प्रिय मित्रों,  

आज हम एक ऐसे विषय पर चर्चा करने जा रहे हैं, जिसे समझना उतना ही आवश्यक है जितना कि सांस लेना – अहंकार। आप में से कई लोग यह मानते हैं कि अहंकार का अर्थ केवल यह है कि “मेरी कोई चर्चा करे, मुझे कोई जाने, मुझे कोई पहचाने।” परंतु यदि हम गहराई में उतरें, तो समझेंगे कि अहंकार का जन्म हमारे अंदर के एक सूक्ष्म परंतु अत्यंत प्रभावशाली बंधन से होता है, जो हमें असली स्वयं से दूर कर देता है।

1. अहंकार की परिभाषा और उसकी जड़ें

अहंकार, जैसा कि आप स्वयं महसूस करते हैं, एक ऐसी परत है जो आपकी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को छिपाती है। यह केवल एक नकाब नहीं, बल्कि एक अस्तित्व का भ्रम है, जिसे हमने समाज, परवरिश, शिक्षा, और अपने अनुभवों से सीखा है। बचपन से ही हमसे कहा जाता है कि “मैं खास हूँ”, “मैं कुछ हूँ”, “मेरी पहचान है”, और इसी प्रक्रिया में अहंकार धीरे-धीरे हमारे अंदर जन्म ले लेता है। यह अहंकार हमें एक स्थायी पहचान देता है, लेकिन वही पहचान हमें वास्तविकता से भी दूर कर देती है।

इस नकाब के पीछे छिपा हुआ वह सच्चा स्वयं है, जो असीम, अनंत, और अज्ञात है। जब हम कहते हैं “मैं हूं, मैं कुछ हूं”, तो वास्तव में हम उस आत्मा को भूल जाते हैं, जो अनंत प्रेम, शांति और आनंद से भरी हुई है। अहंकार हमें इस अनंत सत्य से दूर कर देता है, क्योंकि यह हमें सिर्फ उस सीमित ‘मैं’ तक सीमित कर देता है।

2. अहंकार: समाज की कहानियों का एक प्रतिबिम्ब

समाज में हर किसी को एक भूमिका निभानी पड़ती है। माता-पिता, शिक्षक, दोस्तों, यहाँ तक कि समाज स्वयं हमें एक निश्चित पहचान देने की कोशिश करता है – एक नाम, एक पेशा, एक जाति, एक धर्म। इस प्रक्रिया में हम अपने अंदर के अनंत स्वभाव को सीमित आंकड़ों, परिभाषाओं और कहानियों में बाँध लेते हैं। यही वह जगह है जहाँ अहंकार का बीज बोया जाता है।

ओशो कहते हैं कि अहंकार एक सामाजिक कन्ज़्यूमर है, जो हमें हर रोज़, हर पल, एक नई कहानी सुनाता है। यह कहानी हमें यह विश्वास दिलाती है कि हमारी पहचान उन बाहरी चीज़ों में निहित है – जैसे कि हमारी नौकरी, हमारी दौलत, हमारी शान या हमारी प्रतिष्ठा। परंतु मित्रों, यह सब एक भ्रम है। असल में, जब हम स्वयं से पूछते हैं “मैं कौन हूँ?” तो हमें वह उत्तर नहीं मिलता, जिसे समाज हमें सुनाना चाहता है। ओशो का मानना था कि अहंकार हमें एक ऐसे गोलबंदी में फँसा देता है, जहाँ हम अपनी वास्तविकता का पता ही नहीं लगा पाते।

3. अहंकार का प्रभाव: आत्मा की उड़ान में रुकावट

जब अहंकार अपने पूर्ण रूप में प्रकट होता है, तो यह हमारे जीवन के हर पहलू को प्रभावित करता है। यह न केवल हमारे व्यक्तिगत रिश्तों को प्रभावित करता है, बल्कि हमारे कार्य, सोच और सम्पूर्ण जीवन शैली पर भी असर डालता है। आप सोचिए, यदि हम हमेशा यह सोचते रहें कि “मैं खास हूँ, मैं कुछ हूँ”, तो क्या हम अपने अंदर की उस शुद्धता और अनंतता को समझ पाते हैं जो वास्तव में हमारे अंदर है?

अहंकार हमें सीमाओं में बाँध देता है। यह हमें अपने आप में ही खो जाने के लिए मजबूर कर देता है। हम अपने आप को एक ऐसी सीमा तक सीमित कर लेते हैं, जहाँ हम अपने संभावनाओं का विस्तार करना भूल जाते हैं। ओशो ने बताया कि जब तक हम इस सीमित अहंकार के जाल में उलझे रहेंगे, तब तक हम उस अनंत चेतना का अनुभव नहीं कर सकते, जो हमारे अंदर छिपी हुई है। यह चेतना है – वह शुद्ध, असीम और अनंत स्रोत, जो हर व्यक्ति में विद्यमान है, परंतु अहंकार की परत के कारण दिखाई नहीं देती।

4. अहंकार और प्रेम: दो विपरीत ध्रुव

अहंकार और प्रेम दो ऐसे ध्रुव हैं, जो एक-दूसरे से विपरीत होते हुए भी अंतर्निहित रूप से जुड़े हुए हैं। जब हम प्रेम की बात करते हैं, तो ओशो कहते हैं कि प्रेम वह ऊर्जा है, जो सब कुछ जोड़ती है। प्रेम में कोई ‘मैं’ नहीं होता, केवल एक सामूहिक चेतना होती है, जो सभी को एक साथ बाँध लेती है। परंतु जब अहंकार की दीवार खड़ी हो जाती है, तो प्रेम उस दीवार को तोड़ नहीं पाता।

आपके जीवन में कई बार ऐसा अनुभव होगा, जब आपने महसूस किया होगा कि किसी व्यक्ति के प्रति आपका प्रेम तभी गहरा होता है, जब आप उसे अपने अहंकार के आइने में देखते हैं। आप उस व्यक्ति से प्रेम करते हैं, क्योंकि वह आपकी पहचान को मजबूत करता है, आपकी महत्ता को बढ़ाता है। यह प्रेम का एक विकृत रूप है, जहाँ प्रेम केवल एक प्रतिबिंब है, अहंकार के प्रतिबिंब का। ओशो ने इस बात पर जोर दिया कि असली प्रेम तब होता है, जब हम अपने अंदर से उस ‘मैं’ को मिटा देते हैं और एक अनंत, निर्विकल्प प्रेम का अनुभव करते हैं। यह प्रेम बिना किसी अपेक्षा के होता है, बिना किसी मुकाबले के होता है।

5. अहंकार की उत्पत्ति: बचपन से लेकर वयस्कता तक

हमारा अहंकार बचपन से ही अंकुरित हो जाता है। उस समय हमारे माता-पिता, शिक्षक और समाज हमें यह सिखाते हैं कि “तुम्हें अच्छे बनना है”, “तुम्हें श्रेष्ठ बनना है”, “तुम्हें पहचाना जाना है।” इन बातों के बीच, हम एक ऐसी पहचान विकसित करते हैं, जो बाहरी मान्यताओं पर आधारित होती है। यह पहचान धीरे-धीरे हमारे अंदर गूंजती रहती है, और जब हम वयस्कता में प्रवेश करते हैं, तो यह एक जड़ की तरह हमारे जीवन के मूल में बैठ जाती है।

अहंकार का यह जन्मस्थान इतना सूक्ष्म है कि अक्सर हम इसे पहचान ही नहीं पाते। परंतु जब हम ध्यान करते हैं, जब हम अपनी आत्मा की गहराई में उतरते हैं, तो हमें पता चलता है कि यह अहंकार हमारे वास्तविक स्वरूप से कितना दूर कर चुका है। ओशो कहते हैं कि जब तक हम अपने बचपन की उस माया में उलझे रहेंगे, तब तक हम उस अनंत चेतना का अनुभव नहीं कर सकते, जो हमारे अंदर छिपी हुई है।

6. अहंकार के कारण और नतीजे

जब अहंकार हमारे जीवन में हावी हो जाता है, तो उसके नतीजे भी अद्भुत और कभी-कभी दर्दनाक हो सकते हैं। यह न केवल हमारे व्यक्तिगत संबंधों में दरारें डालता है, बल्कि हमारे मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। अहंकार हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि हम अकेले हैं, कि हमारी पहचान केवल बाहरी मान्यताओं में ही निहित है। परिणामस्वरूप, हम हमेशा एक तरह की आंतरिक बेचैनी और असंतोष का अनुभव करते हैं।

इस बेचैनी का मुख्य कारण यह है कि हम अपनी वास्तविकता से कट चुके होते हैं। हम अपने अंदर छिपी हुई उस शुद्ध चेतना को भूल चुके होते हैं, जिसे हम वास्तव में अनुभव कर सकते थे। ओशो कहते हैं कि जब अहंकार अपने चरम पर होता है, तो मनुष्य में एक अजीब सी खालीपन की अनुभूति होती है, जो उसे निरंतर कुछ पाने की लालसा में रखती है। यह लालसा कभी संतुष्टि नहीं देती, क्योंकि यह केवल बाहरी वस्तुओं, मान्यताओं और पहचान पर निर्भर करती है।

7. ध्यान और अहंकार: एक परस्पर विरोधी संगम

ओशो का यह मानना था कि ध्यान का असली उद्देश्य अहंकार की परतों को छांटकर उस अनंत स्वभाव तक पहुँचना है, जो हमारे अंदर विद्यमान है। ध्यान एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें हम अपने अंदर झांकते हैं, अपनी सीमाओं को पहचानते हैं और फिर धीरे-धीरे उन सीमाओं को तोड़ते हैं। जब हम ध्यान करते हैं, तो हम अहंकार की उन परतों को धीरे-धीरे हटा देते हैं, जो हमारे वास्तविक स्वरूप को छिपा लेती हैं।

ध्यान का अभ्यास करते समय, हमें यह समझना आवश्यक है कि यह कोई तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। ध्यान एक कला है, एक जीवन शैली है। यह हमें उस चेतना के साथ जोड़ता है, जो अनंत, शुद्ध और अचल है। ओशो ने ध्यान को एक ऐसी शक्ति के रूप में देखा, जो हमारे अंदर के अहंकार को विघटित कर सकती है। जब हम ध्यान में पूरी तरह से डूब जाते हैं, तो हमें वह अनुभूति होती है कि हमारा कोई ‘मैं’ नहीं है – केवल एक अनंत और अखंड चेतना है, जिसमें हम और आप, दोनों एक ही स्वरूप में विलीन हो जाते हैं।

8. अहंकार से मुक्ति का मार्ग

अहंकार से मुक्ति पाने के लिए सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि अहंकार केवल एक आंतरिक स्थिति है, जिसे हम बदल सकते हैं। हमें अपने भीतर झाँकना होगा, अपने डर, अपनी इच्छाओं, अपनी अपेक्षाओं को समझना होगा। ओशो का कहना था कि जब हम अपने अंदर के उस नकाब को हटाने का साहस करते हैं, तो हम स्वयं को एक अनंत अनुभव से जोड़ लेते हैं। यह अनुभव वह है, जो हमें बाहरी दुनिया की हर बात से परे ले जाता है, जहाँ हम केवल एक अनुभवकर्ता बन जाते हैं, न कि एक आडंबर में उलझा हुआ व्यक्ति।

इस मुक्ति के मार्ग में सबसे महत्वपूर्ण कदम है – स्वीकृति। हमें अपने अंदर की सीमाओं, अपने भय, अपनी कमजोरियों को पूरी तरह स्वीकार करना होगा। केवल तभी हम इन पर मात पा सकते हैं। जब हम स्वीकृति के साथ देखते हैं कि हम कौन हैं और हम क्या नहीं हैं, तो अहंकार की दीवार अपने आप ढह जाती है। ओशो कहते हैं कि यह स्वीकृति एक ऐसी विद्या है, जो हमें हमारे सच्चे स्वरूप की ओर ले जाती है।

एक और महत्वपूर्ण बिंदु है – प्रेम का अभ्यास। प्रेम, जैसा कि हमने पहले भी चर्चा की, वह अहंकार की दीवारों को तोड़ने की अद्भुत शक्ति रखता है। जब हम बिना किसी अपेक्षा के प्रेम करते हैं, तो हम उस अहंकार से परे जाकर उस अनंत प्रेम का अनुभव करते हैं, जो हमारे अंदर छिपा हुआ है। यह प्रेम हमें बताता है कि हमारी पहचान केवल बाहरी मान्यताओं में नहीं है, बल्कि वह अनंत चेतना में निहित है, जो हम सब में समान रूप से विद्यमान है।

9. अहंकार के मिथक और भ्रम

अहंकार को समझने के लिए यह भी जरूरी है कि हम उस पर बनी हुई मिथकों और भ्रमों को तोड़ें। अक्सर हम सुनते हैं कि “मैं कुछ हूँ, इसलिए मैं खास हूँ” – यह एक प्रकार का भ्रम है, जो हमें एक नकली पहचान देता है। यह पहचान हमें न केवल अस्थिर बनाती है, बल्कि हमें अपने वास्तविक स्वरूप से भी दूर कर देती है। ओशो कहते हैं कि इस भ्रम के पीछे छुपा हुआ डर है – डर कि कहीं अगर हम अपनी सीमाओं से बाहर न निकल पाएँ, तो हम खो जाएंगे।

यह भय, यह डर हमें हमेशा कुछ पाने की चढ़ाई पर रखता है। हम निरंतर प्रतिस्पर्धा में उलझे रहते हैं, दूसरों से श्रेष्ठता साबित करने की कोशिश करते रहते हैं। लेकिन क्या हमें यह समझना नहीं चाहिए कि वास्तविकता में हम सभी समान हैं? हमारा सच्चा स्वरूप वही है, जो अनंत और अपरिवर्तनीय है। जब हम इस बात को समझ लेते हैं, तो हमें अपने अहंकार की झंझटों से मुक्ति मिल जाती है।

10. ओशो का दृष्टिकोण: अहंकार और जीवन का समग्र स्वरूप

ओशो ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि जीवन एक खेल है, एक नृत्य है, जिसमें अहंकार केवल एक झूठी धुन है। यदि हम इस धुन पर थिरकते रहते हैं, तो हम उस अनंत संगीत को सुनने में असमर्थ हो जाते हैं, जो हमारे अंदर छिपा है। ओशो कहते हैं कि जब हम अपने अंदर की शांति, उस गहरी मौन की ओर लौटते हैं, तो हमें अहंकार की सारी आड़ें गिरते हुए दिखाई देती हैं।

उनका कहना था कि अहंकार केवल एक भ्रम है, एक परछाई है जो हमारे अस्तित्व को सीमित कर देती है। असल में, हम सभी एक ही अनंत ऊर्जा के अंश हैं, और यही ऊर्जा हमें जोड़ती है। जब हम इस एकता को समझते हैं, तो हमें अपने भीतर की सीमाओं का एहसास नहीं होता। हम एक होकर जीवन को महसूस करते हैं, बिना किसी ‘मैं’ के, बिना किसी अलगाव के। इस तरह की अनुभूति में अहंकार की कोई जगह नहीं रह जाती।

11. ध्यान का अनुभव: अहंकार के परे जाना

ध्यान का अभ्यास, जैसा कि ओशो ने बताया, एक ऐसी क्रिया है जो हमें हमारे अंदर की गहराई से जोड़ती है। जब हम ध्यान में पूरी तरह डूब जाते हैं, तो हम महसूस करते हैं कि यहाँ कोई ‘मैं’ नहीं है, न कोई अहंकार की दीवारें हैं। यह अनुभव उस अनंत चेतना का होता है, जो हमेशा से हमारे अंदर विद्यमान रही है, परंतु अहंकार की आड़ में छिपी हुई थी। ध्यान हमें यह एहसास दिलाता है कि हमारी पहचान बाहरी वस्तुओं, उपाधियों और कहानियों में नहीं, बल्कि उस शुद्ध, असीम चेतना में निहित है।

इस ध्यान की प्रक्रिया में, हम धीरे-धीरे अपने अंदर के उस ‘मेरा’ को भूल जाते हैं, जो अहंकार की परछाई में जकड़ा हुआ है। हम उस समय को अनुभव करते हैं, जब हम किसी भी सामाजिक, आर्थिक या मानसिक बंधन से परे होते हैं। ओशो कहते हैं कि इस अवस्था में, हम वास्तव में देख पाते हैं कि हमारी आत्मा कितनी विशाल, कितनी असीम है। यह अनुभव एक ऐसी मुक्ति है, जहाँ अहंकार के सारे झूठे भ्रम गायब हो जाते हैं, और हमारे अंदर केवल एक अनंत, शुद्ध चेतना बच जाती है।

12. अहंकार के साथ जीना या उससे मुक्त होना?

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न जो अक्सर उठता है, वह यह है कि क्या हमें अपने अहंकार से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए, या फिर उसे एक साथी के रूप में स्वीकार करना चाहिए? ओशो कहते हैं कि अहंकार से मुक्ति का अर्थ यह नहीं कि हम उस पहलू को नकार दें, बल्कि यह समझना है कि वह केवल एक हिस्सा है, न कि सम्पूर्णता। जब हम अपने अहंकार को समझ लेते हैं, तो हम उसे एक जीवंत अनुभूति के रूप में देखते हैं, जो हमारे विकास का एक चरण है। 

हमारे जीवन में, अहंकार का एक निश्चित स्थान है – यह हमें उस पहचान का अहसास कराता है, जो समाज ने हमें सिखाई है। लेकिन जब हम उस पहचान में इतने उलझ जाते हैं कि हमारी आत्मा की आवाज दब जाती है, तब हमें समझना चाहिए कि यह अहंकार केवल एक आड़ है। ओशो ने कहा कि हमें अपने अहंकार को समझना होगा, उसे देखना होगा, और फिर धीरे-धीरे उससे पार पा जाना होगा, ताकि हम अपने अंदर के अनंत स्वरूप को प्रकट कर सकें।

13. अहंकार के प्रति जागरूकता: एक आंतरिक क्रांति

अहंकार की जड़ में छिपी हुई सबसे बड़ी बाधा है – जागरूकता का अभाव। जब तक हम अपने अहंकार की वास्तविक प्रकृति को नहीं समझते, तब तक हम हमेशा उस भ्रम में फंसे रहेंगे कि हम ‘कुछ’ हैं। इस भ्रम में डूबकर हम अपने आप को सीमित कर लेते हैं, अपने असली स्वरूप को भूल जाते हैं। ओशो का मानना था कि जागरूकता वह चाबी है, जो इन बंदिशों को खोल सकती है। 

जागरूकता का अर्थ है – अपने अंदर की उस आवाज़ को सुनना, जो कहती है कि “मैं अनंत हूँ, मैं शुद्ध हूँ, मैं असीम हूँ।” जब हम इस आवाज़ को सुनते हैं, तो हमें अहंकार की वह परत झिलमिलाती हुई दिखने लगती है, जो हमें एक सीमित ‘मैं’ में बाँध रखती थी। यह जागरूकता हमें उस अद्भुत सत्य से जोड़ देती है, जो हमारे अंदर विद्यमान है। हम महसूस करते हैं कि जीवन का असली सार बाहरी मान्यताओं में नहीं, बल्कि उस अनंत चेतना में है, जो हम सब के अंदर समान रूप से मौजूद है।

14. आंतरिक क्रांति और परिवर्तन की लहर

जब हम अपने अहंकार की जड़ों को समझ लेते हैं, तो एक आंतरिक क्रांति की लहर उठने लगती है। यह क्रांति हमारे सोचने के तरीके, हमारे देखने के दृष्टिकोण और हमारे जीने के तरीके में परिवर्तन लाती है। हम धीरे-धीरे इस भ्रम से बाहर निकलते हैं, जहाँ हम अपने आप को केवल एक ‘मैं’ के रूप में देखते थे, और उस अनंत चेतना के साथ जुड़ जाते हैं, जो हमें सब कुछ प्रदान करती है।

ओशो कहते हैं कि यह परिवर्तन एक ऐसी यात्रा है, जिसमें हर कदम पर हमें अपने आप से, अपने अस्तित्व से और अपने परम सत्य से एक गहरी पहचान होती है। यह यात्रा कभी भी सरल नहीं होती, क्योंकि इसमें पुराने बंधनों को तोड़ना पड़ता है, पुराने भ्रमों को छोड़ना पड़ता है। परंतु जब हम इस परिवर्तन को स्वीकार कर लेते हैं, तो हम अपने अंदर की वह अनंत ऊर्जा जागृत कर लेते हैं, जो हमें जीवन के हर क्षण में पूर्णता का अनुभव कराती है।

15. अहंकार और कला: जीवन में सुंदरता की खोज

जब हम अहंकार के बारे में बात करते हैं, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि यह कभी-कभी हमारी रचनात्मकता और कला की क्षमता में भी बाधा डालता है। क्योंकि जब हम केवल “मैं हूं, मैं कुछ हूं” की सीमित सोच में फंस जाते हैं, तो हमारी रचनात्मक ऊर्जा उस अहंकार के ढांचे में बंद हो जाती है। ओशो का मानना था कि असली कला वही है, जो हमारे अंदर की अनंत ऊर्जा को अभिव्यक्त करती है – वह कला जो किसी बाहरी मान्यता या पहचान पर निर्भर न हो, बल्कि स्वयं की गहराई से उत्पन्न हो।

जब हम अपने अंदर के उस अहंकार को त्याग देते हैं, तो हमारी रचनात्मकता को भी पंख मिल जाते हैं। हम देखते हैं कि कला भी एक प्रकार का ध्यान है – एक ऐसी क्रिया जो हमें हमारे अंदर के उस अनंत स्रोत से जोड़ती है। यह कला हमें बताती है कि हमारे अंदर की सुंदरता कहीं भी सीमित नहीं है। यह संदेश देता है कि जीवन में असली सुंदरता उस अनंत चेतना में है, जो अहंकार की जाल से परे है।

16. सामाजिक संवाद में अहंकार का परिदृश्य

अहंकार का प्रभाव केवल आंतरिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। समाज में हम सभी एक निश्चित ‘रोल’ निभाते हैं – एक नाम, एक पहचान, एक उपाधि। यह भूमिका हमें वह अहंकार देती है, जिसके कारण हम अपने आप को दूसरों से अलग और श्रेष्ठ समझते हैं। ओशो कहते हैं कि यह विभाजन, यह दूरी ही हमारे सामाजिक संवाद का असली मूल है।

जब हम एक-दूसरे को केवल अपने अहंकार के प्रतिबिंब के रूप में देखने लगते हैं, तो हम उस गहरी एकता को भूल जाते हैं, जो हम सभी में विद्यमान है। यह एकता वह है, जो हमें बताती है कि हम सभी एक ही चेतना के अंश हैं। यदि हम इस एकता को समझें, तो हम अपने बीच की सीमाओं को तोड़ सकते हैं, हम अपने आप को एक बड़े सामूहिक अनुभव में परिवर्तित कर सकते हैं।

17. अहंकार पर विजय: एक आध्यात्मिक अनुभव

अंततः, अहंकार पर विजय प्राप्त करना ही हमारी आध्यात्मिक यात्रा का असली लक्ष्य है। यह विजय किसी बाहरी उपलब्धि में नहीं, बल्कि हमारे अंदर की उस अनंत चेतना में है, जो अहंकार के प्रतिबंधों से परे है। ओशो कहते हैं कि जब हम अपने अंदर की उस अनंत शांति, उस मौन और उस पूर्णता का अनुभव करते हैं, तो हमें अहंकार के सारे भ्रम धुंधले लगने लगते हैं।

यह अनुभव केवल तभी संभव है, जब हम अपने आप को पूरी तरह से खोल देते हैं – अपने भय, अपनी अपेक्षाओं, अपनी आड़ों को त्याग कर। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारी असली पहचान बाहरी उपाधियों में नहीं, बल्कि उस अनंत चेतना में है, जो हर पल हमारे साथ होती है। इस अनुभव में, हम समझते हैं कि हम केवल एक सीमित ‘मैं’ नहीं हैं, बल्कि एक विशाल, अनंत अनुभव हैं, जो सभी के साथ विलीन हो जाता है।

18. अंतर्निहित संदेश: जीवन का वास्तविक स्वरूप

प्रिय साथियों, इस प्रवचन का अंत नहीं, बल्कि एक नए आरंभ का संकेत है। अहंकार हमें एक भ्रमित पहचान दे सकता है, लेकिन जब हम अपनी आत्मा की गहराई में उतरते हैं, तो हमें वहाँ एक अनंत, शुद्ध और असीम चेतना मिलती है। ओशो कहते हैं कि जीवन का असली सार वही है – उस अनंत अनुभव में, जहाँ कोई ‘मैं’ नहीं, केवल एकता होती है।

इसलिए, अपने अंदर झांकिए, अपने अहंकार की परतों को धीरे-धीरे हटाइए, और उस अनंत चेतना का स्वागत कीजिए, जो आपके भीतर विद्यमान है। यह वह अनमोल खजाना है, जिसे पाने के लिए आपको बाहरी संसार में किसी मान्यता की तलाश नहीं करनी पड़ेगी, क्योंकि वह खजाना पहले से ही आपके अंदर मौजूद है। यही है जीवन का सत्य – एक ऐसा सत्य जो किसी भी बाहरी प्रमाण या मान्यता से परे है।

19. ध्यान, साधना और अहंकार से परे

अहंकार से मुक्ति पाने का एक और महत्वपूर्ण आयाम है – नियमित ध्यान और साधना। जब हम प्रतिदिन कुछ पल के लिए भी ध्यान में बैठते हैं, तो हम अपने अंदर की उस आवाज़ को सुन पाते हैं, जो हमें बताती है कि “आपमें अनंत क्षमता है।” यह क्षमता तभी उजागर होती है, जब हम अहंकार के उस भ्रम को त्याग देते हैं। ओशो ने ध्यान को एक ऐसी विद्या कहा, जो न केवल मन को शांत करती है, बल्कि आत्मा की उस अनंत उर्जा को भी जगाती है, जो हमारे अंदर छिपी हुई है।

ध्यान के दौरान, हमें केवल अपने सांसों, अपने मौन, और अपने हृदय की धड़कन पर ध्यान देना होता है। धीरे-धीरे, जब हम इस ध्यान में गहराई तक उतरते हैं, तो हमें अहंकार की वह सारी परतें हटते हुए दिखाई देती हैं। हमें महसूस होता है कि बाहरी दुनिया की सभी धारणाएं – नाम, उपाधि, पहचान – सब कुछ नष्ट हो जाते हैं, और हम केवल उस अनंत, शुद्ध चेतना में विलीन हो जाते हैं, जो वास्तव में हमारा अस्तित्व है।

20. जीवन में परिवर्तन का आह्वान

जब हम अपने अंदर के अहंकार को समझते हैं और उससे ऊपर उठने का प्रयास करते हैं, तो हम देखते हैं कि जीवन में परिवर्तन की एक नई लहर दौड़ जाती है। यह परिवर्तन केवल बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि हमारे अंदर भी गहरे स्तर पर होता है। हम महसूस करते हैं कि हमारी हर क्रिया, हर सोच, हर अनुभव अब एक नए प्रकाश में परिवर्तित हो गए हैं।

यह परिवर्तन हमें बताता है कि अहंकार के भ्रम से बाहर निकलकर हम एक ऐसे जीवन का अनुभव कर सकते हैं, जहाँ हम सिर्फ ‘मैं’ के बजाय ‘हम’ का अनुभव करते हैं। यहाँ व्यक्तिगत महत्व और सामाजिक पहचान की परवाह नहीं रहती, बल्कि एक सामूहिक चेतना का अनुभव होता है, जहाँ हम सभी एक ही स्रोत से जुड़े हुए हैं।

21. समापन: स्वयं की खोज और सत्य की ओर

अंत में, यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि अहंकार केवल एक भ्रम है, एक ऐसी परत है जिसे हम अपने अंदर छिपाए रखते हैं। ओशो का यह संदेश हमेशा हमें यह याद दिलाता है कि हम सब में एक अनंत, शुद्ध चेतना विद्यमान है, जिसे जागृत करना ही हमारी असली यात्रा है। जब हम उस सत्य की खोज में लग जाते हैं, तो हम पाते हैं कि “मैं हूं, मैं कुछ हूं” का अर्थ सिर्फ एक आडंबर नहीं, बल्कि उस अनंत अनुभव का आह्वान है, जो हमें स्वयं में छिपा हुआ प्रतीत होता है।

इसलिए, अपने अंदर झांकिए, अपने अहंकार की दीवारों को गिराइए, और उस अनंत, शुद्ध चेतना से मिलने का अनुभव कीजिए। यह यात्रा आसान नहीं होगी – इसमें कई बार संघर्ष, निराशा और भ्रम भी आएंगे – परंतु याद रखिए कि हर संघर्ष के बाद एक नई सुबह होती है, हर अंधेरे के बाद उजाला जरूर आता है। ओशो कहते हैं कि जब तक हम अपने अंदर के उस अनंत स्वरूप को नहीं पहचानते, तब तक हम केवल एक सीमित ‘मैं’ की पहचान में उलझे रहेंगे।

मित्रों, यह प्रवचन एक निमंत्रण है – एक निमंत्रण उस गहरी यात्रा पर, जहाँ हम अपने अंदर की उस अनंत चेतना से मिलते हैं, जो अहंकार की सीमाओं से परे है। यह यात्रा आपको न केवल आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाएगी, बल्कि आपको उस शांति, प्रेम और आनंद का अनुभव भी कराएगी, जो वास्तव में अनंत है।

22. निष्कर्ष: अहंकार से ऊपर उठकर, एक सच्चे जीवन की ओर

अंत में, यह कहना चाहूंगा कि अहंकार एक ऐसा भ्रम है, जो हमें हमारे वास्तविक स्वभाव से दूर कर देता है। “मैं हूं, मैं कुछ हूं” के इस नारे में छिपी हुई वह असली शक्ति है, जो हमें अपने अंदर की अनंत चेतना से अलग कर देती है। जब हम इस भ्रम से बाहर निकलते हैं, तो हम पाते हैं कि हमारी असली पहचान कहीं और, कहीं अधिक गहरी है – वह है अनंत प्रेम, अनंत शांति और अनंत आनंद।

ओशो की वाणी में यह संदेश एक बार फिर दोहराया जाता है – कि आप अपने अहंकार को पहचानें, उसे समझें, और फिर उसे धीरे-धीरे पीछे छोड़ दें। जब आप यह करेंगे, तो आप पाएंगे कि आपकी आत्मा कितनी विशाल है, कितनी शुद्ध है, और कितनी अद्भुत है। आप न केवल अपने अंदर की उस अनंत शक्ति को पहचानेंगे, बल्कि आप उस शक्ति के साथ एक नए, अनंत अनुभव में विलीन हो जाएंगे।

इस प्रवचन के माध्यम से मेरा उद्देश्य यही है कि आप अपने अंदर की उस अनंत चेतना को महसूस करें, और अपने जीवन के हर क्षण को एक नए नजरिए से देखें। अहंकार केवल एक अध्याय है, एक चरण है – परंतु आपके असली जीवन का सार तो उसी अनंत चेतना में निहित है, जिसे आप महसूस कर सकते हैं, जब आप अपने अहंकार को त्याग देंगे।

23. एक अंतिम संदेश

प्रिय साथियों, जीवन एक नृत्य है, एक अनंत संगीत है, और हम सब इसमें एक अद्वितीय धुन का हिस्सा हैं। जब हम अपने अहंकार को छोड़कर उस सामूहिक संगीत में सम्मिलित हो जाते हैं, तो हमें एक ऐसी अनुभूति होती है, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। यह अनुभूति हमें बताती है कि हम सब एक ही स्रोत से उत्पन्न हुए हैं, और यही स्रोत हमारे अंदर हमेशा विद्यमान रहेगा।

इसलिए, चलिए हम सब मिलकर उस यात्रा पर निकलें, जहाँ हम अपने अंदर की उस अनंत चेतना को खोज सकें, जहाँ अहंकार का केवल एक भ्रम ही रह जाए, और हमारे अस्तित्व में केवल प्रेम, शांति और पूर्णता का संचार हो। यह यात्रा कठिन हो सकती है, परंतु यह उतनी ही अद्भुत भी है, जितनी कि किसी भी सांसारिक सफलता से बढ़कर है।

आप सभी से यह निवेदन है कि आप अपने अंदर झांकें, अपने भय, अपनी अपेक्षाओं को समझें, और फिर उस अद्भुत सत्य का अनुभव करें जो आपके भीतर छिपा हुआ है। इस सत्य में, “मैं हूं, मैं कुछ हूं” का असली अर्थ वही नहीं है जो आपने कभी समाज से सीखा है, बल्कि इसका मतलब है – “मैं अनंत हूँ, मैं शुद्ध हूँ, मैं सब कुछ हूँ।” यही है जीवन का असली सार, यही है हमारे अस्तित्व की वह अनंत धारा, जो हमें जोड़ती है।

24. आभार और विदाई

आज के इस प्रवचन के माध्यम से मैंने कोशिश की है कि आप सभी के सामने उस गहरे रहस्य को खोल सकूँ, जो अहंकार के परे छिपा हुआ है। यह एक ऐसी यात्रा है, जहाँ हर कदम पर आप नए अनुभव करेंगे, हर मोड़ पर आप अपने अंदर की अनंत चेतना को निहारेंगे। ओशो के शब्द हमें यही सीख देते हैं कि जब तक हम अपने अहंकार की परतों को हटाकर उस शुद्ध चेतना से नहीं मिलते, तब तक हम जीवन के असली आनंद से दूर रहते हैं।

इसलिए, मित्रों, चलिए हम सब मिलकर इस यात्रा पर निकलें, अपने अहंकार को समझें और उससे पार पाएं। यही वह मार्ग है, जो हमें एक सच्चे, पूर्ण और अनंत जीवन की ओर ले जाता है। आज का यह प्रवचन एक ऐसी पहल है – एक ऐसा कदम है, जहाँ से आप अपने अंदर के उस अनंत स्रोत से जुड़ने का अनुभव कर सकते हैं।

आप सभी को इस यात्रा के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ। याद रखिए, जीवन में असली सफलता वही है, जब हम अपने अंदर की उस अनंत चेतना को महसूस करते हैं, और अहंकार के झूठे प्रतिबिंबों से परे जाकर एक सच्चे प्रेम, शांति और आनंद का अनुभव करते हैं।

इस प्रकार, ओशो के विचारों की आभा में हम समझते हैं कि अहंकार केवल एक भ्रम है, एक ऐसी परत है जिसे हम अपने अंदर छिपा लेते हैं। जब हम उस परत को हटाकर अपने वास्तविक स्वभाव – उस अनंत, शुद्ध चेतना को पहचानते हैं – तो हम वास्तव में जीने का आनंद प्राप्त करते हैं। यही है जीवन का असली रहस्य, यही है आत्म-साक्षात्कार का सार।

प्रिय मित्रों, जब तक आप इस अनुभव से नहीं गुजरते, तब तक आप केवल एक नकली ‘मैं’ के साथ जीते रहेंगे। लेकिन जब आप इस यात्रा पर निकलेंगे, तो आप पाते हैं कि “मैं हूं, मैं कुछ हूं” का असली अर्थ क्या है – एक ऐसा अनुभव, जहाँ हर बाधा, हर भ्रम, हर अहंकार की परत पीछे रह जाती है, और आपके अंदर केवल अनंत प्रेम, शांति और आनंद का संचार होता है।

इस प्रवचन के माध्यम से, मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि अपने अंदर झाँकें, अपने अहंकार की परतों को समझें, और उस अनंत चेतना का अनुभव करें जो आप में ही समाई हुई है। यही वह अनंत यात्रा है, जो आपको सच्चे जीवन के अनुभव तक ले जाएगी, और आपको उस अनंत प्रेम से जोड़ देगी, जो आपके अस्तित्व का असली सार है।

जय हिंद, जय प्रेम, और जय अनंत चेतना!

यह प्रवचन, ओशो की शैली में, अहंकार की जटिलताओं, उसके प्रभाव और उससे मुक्ति के मार्ग की एक विस्तृत व्याख्या है। इसमें हमने देखा कि कैसे समाज और व्यक्तिगत अनुभवों के द्वारा अहंकार का निर्माण होता है, और कैसे ध्यान एवं जागरूकता के माध्यम से हम उस भ्रम से ऊपर उठ सकते हैं। आशा करता हूँ कि यह प्रवचन आपके मन में एक नई चेतना का संचार करेगा, और आपको अपने असली स्वभाव की ओर एक कदम और करीब ले जाएगा।

हर एक सांस, हर एक पल को महसूस कीजिए, क्योंकि यही वह क्षण है जब आप अपने अंदर की अनंत चेतना का अनुभव कर सकते हैं। अहंकार के उस भ्रम से बाहर निकलकर, अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानिए – वह स्वरूप जो अनंत है, शुद्ध है, और प्रेम से भरा हुआ है। यही है जीवन का असली सार, यही है आत्म-साक्षात्कार का मार्ग।

प्रिय मित्रों, जब आप इस प्रवचन को पढ़ें, तो अपने दिल में एक प्रश्न जरूर उठेगा – “मैं कौन हूँ?” और उस प्रश्न का उत्तर, ओशो के शब्दों में, आपके अंदर ही छिपा हुआ है। उस उत्तर को खोजिए, उसे महसूस कीजिए, और जब आप उसे पाएं, तो जान जाइए कि आप सचमुच में अनंत हैं।

आइए, हम सब मिलकर इस यात्रा पर निकलें, जहाँ हर क्षण में एक नई अनुभूति हो, हर अनुभव में एक नया रहस्य हो, और हर सांस में एक अनंत प्रेम का संचार हो। यह यात्रा केवल बाहरी दुनिया के मोह माया से परे है, यह यात्रा उस अनंत चेतना की ओर है, जो हमेशा आपके अंदर विद्यमान रही है, बस उसे महसूस करने का इंतजार कर रही है।

इस प्रकार, अहंकार की यह व्याख्या हमें एक गहरी समझ देती है कि “मैं हूं, मैं कुछ हूं” का वास्तविक अर्थ केवल एक झूठा भ्रम नहीं, बल्कि एक आह्वान है – एक आह्वान उस अनंत चेतना का, जो आपके अंदर छिपी हुई है। जब आप उस आह्वान को स्वीकार करेंगे, तभी आप अपने जीवन के हर क्षण में असली खुशी, शांति और प्रेम का अनुभव कर सकेंगे।

जय हो उस अनंत चेतना की, जो हम सभी में विद्यमान है, और जय हो उस सच्चे, शुद्ध अस्तित्व की, जो हम में से हर एक के अंदर निहित है।

इस विस्तृत प्रवचन के माध्यम से ओशो के विचारों को समर्पित यह वार्ता आपको आपके स्वयं के अहंकार से परे निकलने, अपने असली स्वरूप की खोज करने और जीवन में एक नई चेतना का अनुभव करने के लिए प्रेरित करे। आशा है कि यह प्रवचन आपके मन, हृदय और आत्मा को स्पर्श करेगा, और आपको उस अनंत प्रेम और शांति का अनुभव कराएगा, जो हमारे अस्तित्व का सच्चा सार है।

आप सभी को इस आध्यात्मिक यात्रा के लिए मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

जीते रहिए, अनुभव करते रहिए, और अपने अंदर के अनंत प्रेम को महसूस करते रहिए।


(समाप्त)

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