नीचे प्रस्तुत है एक विस्तृत प्रवचन, जिसका आधार है – "बुद्धि हमेशा अभाव को खोजती है।"
जब हम कहते हैं कि "बुद्धि हमेशा अभाव को खोजती है", तो इसका मतलब सिर्फ इतना नहीं कि इंसान कुछ कम है या उसके पास कुछ नहीं है – बल्कि यह एक गहरा रहस्य है कि हमारी सोच, हमारी बुद्धि, एक अंतहीन खोज में लगी रहती है, और यह खोज हमेशा उस चीज़ की तलाश में रहती है जिसे हम अनुभव नहीं कर पाते। ऐसा लगता है जैसे हमारी बुद्धि एक अनंत प्यास का पानी है, जो हर पल कुछ और मांगती रहती है।
अब आप सोचेंगे – "लेकिन भाई, क्या हमें हमेशा ऐसा महसूस करना ही पड़ेगा?" ओशो कहते हैं कि वास्तव में, हमारी यह अंतर्निहित खोज हमें एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ हम अपने आप से वंचित रहते हैं। हम हमेशा उस कमी की ओर देखते हैं, जो हमारी नजर से चूक जाती है, जबकि हमारी अपनी पूर्णता हमारे भीतर ही मौजूद है।
बुद्धि की उस जिज्ञासा का खेल
एक समय की बात है, एक साधु अपने शिष्यों के बीच यह चर्चा कर रहा था – "क्या आपने कभी गौर किया है कि हम हमेशा कुछ कमी की तलाश में रहते हैं? हम इतने बेचैन रहते हैं कि कभी यह नहीं समझ पाते कि हमारे भीतर जो है, वही हमारे लिए पूरी ब्रह्मांड है।" शिष्य मुस्कुरा कर बोले, "गुरुदेव, तो इसका मतलब यह है कि हम अपने अंदर ही सुकून ढूंढ सकते हैं?" गुरुदेव ने तीखी हंसी के साथ कहा, "बिल्कुल! जब तुम बाहर की दुनिया में हर कमी की तलाश में निकलोगे, तो तुम कभी उस अनंत समृद्धि को नहीं पहचान पाओगे जो तुम्हारे भीतर है।" इस प्रकार के उदाहरण हमें बताते हैं कि बुद्धि, जो अक्सर अभाव में ही देखती है, कभी भी उस पूर्णता को नहीं पहचान पाती, जो हम में समाहित है।
बुद्धि का अभाव की ओर रुख
हमारी बुद्धि का अभाव की तलाश में होने का एक और पहलू यह है कि हम हमेशा उस चीज़ की कमी महसूस करते हैं, जो हमें समाज, शिक्षा, धन या यहां तक कि प्रेम में भी चाहिए होती है। लेकिन क्या वाकई में इन सबकी कमी होती है? ओशो कहते हैं कि ये सभी बातें एक भ्रम हैं – एक ऐसी छल-कपट भरी सोच जिसने हमारे मन को बांध रखा है। जब हम इस भ्रम में फंस जाते हैं, तो हमारी बुद्धि उस कमी को देखकर निरंतर तड़पती रहती है।
सोचिए, एक पेड़ है जिसके शाखाएँ फैली हुई हैं, लेकिन वह अपने अस्तित्व के बारे में सोचता रहता है कि उसकी कोई शाखा अधूरी है। उसे लगता है कि कहीं उसकी शाखाओं में से कोई शाखा झुक गई है, या कोई पत्ती गिरी हुई है। इसी तरह, हमारी बुद्धि भी निरंतर उस कमी की तलाश में रहती है – चाहे वह धन हो, प्रतिष्ठा हो या आत्मिक पूर्णता। और जब तक हम इस कमी को महसूस करते रहेंगे, तब तक हम अपने आप में संतोष नहीं पा सकेंगे।
कटाक्ष के साथ एक व्यंग्य
ओशो की प्रवचन शैली में कटाक्ष और व्यंग्य का अपना ही मजा होता है। एक बार ओशो ने कहा था – "अगर बुद्धि इतनी महान होती, तो वह हमेशा अपने आप को पूरा महसूस करती। पर हाँ, बुद्धि का क्या भरोसा, वह तो हमेशा किसी न किसी कमी को ढूंढती रहती है, जैसे कोई बेचारा अपने आप में दीवार का एक टूटा हुआ हिस्सा ढूंढ रहा हो।" इस कटाक्ष में निहित है कि बुद्धि, जो हमें सोचने पर मजबूर करती है, अक्सर हमारे अंदर की संपूर्णता को नजरअंदाज कर देती है। हम उस कमी के पीछे भागते हैं, जबकि असल में हमारा अस्तित्व ही उस पूर्णता का प्रतीक है।
आंतरिक जिज्ञासा का दर्पण
जब हम अपनी बुद्धि की इस खोज को देखते हैं, तो हमें यह समझ में आता है कि यह खोज हमें एक गहरे आत्म-विश्लेषण की ओर ले जाती है। ओशो कहते हैं कि जब तक हम अपने भीतर झांकने का प्रयास नहीं करेंगे, तब तक हम इस अभाव के खेल से बाहर नहीं निकल पाएंगे। हर दिन हम अपने आप से पूछते हैं – "क्या मेरे पास वह सब कुछ है जो मुझे चाहिए?" लेकिन सवाल का जवाब हमारे भीतर ही छुपा होता है।
यह सच है कि हमारी बुद्धि हमेशा उस कमी को ढूंढती है जो हमारे बाहर के संसार में हमें दिखती है, लेकिन क्या यह उसी कमी की तलाश है जो वास्तव में मायने रखती है? जब हम अपने भीतर के उस अनंत समृद्धि के बारे में सोचते हैं, तो हमें एहसास होता है कि अभाव एक भ्रम है, और सच्ची खुशहाली वही है जो हमारी आत्मा में बसती है। यह आत्मज्ञान का मार्ग है, जहाँ हम अपने आप को समझते हैं और पहचानते हैं कि हम पूर्ण हैं।
कहानी एक साधु और उसके शिष्यों की
एक बार एक साधु ने अपने शिष्यों को बुलाया और कहा, "बुद्धि, मेरे प्यारे शिष्यों, हमेशा एक अधूरी कहानी कहती है। यह कभी भी उस पूर्ण कथा को नहीं सुनाती जो हमारे अंदर छुपी हुई है।" एक शिष्य ने सवाल किया, "गुरुदेव, क्या इसका मतलब यह है कि हमें अपनी बुद्धि से ऊपर उठकर देखना होगा?" साधु ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "हाँ, बेटा, तुम्हारी बुद्धि केवल एक साधन है – एक खिड़की है जो तुम्हें बाहरी दुनिया दिखाती है, परंतु असली चित्र तुम्हारे अंदर ही छुपा हुआ है।" इस कहानी से हमें यह सिखने को मिलता है कि बाहरी चीजों में हमारी नजरें भटक जाती हैं और हमारी बुद्धि हमेशा उन चीज़ों की तलाश में रहती है जिन्हें समाज ने महत्वपूर्ण बताया है, बजाय इसके कि हम अपनी आत्मा की सम्पूर्णता को पहचानें।
अहंकार और बुद्धि की यह दौड़
ओशो अक्सर कहते थे कि जब अहंकार बढ़ता है, तब हमारी बुद्धि और भी तीखी हो जाती है, क्योंकि अहंकार हमें एक गलत दिशा में ले जाता है। अहंकार की यह दौड़ हमें निरंतर असंतोष में डाल देती है। हम खुद को दूसरों से मापते हैं, अपनी कमियों पर ध्यान देते हैं, और फिर उस कमी की तलाश में पड़ जाते हैं जो हमें लगता है कि हमारे अंदर है। परंतु वास्तव में, जैसे एक कलाकार को पता होता है कि उसके पास वह रंगीन कूची है, वैसे ही हम में भी वह सम्पूर्णता है – बस हमें उसे पहचानने की ज़रूरत है।
ध्यान का मार्ग – जब बुद्धि से ऊपर उठें
ओशो का एक महत्वपूर्ण संदेश था – "ध्यान करो, ध्यान करो, क्योंकि ध्यान तुम्हें उस अनंत शांति तक ले जाएगा जहाँ बुद्धि की उस दौड़ का अंत हो जाता है।" जब हम ध्यान में लीन होते हैं, तो हम अपनी बुद्धि की उस अंधी खोज से ऊपर उठ जाते हैं। ध्यान एक ऐसी प्रक्रिया है जहाँ हम अपनी बुद्धि के हल्ले-गुल्ले को शांत करते हैं और अपने अंदर के उस शांत समंदर को महसूस करते हैं।
जब हम ध्यान में बैठते हैं, तो हमें यह अनुभव होता है कि वास्तव में कोई अभाव नहीं है – हर पल में पूर्णता है। ध्यान हमें यह सिखाता है कि हमारी बुद्धि, जो हमेशा कमी पर ध्यान देती है, उसे छोड़कर एक नई जागरूकता की ओर बढ़ना ही सच्ची मुक्ति है। इस अवस्था में, हम अपने अस्तित्व के उस अद्भुत सच को जान पाते हैं जो हमारी रोजमर्रा की भागदौड़ में छिपा रहता है।
व्यंग्य के रंग में एक और कहानी
एक बार ओशो ने एक आधुनिक विद्वान से कहा – "तुम्हारी बुद्धि तो ऐसे भाग रही है जैसे कोई भूतिया परीक्षा में भाग रहा हो, हर सवाल में कमी ढूंढता हुआ।" विद्वान ने जवाब दिया, "गुरुदेव, मेरी बुद्धि तो वही सही है जो मुझे बताती है कि मेरे अंदर कुछ कमी है, जिसे पूरा करना बाकी है।" ओशो ने तीखी हंसी में कहा, "क्या बात है! तुम तो उसी भ्रम में फंस गए हो। तुम्हें समझना होगा कि तुम्हारे अंदर की गहराई में सब कुछ पूरा है। उस कमी की तलाश में तुम अपना समय बरबाद कर रहे हो, जबकि उस कमी को भरने का कोई मायने ही नहीं है।" इस व्यंग्य में निहित है कि बाहरी उपलब्धियाँ और सामाजिक मान्यताएँ हमें भ्रमित कर देती हैं, और हमारी बुद्धि, जो असल में पूर्णता को पहचानने में सक्षम हो सकती है, वह केवल कमी की तलाश में ही लग जाती है।
अंतर्निहित पूर्णता का संदेश
अब यदि हम सच में आत्म-ज्ञान की ओर बढ़ना चाहते हैं, तो हमें अपनी बुद्धि की उस प्रवृत्ति से ऊपर उठकर अपने अंदर की सम्पूर्णता को महसूस करना होगा। ओशो ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि हमें अपनी आत्मा की उस अनंत गहराई को समझना चाहिए, जहाँ न कोई कमी है न कोई अभाव।
एक नदी की तरह, जो हर मोड़ पर अपनी धारा को बदल देती है, लेकिन अंततः वह महासागर में मिल जाती है – वैसे ही हमारी बुद्धि भी जब अपने भ्रम को त्याग देती है, तब हम अपने अंदर के उस महासागर से मिल जाते हैं। इस महासागर में हर क्षण, हर बूंद, अनंत समृद्धि के प्रतीक होती है।
जब हम इस सत्य को समझ जाते हैं, तब हमें एहसास होता है कि असली खुशी उस कमी की तलाश में नहीं, बल्कि उस कमी के पार जाकर अपने आप को समझने में है। हम अपने भीतर झाँकते हैं, तो पाते हैं कि वहाँ कोई अधूरापन नहीं है – वहाँ तो पूर्णता ही पूर्णता है। यही सच्ची मुक्ति है, यही असली ज्ञान है।
बुद्धि और प्रेम का संबंध
एक और पहलू जो हमें समझना चाहिए, वह है – बुद्धि और प्रेम का संबंध। अक्सर हम यह सोचते हैं कि बुद्धि हमें सब कुछ समझा देगी, लेकिन ओशो कहते हैं कि जब तक हमारे दिल में प्रेम नहीं होगा, हमारी बुद्धि केवल एक सूखी गणना बने रहेगी। प्रेम वह दिव्य अनुभूति है जो हमारी बुद्धि को उस भ्रम से बाहर निकालकर एक नई दिशा प्रदान करती है।
जब हम प्रेम से देखते हैं, तो हमें हर चीज़ में एक अनंत सुंदरता नजर आने लगती है। हमारी बुद्धि, जो कभी कमी पर ध्यान देती थी, अब उसे पहचानती है कि हर अनुभव, हर पल में जीवन की पूर्णता छिपी हुई है। यही प्रेम का जादू है – वह हमें उस पूर्णता का एहसास दिलाता है, जो हमारी बुद्धि की उस निरंतर खोज से परे है।
समापन में – अंतहीन यात्रा की ओर
तो अंत में यह कह सकते हैं कि "बुद्धि हमेशा अभाव को खोजती है" केवल एक सतही कथन नहीं है, बल्कि यह एक गहन दर्शन है। यह हमें बताता है कि हमारी सोच, हमारा दिमाग, हमेशा उस कमी की तलाश में लगा रहता है जिसे हम समाज द्वारा परिभाषित करते हैं – चाहे वह धन हो, प्रतिष्ठा हो या ज्ञान हो। परंतु जब हम उस कमी के मायाजाल से ऊपर उठ जाते हैं, तब हमें एहसास होता है कि हम पहले से ही पूर्ण हैं।
इस पूर्णता की अनुभूति के लिए हमें अपनी बुद्धि की सीमाओं को पहचानना होगा और उसे एक उपकरण की तरह प्रयोग करना होगा – न कि हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व को परिभाषित करने वाला साधन। हमें अपनी आत्मा के उस अनंत समृद्धि के संपर्क में आना होगा, जहाँ हर क्षण में जीवन का गहरा अर्थ छुपा हुआ है।
ओशो कहते हैं, "जब तुम अपने आप में झाँकते हो, तब तुम्हें सब कुछ मिलता है – हाँ, वो कमी भी, और वो पूर्णता भी।" इस प्रवचन में यही संदेश निहित है कि हमें अपनी बुद्धि की उस प्रवृत्ति को समझकर, उसे सीमित करके, एक नई जागरूकता की ओर बढ़ना होगा।
इस यात्रा में कभी-कभी कटाक्ष, व्यंग्य, और कहानियों का सहारा लेना पड़ता है – ताकि हम अपने भीतर के उस अंधेरे को उजागर कर सकें, जो हमारी बुद्धि ने बनाया है। जब हम उस अंधेरे को हंसते-हंसते स्वीकार लेते हैं, तब हमें अपने अंदर की प्रकाशमयी ऊर्जा का एहसास होता है।
आत्म-ज्ञान की ओर एक आमंत्रण
तो आइए, इस प्रवचन के अंत में एक नए दृष्टिकोण से खुद को देखें। अपनी बुद्धि को न केवल एक तर्कसंगत उपकरण मानें, बल्कि उसे एक ऐसे साथी के रूप में स्वीकार करें, जो आपको उस राह पर ले जाए जो आपके अंदर के सत्य से जुड़ी है। ओशो की यह शिक्षा हमें यही बताती है कि जब तक हम अपनी आत्मा की सुनने की क्षमता नहीं विकसित करेंगे, तब तक हमारी बुद्धि केवल एक अधूरी खोज में ही लगती रहेगी।
जब हम अपने अंदर झाँकते हैं, तो पाते हैं कि हमें हर उस चीज़ की तलाश करने की आवश्यकता नहीं है, जो बाहर हमें दिखती है। हमारी आत्मा में, उस गहरे शांति और पूर्णता में, सब कुछ पहले से ही मौजूद है। यही सच्चा ज्ञान है – जो बाहरी चीजों के भ्रम से ऊपर उठकर हमारे अंदर की दिव्यता को पहचान लेता है।
जीवन की निरंतर यात्रा
जीवन एक निरंतर यात्रा है, जहाँ हर मोड़ पर हमें नए-नए अनुभव मिलते हैं। हमारी बुद्धि, जो कभी भी उस कमी की तलाश में रहती है, हमें एक चुनौती देती है – कि हम अपनी आत्मा के उस अनंत स्रोत से जुड़ें। जब हम इस यात्रा पर निकलते हैं, तो हमें समझ में आता है कि हर अनुभव, चाहे वह कितना भी छोटा या बड़ा क्यों न हो, हमारे अंदर की उस पूर्णता का एक प्रतिबिंब है।
एक दिन ऐसा भी आएगा जब हम यह समझ जाएंगे कि हमारी बुद्धि केवल एक दरवाज़ा है – एक ऐसा दरवाज़ा जो हमें उस विशाल कमरे तक ले जाता है जहाँ से बाहर की कोई भी चीज़ मायने नहीं रखती। उस कमरे में, केवल एक ही चीज़ है – शांति, प्रेम, और अनंत चेतना।
ज्ञान और हास्य की अनूठी कड़ियाँ
ओशो की शैली में एक और महत्वपूर्ण पहलू है – हास्य। हास्य हमारी बुद्धि की उस कठोरता को तोड़ने का एक उपाय है। जब हम हँसते हैं, तो हमारी सोच में हल्कापन आता है, और हम अपने अंदर के उस अंधकार को भी हँसी में उड़ा देते हैं। एक बार ओशो ने कहा था – "हास्य वह औषधि है जो तुम्हारी बुद्धि को उसके बंधनों से मुक्त कर देती है।"
जब हम हास्य के माध्यम से अपने आप को देखते हैं, तो हमें एहसास होता है कि यह पूरी दुनिया एक मजाक है – एक ऐसा मजाक, जिसे हमने अपने अहंकार और कमी की खोज में गंभीरता से ले लिया है। हँसी हमें याद दिलाती है कि हम कितने विशाल और अनंत हैं, और हमारी बुद्धि की उस तीखी खोज में कहीं भी कमी नहीं है।
अंत में – अपने आप से एक संवाद
प्रिय मित्रों, जब हम इस प्रवचन की ओर देखते हैं, तो एक बात स्पष्ट हो जाती है – हमारी बुद्धि हमेशा अभाव को खोजती है, लेकिन वह अभाव केवल एक भ्रम है। असली सुकून, असली ज्ञान, उसी पल में छिपा है जब हम अपने आप से एक सच्चा संवाद स्थापित करते हैं। अपने अंदर झांकिए, उस गहरी शांति को पहचानिए, और देखिए कि आपकी बुद्धि की उस अधूरी खोज के पार एक अनंत सम्पूर्णता मौजूद है।
इसलिए, अगली बार जब भी आपकी बुद्धि कुछ कमी ढूंढे, तो एक पल रुकिए, मुस्कुराइए, और अपने आप से पूछिए – "क्या वास्तव में मुझे उस कमी की आवश्यकता है, या क्या मैं पहले से ही सम्पूर्ण हूँ?" इस सवाल का जवाब ढूंढने में ही जीवन का असली स्वाद है।
हर पल एक नई सीख है, हर सांस में एक नया अनुभव छुपा है। ओशो हमें यही कहते हैं – "जीवन को समझने के लिए बाहर नहीं, अपने भीतर झाँकना आवश्यक है।" और यही ज्ञान, यही शांति, हमें उस असली मुक्ति की ओर ले जाती है जिसे हम ढूंढते रहते हैं।
इस प्रवचन में हमने देखा कि कैसे हमारी बुद्धि एक निरंतर अभाव की तलाश में रहती है, लेकिन वास्तव में, उस अभाव को स्वीकार करना ही हमें हमारे भीतर की सम्पूर्णता की ओर ले जाता है। जब हम उस कमी की खोज में लगे रहते हैं, तो हम अनजाने में अपनी आत्मा से दूर हो जाते हैं। लेकिन जब हम उस कमी को पहचान कर उसे छोड़ देते हैं, तभी हम वास्तव में अपने अस्तित्व का सत्य समझ पाते हैं।
इस प्रवचन का मूल संदेश यही है कि हमारी बुद्धि की उस अनंत खोज से ऊपर उठकर, हमें अपने भीतर के अनंत प्रेम, शांति और पूर्णता को समझना होगा। यह समझ हमें बताती है कि असली मुक्ति, असली ज्ञान, बाहरी चीज़ों में नहीं, बल्कि हमारे अपने अंदर ही छिपा हुआ है।
तो चलिए, इस ज्ञान के मार्ग पर चलें, अपनी बुद्धि की उस तीखी खोज को समझें, और अपने आप को वह अनंत सम्पूर्णता दें जो हमेशा से हमारे भीतर थी। यही है ओशो का संदेश, यही है हमारी सच्ची मुक्ति।
यह प्रवचन उस अनंत यात्रा की कहानी है, जहाँ हर बूंद, हर क्षण, हमें हमारी आत्मा की सम्पूर्णता का अहसास कराता है। जब हम अपनी बुद्धि को उस अभाव की खोज से मुक्त कर, अपने अंदर झांकते हैं, तभी हमें पता चलता है कि हर कमी में भी एक अनंत सुंदरता छुपी होती है – एक ऐसी सुंदरता, जिसे केवल प्रेम, ध्यान, और आत्म-ज्ञान के माध्यम से महसूस किया जा सकता है।
और अंततः, यही सोच हमें प्रेरित करती है कि हम अपने भीतर की उस अदम्य ऊर्जा को पहचानें, और उसे वह रास्ता दें जो हमें सच्ची खुशी, सच्चा ज्ञान, और सच्ची मुक्ति की ओर ले जाए। इसीलिए, मेरे प्रिय मित्रों, जब भी आपकी बुद्धि उस कमी को ढूंढे, तो याद रखिए – आपकी सम्पूर्णता पहले से ही आपके भीतर विद्यमान है।
जीवन की इस अनंत यात्रा में, चलिए हम अपनी बुद्धि की सीमाओं को पार करते हुए उस अनंत प्रेम और शांति को अपनाएं, जो हमारी आत्मा में बसती है। यही है सच्चा ज्ञान, यही है ओशो की सच्ची शिक्षाएं, और यही है हमारे अस्तित्व का असली सार।
इस प्रकार, "बुद्धि हमेशा अभाव को खोजती है" का अर्थ यह भी है कि जब तक हम अपनी आंतरिक सम्पूर्णता को नहीं पहचानते, तब तक हम केवल एक अधूरी यात्रा पर ही चलेंगे। परंतु जब हम अपने अंदर की उस अनंत सम्पूर्णता को समझ लेते हैं, तब हमारी बुद्धि भी एक नई दिशा में बदल जाती है – वह अब केवल उस कमी की खोज नहीं करती, बल्कि हर उस क्षण में पूर्णता को महसूस करती है जो हमारे जीवन में विद्यमान है।
आइए, इस संदेश को अपने हृदय में समाहित करें, और अपनी बुद्धि की उस सीमित सोच को त्यागकर, एक नई, व्यापक और प्रेममयी दृष्टि से जीवन को देखें। यही है वह अनंत सत्य, जिसे ओशो ने अपने प्रवचनों में बार-बार उजागर किया है – कि असली ज्ञान, असली मुक्ति, हमारे भीतर ही छिपी है, और उसे प्राप्त करने के लिए हमें बस अपने आप में झाँकना होगा।
इस प्रवचन के माध्यम से, हम यह सीखते हैं कि हमारी बुद्धि की वह लगातार चलने वाली खोज हमें कभी भी संतोष नहीं दे सकती, जब तक हम अपनी आत्मा की उस अनंत पूर्णता को पहचान नहीं लेते। यही संदेश है – कि असली जीवन, असली खुशी, और असली मुक्ति, बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि हमारे अंदर की गहराई में निहित है।
तो मेरे प्रिय, अगली बार जब भी तुम्हारी बुद्धि कुछ कमी ढूंढे, तो एक गहरी साँस लो, शांत हो जाओ और अपने आप से कहो – "मैं पूर्ण हूँ, मैं सम्पूर्ण हूँ।" यही वह क्षण है, जब तुम्हें सच्ची मुक्ति का अहसास होगा, और तुम्हारी बुद्धि भी उस अनंत प्रेम के प्रकाश में खिल उठेगी।
ओशो कहते हैं – "जो स्वयं को समझ लेता है, वह संसार को समझ लेता है।" तो चलिए, अपनी बुद्धि की उस अंधेरी गलियों से निकलकर, अपने भीतर के उजाले की ओर बढ़ें, जहाँ हर क्षण में जीवन की अनंतता निहित है। यही है वह मार्ग, यही है वह सच्चा ज्ञान, और यही है हमारी असली मुक्ति।
यह प्रवचन एक निमंत्रण है – एक निमंत्रण उस आत्म-ज्ञान की ओर, जो हमारे भीतर सदैव विद्यमान है। अपने आप को जानिए, अपनी आत्मा को पहचानिए, और उस अनंत प्रेम में विलीन हो जाइए, जो हमारी बुद्धि की उस अधूरी खोज से कहीं ऊपर है। यही है ओशो का संदेश, यही है हमारा सत्य, और यही है जीवन का असली अर्थ।
इस प्रकार, "बुद्धि हमेशा अभाव को खोजती है" हमें यह बताती है कि जब तक हम बाहरी चीज़ों में कमी देखेंगे, तब तक हम अपनी आत्मा की उस पूर्णता को महसूस नहीं कर पाएंगे। हमारी बुद्धि, जो हमेशा अभाव पर ध्यान देती है, उसे छोड़कर अगर हम अपने भीतर झाँकें, तो हमें वह सम्पूर्णता मिलेगी जिसे हमने वर्षों से खोजा है।
तो मित्रों, इस प्रवचन का सार यह है – अपनी बुद्धि की उस सीमित सोच को त्याग कर, अपने अंदर के अनंत प्रेम, शांति और ज्ञान को अपनाइए। यही है वह मार्ग, जिस पर चलकर हम सच्चे मुक्ति की ओर अग्रसर होते हैं, और यही है ओशो की सच्ची शिक्षाओं का सार।
आशा है कि इस प्रवचन ने आपके मन में एक नई जागरूकता की किरण जगाई होगी, और आपकी बुद्धि अब केवल अभाव की तलाश में नहीं, बल्कि उस अनंत सम्पूर्णता को पहचानने में लग जाएगी जो आप में पहले से ही विद्यमान है। धन्यवाद!
एक बार फिर कहें – "मैं पूर्ण हूँ, मैं सम्पूर्ण हूँ।" यही सच्चा ज्ञान है, यही सच्ची मुक्ति का मार्ग है।
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