दर्द के साथ हम दो काम कर सकते हैं। दर्द को मिटाने का, वह धर्म की श्रेष्ठतम संभावना है। दर्द को भुलाने का, वह धर्म की निकृष्टतम संभावना है। जब दुखी आदमी धर्म की तरफ बढ़ता है, तो वह सांत्वना के लिए जा रहा है। जब सुखी आदमी धर्म की तरफ बढ़ता है, तब वह संगीत के लिए जा रहा है। इसलिए मैं कहता हूं, जब आप सुख से भरे हों, तब धर्म की तरफ बढ़ना।” — Osho

1. दर्द का अर्थ समझना

आज के समय में इंसान दर्द से डरता है। जैसे ही कोई तकलीफ आती है—चाहे वह मानसिक हो, शारीरिक हो या भावनात्मक—हम तुरंत भागने लगते हैं। हम उसे भूलना चाहते हैं, उसे दबाना चाहते हैं, उसे ढक देना चाहते हैं। कोई शराब में भूलता है, कोई मनोरंजन में, कोई सोशल मीडिया में, कोई रिश्तों में। हम अपने दर्द से सामना नहीं करना चाहते, क्योंकि हमें सिखाया गया है कि दर्द बुरा है। पर ओशो कहते हैं—दर्द बुरा नहीं है, वह जागृति का द्वार है।

दर्द जब आता है, तो वह हमें हमारी नींद से जगाता है। वह हमें बताता है कि कहीं न कहीं कुछ गलत है, कुछ असंतुलित है, कुछ ऐसा है जिसे समझना जरूरी है। जिस तरह शरीर का दर्द हमें चेतावनी देता है कि कोई बीमारी भीतर है, उसी तरह मन का दर्द हमें बताता है कि हमारी चेतना में कोई दरार है। दर्द एक संदेशवाहक है—वह हमें भीतर झांकने का निमंत्रण देता है।

2. दर्द को मिटाना और दर्द को भूलना

ओशो ने दो शब्दों में फर्क किया—दर्द को मिटाना और दर्द को भूलना।

दर्द को भूलना मतलब है उससे भाग जाना। जैसे कोई व्यक्ति अपने अकेलेपन से परेशान है, तो वह दोस्तों में, पार्टियों में या सोशल मीडिया में खुद को व्यस्त रखता है। वह सोचता है कि अब मैं खुश हूं। लेकिन वह खुशी नकली है। वह बस दर्द को ढक रही है, मिटा नहीं रही। यह है धर्म की निकृष्टतम संभावना—क्योंकि इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ, बस ध्यान भटका दिया गया।

दर्द को मिटाना का मतलब है दर्द के मूल को समझना। जब आप अपने दुख को बिना डर, बिना भागे देखते हैं, तब आप पाते हैं कि दर्द एक ऊर्जा है। उसे दबाने के बजाय आप उसे समझ लें, तो वह करुणा में बदल जाती है, प्रेम में बदल जाती है। यह है धर्म की श्रेष्ठतम संभावना—जहां दर्द मिटता है, क्योंकि आप उसके पार चले जाते हैं।

3. धर्म की ओर दो रास्ते

ओशो कहते हैं—“जब दुखी आदमी धर्म की तरफ बढ़ता है, तो वह सांत्वना के लिए जा रहा है। जब सुखी आदमी धर्म की तरफ बढ़ता है, तब वह संगीत के लिए जा रहा है।”

आज के युग में बहुत से लोग धर्म की तरफ इसलिए मुड़ते हैं क्योंकि वे दुखी हैं। उनका मकसद है—कुछ राहत मिले, कुछ सांत्वना मिले, मन को थोड़ी शांति मिले। वे ध्यान करते हैं ताकि तनाव कम हो, प्रार्थना करते हैं ताकि समस्या सुलझे, मंदिर जाते हैं ताकि मन हल्का हो। यह गलत नहीं है, लेकिन यह आध्यात्मिकता की शुरुआत नहीं है, यह केवल उपचार है।

पर जब एक सुखी आदमी धर्म की ओर बढ़ता है, तब स्थिति बिल्कुल अलग होती है। वह सांत्वना नहीं चाहता, वह उत्सव चाहता है। वह दुख से भागने के लिए नहीं, बल्कि आनंद को और गहराई से जीने के लिए जाता है। उसका धर्म दुख का इलाज नहीं, बल्कि आनंद का विस्फोट बन जाता है।

ओशो का संदेश है—जब तुम आनंद में हो, तब धर्म की ओर जाओ। क्योंकि तब तुम्हारा धर्म उत्सव बनेगा, तुम्हारी प्रार्थना नृत्य बन जाएगी, तुम्हारा ध्यान गीत बन जाएगा।

4. आधुनिक समय में इस विचार का अर्थ

आज की दुनिया में इंसान के पास सब कुछ है—सुविधा है, पैसा है, तकनीक है, पर फिर भी भीतर खालीपन है। यह खालीपन ही आधुनिक दर्द है। इंसान अपने भीतर के दर्द को भूलने के लिए भाग रहा है—नेटफ्लिक्स पर, पार्टियों में, करियर की दौड़ में, लाइक्स और फॉलोअर्स में। हर जगह बस एक ही प्रयास है—किसी तरह भूल जाएं कि भीतर कितना शून्य है।

ओशो का यह विचार आज के समय में एक क्रांति की तरह है। वह कह रहे हैं—भागो मत। उस दर्द को देखो, महसूस करो, स्वीकार करो। जो भी तुम महसूस करते हो, वही तुम्हारे भीतर की सच्चाई है। और अगर तुम उसे देख सको बिना किसी निर्णय के, तो वही दर्द तुम्हें बदल देगा।

आज के इंसान के लिए ओशो का संदेश यही है—सजग बनो। दर्द आए तो उसे अनुभव करो, उसे समझो। उसमें से सीखो। क्योंकि वही अनुभव तुम्हें आत्मा तक ले जाएगा।

5. दर्द और ध्यान का संबंध

ओशो के अनुसार, ध्यान का पहला कदम है—अपने दर्द को देखना। जो व्यक्ति अपने दुख को पूरी तरह जी सकता है, वही ध्यान में गहराई तक उतर सकता है। ध्यान कोई तकनीक नहीं है; वह तो समझ का परिणाम है। जब तुम समझ जाते हो कि दर्द क्या है, तो मन शांत होने लगता है। और उस शांति में तुम्हारा असली स्वरूप प्रकट होता है।

आज ध्यान को एक “stress relief” की तकनीक बना दिया गया है। लोग ध्यान करते हैं ताकि तनाव कम हो, नींद बेहतर हो, फोकस बढ़े। लेकिन ओशो कहते हैं—यह ध्यान नहीं, यह मन की चाल है। ध्यान का असली अर्थ है—स्वयं को समझना, स्वयं को जानना। और यह तभी संभव है जब तुम दर्द से भागना छोड़ दो।

6. सुख और धर्म का मिलन

ओशो कहते हैं—जब तुम सुखी होकर धर्म की ओर बढ़ते हो, तब तुम्हारा धर्म प्रेम में बदल जाता है। दुख में धर्म तुम्हें रुलाता है, सुख में धर्म तुम्हें नचाता है। दुख में धर्म सांत्वना देता है, सुख में धर्म संगीत बन जाता है। यही ओशो की भाषा का सौंदर्य है।

वह कहते हैं—जीवन कोई समस्या नहीं, यह एक उत्सव है। लेकिन उत्सव तभी संभव है जब तुम दर्द से डरना छोड़ दो। जो व्यक्ति दर्द को स्वीकार कर लेता है, उसके भीतर एक नया फूल खिलता है—वह फूल है आनंद।

7. ओशो का आधुनिक मनुष्य के लिए संदेश

आज का मनुष्य बहुत “busy” है लेकिन “alive” नहीं है। उसके पास समय नहीं है खुद के लिए। वह मशीन बन गया है। सुबह से शाम तक भागता है, लेकिन पता नहीं किसके पीछे। उसका जीवन बाहर की उपलब्धियों से भरा है, लेकिन भीतर खाली है।

ओशो कहते हैं—पहले भीतर जाओ। जब तुम भीतर जाओगे, तो तुम पाओगे कि दर्द तुम्हारा शत्रु नहीं, तुम्हारा गुरु है। वह तुम्हें अपने भीतर के सत्य तक पहुंचाने का माध्यम है। और जब तुम अपने दर्द को समझ लोगे, तो बाहर की हर चीज़ अपने आप संतुलित होने लगेगी।

8. दर्द से रूपांतरण की यात्रा

ओशो के अनुसार, जीवन में दर्द आवश्यक है। जैसे सोने को आग में तपाना पड़ता है ताकि वह शुद्ध हो सके, वैसे ही आत्मा को भी दर्द के अनुभव से गुजरना पड़ता है ताकि वह जाग सके। लेकिन फर्क इतना है—ज्यादातर लोग उस तप को झेलते नहीं, उससे भाग जाते हैं। और जो उससे गुजर जाता है, वह बुद्ध बन जाता है।

ओशो कहते हैं—दर्द तुम्हें तोड़ने नहीं आया है, वह तुम्हें खोलने आया है।
हर आंसू एक बीज है, जो अगर सजगता की मिट्टी में गिरे तो करुणा का वृक्ष बन जाता है।

9. धर्म और आधुनिकता का संवाद

आज का धर्म भी बदल गया है। वह सांत्वना देने वाला उद्योग बन गया है। मंदिर, आश्रम, गुरु—सब दुखियों की सेवा में लगे हैं, लेकिन ओशो कहते हैं—यह आध्यात्मिकता नहीं, यह मनोवैज्ञानिक उपचार है। सच्चा धर्म वह है जो तुम्हें जाग्रत करे, न कि सुला दे।

ओशो का संदेश है—धर्म को दवा मत बनाओ, उसे नृत्य बनाओ। अगर तुम केवल तब ईश्वर को याद करते हो जब तुम दुखी हो, तो तुम्हारा ईश्वर भी दुख का हिस्सा बन जाता है। लेकिन जब तुम आनंद में हो, तब ईश्वर को याद करो—तब वह तुम्हारे भीतर का उत्सव बन जाता है।

10. निष्कर्ष — आधुनिक जीवन के लिए ओशो की पुकार

ओशो के इस विचार का सार यह है कि दर्द को मिटाना जागृति है और दर्द को भूलना अज्ञानता।
दर्द को मिटाने का अर्थ है—उसे समझना, उससे पार जाना, उसे चेतना में रूपांतरित करना।
और जब तुम यह कर लेते हो, तब तुम्हारा धर्म भय से नहीं, प्रेम से जन्म लेता है।

आज के युग में ओशो की आवाज यही कहती है—
भागो मत, रुको।
दर्द को महसूस करो, उसे जीओ।
क्योंकि वही तुम्हें अपने सच्चे स्वरूप तक ले जाएगा।
और जब तुम अपने सच्चे स्वरूप को जान लोगे,
तब तुम्हारा हर क्षण पूजा बन जाएगा, हर सांस प्रार्थना बन जाएगी।

क्या चाहो, किससे भागो?
जो भी दर्द है, वह तुम्हारी दिशा दिखा रहा है।
उसे दबाओगे तो खो जाओगे,
उसे देखोगे तो मिल जाओगे।
और जो मिल गया स्वयं से—
वह ही धर्म की श्रेष्ठतम संभावना है।

यही ओशो का आधुनिक मनुष्य के लिए सन्देश है—दुख से नहीं, आनंद से धर्म की ओर बढ़ो।

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