अगर यह समझ आ जाए, तो न सुधार की ज़रूरत है, न पश्चाताप की —
सिर्फ जागने की ज़रूरत है।

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