सुख का लालच: एक भ्रम और उसके पीछे छिपा सच्चा दर्द

मेरे प्यारे दोस्तों, जब आप कहते हैं – “सुख का लालच ही नए दुख को जन्म देता है” – तो यह केवल एक कथन नहीं है, बल्कि एक गूढ़ सत्य है जिसे समझना हमारे अस्तित्व के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक है। आज हम इस सत्य की गहराइयों में उतरेंगे, उसकी जटिलताओं को देखेंगे और यह जानने की कोशिश करेंगे कि आखिरकार हम क्यों हमेशा दुख में उलझे रहते हैं, जबकि हमें बताया गया है कि सुख में ही हमारी मुक्ति छिपी हुई है।

जब आप अपने अंदर झाँकते हैं, तो क्या आप देख पाते हैं कि आपके मन की बेचैनी, आपकी उम्मीदें, आपकी लालसाएँ – सभी का एक मूल स्रोत है, एक गहरी जड़ है जो आपकी आत्मा को हमेशा असंतोष में बाँध कर रखती है? यही जड़ है – सुख की लालसा। लेकिन असल में, यह लालसा एक छलावा है, एक माया है, जो हमें असली खुशी से दूर ले जाती है।

लालच का मायाजाल

हमारी संस्कृति में, समाज में, यहाँ तक कि धर्म में भी सुख को परम ध्येय बताया गया है। "सुखी रहो, समृद्ध रहो, सफल बनो" – ये सब कहानियाँ हमें बार-बार सुनाई जाती हैं। परंतु क्या कभी सोचा है कि यह सुख क्या है? यह सुख, जो हम पाने के लिए इतनी मेहनत करते हैं, वह वास्तव में हमारे अंदर के शून्य को कैसे भरता है? जब आप किसी भी वस्तु या अनुभव को पाने की चाह में रहते हैं, तो आप स्वयं उस चीज़ के प्रति एक असीम लालच में फँस जाते हैं। इस लालच का अंत भी उसी लालच में होता है – क्योंकि एक बार जब आप उसे प्राप्त करते हैं, तो उसकी चमक फीकी पड़ जाती है और आपको और भी कुछ चाहिए होता है।

सोचिए, अगर आपने एक बार सुख का स्वाद चखा, तो आपकी आत्मा में एक नई इच्छा का बीज अंकुरित हो जाता है – और यही बीज समय के साथ बढ़ता जाता है, अंततः एक विशाल वृक्ष बन जाता है जो आपके जीवन के हर कोने में फैला रहता है। इस वृक्ष के हर पत्ते पर एक-एक सपना, एक-एक लालसा उकेरी होती है। और जब आप उन सपनों का पीछा करते हैं, तो आप अंततः खुद को उस ही वृक्ष के अन्दर उलझा पाते हैं। यही वह माया है जिसे हम सुख का लालच कहते हैं।

असली सुख और उसकी खोज

अब सवाल यह उठता है कि असली सुख क्या है? क्या वह बाहरी वस्तुओं में है? क्या वह धन-दौलत में है? या फिर वह उस अनुभव में है जो केवल तब आता है जब हम पूरी तरह से वर्तमान में जीते हैं? ओशो कहते हैं कि "सुख एक पल का अनुभव है" – यह कोई स्थायी वस्तु नहीं है, बल्कि एक प्रवाह है, एक अनुभव है जो आंतरिक शांति और संतोष से उपजता है। जब हम सुख के पीछे दौड़ते हैं, तो हम अक्सर इसे बाहरी दुनिया में तलाशने लगते हैं। परंतु असली सुख तो भीतर ही कहीं छिपा होता है, एक ऐसी शांति जो किसी भी बाहरी वस्तु से परे है।

यह समझना जरूरी है कि बाहरी सुख एक भ्रम है, एक आभासी प्रतिबिंब है। जब हम उस पर निर्भर हो जाते हैं, तो हमारा मन हमेशा उसी लालच में रहता है कि "अभी मुझे और चाहिए", "अभी मुझे यह चाहिए"। यह अंतहीन चाहत ही हमारे जीवन में निरंतर संघर्ष और दुख का कारण बनती है।

मन की जड़ें और लालच का चक्र

आपके मन में जिस लालच का आगमन होता है, वह एक चक्र में बंध जाता है। यह चक्र कुछ इस प्रकार है – सबसे पहले आपको किसी वस्तु, किसी अनुभव, या किसी संबंध का आकर्षण महसूस होता है। आप उस आकर्षण को पाने के लिए अपनी सारी ऊर्जा लगा देते हैं। जब आपको वह वस्तु मिल जाती है, तो आपको एक अस्थायी सुख की अनुभूति होती है। परंतु यह सुख स्थायी नहीं रहता, क्योंकि उसी सुख का अनुभव आपको यह एहसास कराता है कि "और भी कुछ चाहिए"। फिर आप उस और अधिक पाने की चाह में लग जाते हैं। इस प्रक्रिया में आपकी आत्मा हर बार और भी अधिक बेचैन हो जाती है।

सोचिए, यह प्रक्रिया कितनी बार दोहराई गई है – जन्म से लेकर आज तक। हम सब एक अनंत लालच के चक्र में फंसे हुए हैं, जो हमें कभी शांति नहीं पाने देता। इस चक्र से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता है – उस लालच को समझना और उसे त्यागना। जब आप स्वयं को समझते हैं, तब आप इस लालच के जाल से मुक्त हो सकते हैं।

अंतर्मन की खोज में ध्यान

ओशो ने ध्यान को एक ऐसी साधना के रूप में प्रस्तुत किया है, जो हमें इस लालच से मुक्त कर सकती है। ध्यान का अभ्यास करने से आप अपने मन की गहराइयों में उतर सकते हैं, वहां छिपी उन जड़ों को देख सकते हैं, जहां से यह लालच उत्पन्न होता है। ध्यान आपको अपने भीतर के उस स्थायी सुख से मिलवाता है, जो बाहरी वस्तुओं से कहीं अधिक वास्तविक होता है।

जब आप ध्यान करते हैं, तो आप देखेंगे कि आपकी सारी चाहतें, आपकी सारी इच्छाएं धीरे-धीरे शांत हो जाती हैं। आपका मन उस गहरी शांति में डूब जाता है, जहाँ कोई भी बाहरी वस्तु, कोई भी अनुभव, आपको प्रभावित नहीं कर सकता। यह शांति स्वयं में एक अनमोल उपहार है, जो आपको बताती है कि असली सुख बाहरी लालच में नहीं, बल्कि अंदर की शांति में है।

जीवन के रंगमंच पर लालच की भूमिका

अब आइए एक और दृष्टिकोण से देखें – जीवन के रंगमंच पर। समाज ने हमें एक भूमिका सौंपी है, जहाँ हमें हमेशा सुखी दिखना होता है, हमेशा सफल होना होता है। इस सामाजिक दबाव के कारण भी हम अंदर ही अंदर लालच का शिकार हो जाते हैं। आप अपने दोस्तों, परिवार, या सहकर्मियों से तुलना करने लगते हैं। "मेरा दोस्त कितना धनाढ्य है", "मेरे पड़ोसी की कार कितनी सुंदर है", "मुझे भी वैसा ही कुछ चाहिए" – यह सब आपके मन में एक असीम इच्छा पैदा करता है। यह इच्छाएँ आपको उस माया में फंसा लेती हैं, जहां आप अपने आप को खो देते हैं।

ओशो कहते हैं कि जब तक हम स्वयं को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक हम दूसरों के द्वारा निर्धारित मापदंडों के अनुसार जीते रहेंगे। इस स्वीकारोक्ति की कमी ही हमें हमेशा किसी और के पीछे भागने पर मजबूर कर देती है। हम अपनी पहचान को उस बाहरी वस्तु या अनुभव से जोड़ लेते हैं, जिससे हमें समाज में मान्यता मिलती है। परंतु यही मान्यता, यही लालच, अंततः हमारे लिए दुख का कारण बनती है।

स्वीकारोक्ति और प्रेम की अनुभूति

स्वीकारोक्ति का अर्थ है – स्वयं को उस रूप में स्वीकार करना जैसा आप हैं, बिना किसी बाहरी मान्यता या अपेक्षा के। जब आप स्वयं को पूरी तरह स्वीकार लेते हैं, तब आपके अंदर एक ऐसा प्रेम उत्पन्न होता है जो किसी भी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं रहता। यह प्रेम एक शांत और स्थायी सुख प्रदान करता है, जो कि लालच से बिल्कुल विपरीत है।

ओशो ने बार-बार कहा है कि प्रेम वह अवस्था है जहाँ मन में कोई इच्छा नहीं रहती। जब आप प्रेम में रहते हैं, तो आपके मन में कोई भी अपेक्षा या लालच नहीं होता। आप वर्तमान में जीते हैं, हर पल का अनुभव करते हैं और उसी में सम्पूर्णता पाते हैं। यह प्रेम, यह स्वीकारोक्ति ही असली सुख है – जो बिना किसी लालच के है, बिना किसी अपेक्षा के है।

सुख और दुख: एक-दूसरे के प्रतिबिम्ब

अब हम यह समझें कि सुख और दुख एक-दूसरे के पूरक हैं। जब हम सुख का लालच करते हैं, तो हम उसी के साथ दुख को आमंत्रित करते हैं। यह दुख उस समय प्रकट होता है जब हमें एहसास होता है कि वह सुख स्थायी नहीं है, कि वह क्षणिक है। सुख की प्राप्ति के बाद जो खालीपन होता है, वह हमें और भी अधिक दुःख की ओर ले जाता है। यह एक निरंतर चक्र है, जहाँ सुख की प्राप्ति के साथ ही दुख की बुनियाद भी पनप जाती है।

सोचिए, अगर आप एक नदी के किनारे खड़े हों, और उस नदी का जल जितना भी पी लो, पर वह कभी भी न भरने वाला महसूस होता है। इसी प्रकार, जब हम बाहरी सुख के पीछे भागते हैं, तो हमें वह सच्चा संतोष कभी नहीं मिलता। क्योंकि वह जल केवल अस्थायी है, वह हमेशा आपके अंदर एक नई तृष्णा छोड़ जाता है। यही वह दुख है, जो सुख के लालच से उत्पन्न होता है।

आत्मिक परिवर्तन की आवश्यकता

मेरे प्रिय साथियों, यदि आप इस चक्र से बाहर निकलना चाहते हैं, यदि आप अपने जीवन में स्थायी सुख की तलाश में हैं, तो सबसे पहले आपको अपने मन के उस गहरे कोने में उतरना होगा जहाँ आपकी असली पहचान छिपी है। आपको समझना होगा कि बाहरी वस्तुओं में आपका सुख नहीं, बल्कि आपकी आंतरिक शांति में है। इस परिवर्तन के लिए आत्मा की खोज अनिवार्य है।

यह परिवर्तन केवल बाहरी संसार के बदलने से संभव नहीं है, बल्कि आपको अपने अंदर की दुनिया को समझना होगा। अपने विचारों, अपनी भावनाओं और अपनी इच्छाओं का निरीक्षण करें। उन लालसाओं को पहचानें जो आपके मन को हमेशा अशांत रखती हैं। एक बार जब आप इन लालसाओं की पहचान कर लेते हैं, तो आप उन्हें धीरे-धीरे त्यागने की ओर बढ़ सकते हैं।

समय की आवश्यकता और धैर्य

यह प्रक्रिया तुरंत नहीं होती। जीवन में स्थायी परिवर्तन के लिए समय, धैर्य और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। ओशो कहते हैं कि जब तक आप अपने अंदर की दुनिया को पूरी तरह से स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक आप बाहरी दुनिया के मोह में फंसे रहेंगे। इसलिए, अपने आप से प्रेम करें, अपने अनुभवों को बिना किसी भय या संकोच के स्वीकारें। हर अनुभव, चाहे वह सुखद हो या दुखद, आपको एक नई सीख देता है।

ध्यान, स्वाध्याय, और आत्म-संवाद की इस प्रक्रिया में आपको धीरे-धीरे वह शक्ति प्राप्त होगी जो आपको बाहरी लालच से ऊपर उठने में मदद करेगी। इस शक्ति का मुख्य स्रोत है – आपकी आत्मा का शांति। जब आप अपने अंदर की उस शांति को खोज लेते हैं, तब आपको बाहरी सुख के मोह से मुक्ति मिल जाती है।

सुख का लालच और आध्यात्मिक मुक्ति

आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हुए, आप पाएंगे कि सभी सांसारिक सुख एक भ्रम हैं। यह भ्रम आपके अंदर की वास्तविकता से दूर कर देता है। जब आप उस भ्रम को तोड़ देते हैं, तब आपको एक नई जागृति का अनुभव होता है। यह जागृति आपको बताती है कि असली सुख, असली आनंद, वह है जो आपके भीतर है, वह है आपकी आत्मा की शुद्धता।

ओशो ने कहा है, "जब तुम भीतर की ओर देखोगे, तभी तुम्हें असली खुशी का एहसास होगा।" यह सत्य है कि जब आप अपने मन के गहरे कोने में उतरते हैं, तो आपको वह स्थायी शांति मिलती है जो किसी भी बाहरी वस्तु से परे है। यही वह सुख है, जिस पर कोई लालच नहीं कर सकता, जो कभी भी नष्ट नहीं होता। यह सुख असीम है, शाश्वत है।

विवेक और आंतरिक स्वतंत्रता

विवेक का अर्थ है – सही और गलत का अंतर समझना, और उस अंतर को अपने जीवन में लागू करना। जब आप अपने जीवन में विवेक का पालन करते हैं, तो आप बाहरी लालसाओं के मोह से दूर रहते हैं। विवेक आपको यह समझने में मदद करता है कि बाहरी सुख क्षणिक हैं, और असली स्वतंत्रता आपके अंदर है।

आंतरिक स्वतंत्रता वह अवस्था है, जहाँ आप बिना किसी लालच के, बिना किसी बाहरी अपेक्षा के, बस वर्तमान में जीते हैं। यह अवस्था आपके मन की गहराइयों से उत्पन्न होती है, जब आप अपने आप को समझते हैं और स्वीकारते हैं। यही वह स्वतंत्रता है जो आपको असली सुख की ओर ले जाती है।

लालच का त्याग: एक नई दिशा की ओर

जब आप यह निर्णय लेते हैं कि अब आपको बाहरी सुख के पीछे भागना छोड़ देना है, तो आप एक नई दिशा में कदम रखते हैं। यह त्याग एक ऐसा त्याग है, जिसमें आप अपने मन की उन तमाम इच्छाओं, लालसाओं और अपेक्षाओं को छोड़ देते हैं, जो आपको निरंतर दुख में उलझाए रखती हैं। यह त्याग एक साधना है, जो आपको उस स्थायी शांति और आनंद की ओर ले जाती है, जो आपके अंदर है।

इस त्याग का अर्थ है – बाहरी दुनिया की अपेक्षाओं को पीछे छोड़ना, समाज के उस माया जाल से बाहर निकलना, और अपनी आत्मा की आवाज सुनना। जब आप यह करते हैं, तो आपको न केवल बाहरी सुख का भ्रम दूर होता है, बल्कि आप स्वयं की आत्मा की ओर आकर्षित होते हैं। यही वह मार्ग है, जिस पर चलते हुए आप जीवन के असली अर्थ को समझते हैं।

जीवन की निरंतरता और परिवर्तन

जीवन निरंतर परिवर्तनशील है। सुख और दुख का चक्र चलता रहता है। लेकिन यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि परिवर्तन के साथ ही स्थिरता भी संभव है। जब आप अपने अंदर की शांति को खोज लेते हैं, तब आप हर परिवर्तन को सहजता से स्वीकार कर लेते हैं। आपको यह समझ आता है कि बाहरी घटनाएँ चाहे कितनी भी अस्थायी क्यों न हों, आपके अंदर की शांति अटल है।

इस शांति के साथ जीना एक कला है। यह कला आपको सिखाती है कि कैसे हर पल का अनुभव करें, बिना किसी लालच के, बिना किसी अपेक्षा के। यह कला आपको बताती है कि असली सुख वह है, जो बाहरी दुनिया के बदलते रंगों से नहीं, बल्कि आपके अंदर की निरंतरता से आता है।

एक नयी समझ और एक नयी दिशा

जब आप इस प्रवचन को सुनते हैं, तो यह एक निमंत्रण है – एक निमंत्रण अपने आप को जानने का, अपने मन के उस अंधकार से उजाला करने का। सुख का लालच हमें केवल बाहरी दुनिया में भटकाता है, जबकि असली सुख हमारी आत्मा में छिपा है। इसे पाने के लिए हमें बाहरी लालच को त्यागना होगा और अपने अंदर की आवाज़ को सुनना होगा।

इस यात्रा में आप पाएंगे कि हर दुख के पीछे एक सच्चाई छिपी होती है, हर पीड़ा के पीछे एक उपदेश होता है। यह उपदेश आपको बताता है कि जब तक आप स्वयं को नहीं समझेंगे, तब तक आप किसी भी बाहरी वस्तु से पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकते। इस समझ के साथ ही, आप बाहरी लालच के उस जाल से मुक्त हो जाएंगे, जो आपको निरंतर दुःख में बांधे रखता है।

रहस्योद्घाटन: आत्मा की गहराई में उतरना

अंततः, यह समझना आवश्यक है कि बाहरी सुख का लालच एक भ्रम है, एक माया है। इस माया से मुक्त होने के लिए आपको अपने अंदर की गहराइयों में उतरना होगा, उस अज्ञात को पहचानना होगा जो हमेशा से आपके साथ था। यह यात्रा आपको आपके अस्तित्व के मूल तक ले जाती है, जहाँ कोई बाहरी वस्तु, कोई अपेक्षा, आपको प्रभावित नहीं कर सकती।

जब आप इस आत्मिक यात्रा पर निकलते हैं, तो आपको महसूस होता है कि आपकी आत्मा अनंत है, शाश्वत है। आपको यह एहसास होता है कि असली सुख वह है, जो आपके भीतर के उस शांत समंदर में है, जहाँ कोई लालच, कोई इच्छा नहीं होती। यह समझ आपको बताती है कि जीवन में असली मुक्ति बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मा की उस शुद्धता में है।

अनुभव से ज्ञान की ओर

मेरे प्रिय मित्रों, ज्ञान केवल पुस्तकें पढ़ने से नहीं आता, बल्कि अनुभव से आता है। जब आप स्वयं इस यात्रा पर निकलते हैं, तो आपको अपने जीवन के हर पहलू में एक नया अर्थ दिखाई देगा। आपको यह महसूस होगा कि हर सुख, हर दुख एक संदेश लेकर आते हैं – एक संदेश जो आपको बताता है कि जीवन का असली मर्म क्या है।

इस संदेश को समझने के लिए आपको अपने अनुभवों को बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वीकार करना होगा। जब आप अपने अनुभवों को बिना किसी आलोचना के स्वीकारते हैं, तो आप स्वयं को उस ज्ञान के लिए खोल देते हैं, जो बाहरी सुख के लालच से परे है। यही ज्ञान आपको बताता है कि सुख और दुख, दोनों ही जीवन के अनिवार्य अंग हैं, और इन्हें स्वीकार करने में ही असली मुक्ति छिपी है।

ध्यान और साधना: अंतर्मन की आवाज़

ध्यान, साधना और स्वाध्याय की इस यात्रा में, आप पाएंगे कि आपका मन धीरे-धीरे उस स्थायी शांति की ओर अग्रसर होता है, जो किसी भी बाहरी वस्तु से परे है। जब आप अपने भीतर की आवाज़ को सुनते हैं, तो आपको उस आंतरिक स्वरों का अनुभव होता है, जो बताता है कि असली सुख बाहरी लालच में नहीं, बल्कि आपकी आत्मा की शुद्धता में है।

ओशो ने ध्यान को एक ऐसी क्रिया कहा है जो आपके अंदर के उस अनंत प्रेम और शांति को जागृत कर देती है। जब आप ध्यान में अपने आप को खो देते हैं, तो आपको पता चलता है कि बाहरी वस्तुओं का सुख एक क्षणिक अनुभव है, जबकि आपकी आत्मा का आनंद शाश्वत है। यह वह अनुभव है जो आपको बताता है कि जीवन का असली उद्देश्य बाहरी लालच से मुक्त होकर आंतरिक शांति को प्राप्त करना है।

लालच का त्याग और आत्मनिर्भरता

जब आप बाहरी लालच का त्याग कर देते हैं, तब आप आत्मनिर्भर बन जाते हैं। आत्मनिर्भरता का अर्थ है – बाहरी वस्तुओं या अपेक्षाओं के बिना अपने आप को संपूर्ण समझना। जब आप आत्मनिर्भर हो जाते हैं, तो आप समझ जाते हैं कि असली सुख, असली खुशी, वह आपकी आत्मा के भीतर है, न कि किसी बाहरी वस्तु में।

इस आत्मनिर्भरता का अनुभव आपको एक नई दिशा देता है, एक नई दृष्टि से जीवन को देखने की क्षमता। अब आप देखेंगे कि हर बाहरी घटना आपके अंदर की शांति को हिला नहीं सकती। यह शांति आपके अंदर एक अटूट शक्ति की तरह है, जो आपको हर परिस्थिति में स्थिर रखती है। यही वह शक्ति है जो आपको सुख के लालच से मुक्त करती है।

समापन: एक नई यात्रा की ओर कदम

अंत में, मेरे प्यारे दोस्तों, यह समझें कि "सुख का लालच ही नए दुख को जन्म देता है" – यह केवल एक कथन नहीं, बल्कि एक ऐसी गहरी सच्चाई है जिसे समझना हमारे जीवन की सबसे बड़ी जरूरत है। बाहरी सुख के लालच में खो जाने से हम अपने असली स्व को भूल जाते हैं। जब तक हम उस लालच को त्याग नहीं देते, तब तक हमें सच्चा आनंद और शांति प्राप्त नहीं हो सकती।

आपको यह निर्णय लेना होगा कि अब आपको बाहरी वस्तुओं के मोह से ऊपर उठना है, अपने अंदर की आवाज़ को सुनना है, और उस स्थायी शांति की खोज करनी है जो आपकी आत्मा में छिपी हुई है। यह निर्णय ही आपको जीवन के उस असीम आनंद की ओर ले जाएगा, जहाँ सुख और दुख, दोनों ही अपने आप में विलीन हो जाते हैं।

अपने अंदर झाँकिए, उस अज्ञात को पहचानिए जो हमेशा से आपके साथ था, और उसे अपनी आत्मा में पनपने दीजिए। यही वह मार्ग है जिससे आप जीवन के हर पल को सम्पूर्णता के साथ जी सकेंगे। बाहरी लालच को त्याग कर, आप उस असीम शांति और प्रेम के संसार में प्रवेश करेंगे, जहाँ न कोई दुःख है, न कोई लालच – केवल सत्य है।

एक आमंत्रण: स्वयं की खोज में आगे बढ़ें

अब, मैं आपको एक आमंत्रण देता हूँ – चलिए, मिलकर उस आंतरिक यात्रा पर निकलते हैं जहाँ हमें अपने असली स्व का पता चलता है। उस स्व का पता चलता है, जो हमेशा से हमारे भीतर है, लेकिन जिसे हम बाहरी लालसाओं के भ्रम में भूल गए हैं। इस यात्रा में आप पाएंगे कि सुख और दुख दोनों ही क्षणिक हैं, और असली स्थायी सुख आपके अंदर की शांति में है।

अपने आप से पूछिए: "क्या मैं वास्तव में खुश हूँ?" अगर उत्तर में संकोच या असमंजस है, तो समझ जाइए कि यह लालच का प्रभाव है। इस प्रभाव से बाहर निकलने का एकमात्र उपाय है – अपने आप से प्रेम करना, स्वयं को समझना और अपनी आत्मा की आवाज़ को सुनना। जब आप यह करेंगे, तो आपको वह सच्चा सुख मिलेगा, जो किसी भी बाहरी वस्तु से परे है।

ध्यान: एक साधना का आह्वान

मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि आप रोजाना कुछ समय ध्यान के लिए निकालें। ध्यान में बैठकर अपने मन की सभी लालसाओं, सभी इच्छाओं को बिना किसी निर्णय के देखें। जब आप उन्हें देखते हैं, तो आप समझेंगे कि ये लालसाएँ आपके अंदर की शांति को कैसे बाधित करती हैं। ध्यान के उस शांत वातावरण में, आप अपने आप को पाएंगे – एक ऐसे शांति में जो हर लालच को निष्प्रभावी कर देती है।

ध्यान के उस पवित्र पल में, आप जानेंगे कि बाहरी संसार की चमक-दमक कितनी क्षणभंगुर है। आपके अंदर का आनंद, आपकी आत्मा का प्रकाश, वह स्थायी है, वह शाश्वत है। यही वह मार्ग है, जिस पर चलते हुए आप सच्चे सुख की प्राप्ति कर सकते हैं।

जीवन की नई परिभाषा

तो, मेरे प्यारे दोस्तों, अब जब आप यह समझ चुके हैं कि सुख का लालच ही नए दुख को जन्म देता है, तो अगला कदम क्या होगा? अगला कदम है – अपने जीवन की परिभाषा को पुनः परिभाषित करना। जीवन का उद्देश्य बाहरी वस्तुओं के पीछे भागना नहीं, बल्कि अपने अंदर की उस अद्भुत शांति और प्रेम को पहचानना है जो आपके भीतर सदैव विद्यमान है।

यह नया परिभाषा आपको बताता है कि आप केवल एक भौतिक शरीर नहीं हैं, बल्कि एक अमर आत्मा हैं, जो अनंत प्रेम और आनंद से युक्त है। इस नई परिभाषा के साथ, आप जीवन के हर पल को एक नई दृष्टि से देखने लगेंगे। आप पाएंगे कि हर अनुभव, चाहे वह सुखद हो या दुखद, आपको एक नई सीख देता है, आपको एक नई अनुभूति प्रदान करता है।

सफलता और असफलता का भ्रम

हमारे समाज में अक्सर सफलता को बाहरी उपलब्धियों में नापा जाता है – धन, प्रतिष्ठा, और मान-सम्मान में। परंतु, जब आप इस बाहरी सफलता के चक्र में फंस जाते हैं, तो आप उस स्थायी सुख से दूर हो जाते हैं, जो आपकी आत्मा में है। बाहरी सफलता का लालच आपको एक निरंतर चिंता में डाल देता है कि "और भी अधिक चाहिए", "और भी बड़ा होना चाहिए"। यही वह लालच है जो आपके अंदर अनंत दुख का बीज बो देता है।

सोचिए, जब आप एक बार सफलता का अनुभव करते हैं, तो भी वह सफलता आपको संतोष नहीं दे पाती, क्योंकि आपकी आत्मा की उस गहरी प्यास को बुझा नहीं सकती। जब तक आप बाहरी मान्यता के लिए जीवित रहेंगे, तब तक आपके मन में एक निरंतर अभाव रहेगा। यही वह स्थिति है जिसे हम कहते हैं – सुख का लालच। इसे त्यागने का अर्थ है – बाहरी उपलब्धियों से ऊपर उठकर अपने अंदर की उस शांति को महसूस करना, जो हमेशा से आपके साथ है।

जीवन में संतुलन की आवश्यकता

एक संतुलित जीवन वह है जहाँ आप बाहरी उपलब्धियों और आंतरिक शांति के बीच संतुलन बना सकें। जब आप बाहरी वस्तुओं के लालच में इतने डूब जाते हैं कि आपकी आंतरिक शांति खो जाती है, तब आप वास्तव में खो ही जाते हैं। आपको यह समझना होगा कि बाहरी दुनिया से जो खुशी मिलती है, वह केवल क्षणिक है, जबकि आपकी आंतरिक शांति एक स्थायी अनुभव है।

इस संतुलन को प्राप्त करने के लिए, आपको अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सजग रहना होगा। अपने मन, शरीर और आत्मा की देखभाल करें। अपने आप को समझें, अपने आप को स्वीकारें। जब आप यह करेंगे, तो आप पाएंगे कि जीवन में संतुलन ही असली खुशी का आधार है।

उपसंहार: एक नए आरंभ की ओर

मेरे प्यारे मित्रों, आज हमने इस प्रवचन के माध्यम से यह समझने की कोशिश की है कि "सुख का लालच ही नए दुख को जन्म देता है" – और यह क्यों होता है। बाहरी लालच हमें केवल एक भ्रम में बाँधे रखता है, जबकि असली सुख हमारे अंदर की शांति में है। इस प्रवचन में हमने जाना कि कैसे बाहरी सुख की लालसाएँ हमें निरंतर दुख के चक्र में बांध देती हैं, और कैसे ध्यान, स्वीकृति, और आत्म-संवाद के माध्यम से हम इस चक्र से मुक्त हो सकते हैं।

यह एक निरंतर यात्रा है – एक ऐसी यात्रा जो आपको अपने असली स्व से परिचित कराती है। जब आप इस यात्रा पर निकलते हैं, तो आपको समझ आता है कि जीवन का असली उद्देश्य बाहरी वस्तुओं की खोज नहीं, बल्कि अपने अंदर की उस अमर शांति की खोज है जो आपके भीतर विद्यमान है। यह शांति, यह प्रेम, यह आत्मिक संतोष ही वह असली सुख है जिसकी कोई तुलना नहीं हो सकती।

अब, यह समय है कि आप अपने जीवन में एक नए आरंभ की ओर कदम बढ़ाएं। बाहरी लालच को त्यागें, अपने अंदर की आवाज़ को सुनें, और उस शांति की ओर अग्रसर हों जो आपके भीतर सदैव विद्यमान है। याद रखिए – असली सुख बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आपकी आत्मा की गहराइयों में है।

अपने दिल की सुनें, अपने मन के उस अज्ञात क्षेत्र में उतरें जहाँ आपकी आत्मा रहती है। वहाँ आप पाएंगे कि वह जगह, वह शांति, वह प्रेम – सब कुछ आपके अपने हैं, बिना किसी बाहरी लालच के। यही वह स्थान है जहाँ से जीवन की सच्ची ऊर्जा प्रवाहित होती है, जहाँ से आपको वह असली आनंद मिलता है, जो कभी न खोने वाला है।

अंतिम विचार

इस प्रवचन का सार यह है कि बाहरी सुख की लालसाएँ आपको एक निरंतर दुख के चक्र में बाँध लेती हैं। जब आप बाहरी सुख की तलाश में रहते हैं, तो आप अनजाने में उस माया में फँस जाते हैं, जहाँ हर प्राप्ति के बाद एक नई तृष्णा जन्म लेती है। यही तृष्णा आपको सतत असंतोष में रखती है। असली सुख वही है, जो आपकी आत्मा में विद्यमान है, जो आपको बाहरी लालच से ऊपर उठाकर स्थायी शांति प्रदान करता है।

ओशो की शिक्षाएँ हमें यही समझाती हैं कि जीवन का उद्देश्य बाहरी मान्यताओं के पीछे भागना नहीं, बल्कि अपने अंदर की आवाज़ को सुनना है। जब आप स्वयं की खोज करते हैं, तब आपको पता चलता है कि आपकी आत्मा की शांति ही सबसे बड़ी संपत्ति है। यह शांति न तो कभी समाप्त होती है, न ही कभी टूटती है। यह आपके अंदर की एक अमर ज्योति है, जो हमेशा चमकती रहती है, चाहे बाहरी दुनिया कितनी भी बदल जाए।

तो, आइए हम सब इस सत्य को स्वीकारें – कि बाहरी सुख की लालसा हमें केवल दुख में बांधती है, और असली सुख वही है जो हमारे अंदर है। इस सत्य को अपनाएं, और अपने जीवन को एक नई दिशा दें – एक ऐसी दिशा जहाँ आप अपने आप को जान सकें, अपने आप को समझ सकें, और उस आंतरिक शांति को प्राप्त कर सकें जो जीवन के हर पल में विद्यमान है।

समापन

मेरे प्यारे मित्रों, इस प्रवचन के माध्यम से मैंने आपको एक ऐसे दृष्टिकोण से परिचित कराने का प्रयास किया है जो आपको बाहरी लालच के उस जाल से मुक्त होने में मदद कर सके। याद रखिए, जीवन में असली खुशी का अनुभव तब होता है जब आप अपने अंदर की शांति को पहचान लेते हैं। बाहरी वस्तुओं के मोह में पड़कर आप केवल क्षणिक सुख ही पा सकते हैं, लेकिन वह सुख हमेशा के लिए नहीं रहता।

आपको यह समझने की जरूरत है कि प्रत्येक सुख और प्रत्येक दुःख एक संदेश लेकर आते हैं। यह संदेश आपको बताता है कि असली खुशी बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आपके भीतर की आत्मिक शांति में है। यह वह शांति है जो किसी भी लालच या अपेक्षा से ऊपर है। जब आप इस शांति को अपनाते हैं, तो आप न केवल बाहरी दुखों से मुक्त हो जाते हैं, बल्कि एक ऐसा जीवन जीते हैं जो वास्तव में पूर्ण और संतुलित होता है।

इसलिए, आज से ही अपने जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत करें। बाहरी लालच को त्यागें, अपने मन के उस अज्ञात क्षेत्र में उतरें जहाँ आपकी आत्मा निवास करती है, और उस असीम शांति को महसूस करें जो आपके अंदर है। यही वह मार्ग है, जो आपको असली सुख की ओर ले जाएगा – एक ऐसा सुख जो कभी नहीं खोने वाला, शाश्वत है।

आप सभी को मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं। चलिए, एक साथ मिलकर उस आंतरिक यात्रा पर निकलते हैं, जहाँ हम अपने असली स्व का अनुभव करें, और एक सच्चे, संतुलित और प्रेममय जीवन का निर्माण करें।

ध्यानार्थ

यदि कभी आपको लगे कि बाहरी सुख की खोज में आप खो गए हैं, तो बस एक गहरी सांस लें, अपने मन को शांत करें, और याद करें कि असली सुख आपके अंदर ही छिपा है। यही वह शक्ति है जो आपको हर तूफान से उबार सकती है। हर बार जब आप अपने अंदर झाँकेंगे, तब आपको उस असीम शांति का अनुभव होगा जो आपके भीतर है। यह शांति आपको बताती है कि बाहरी लालच केवल एक भ्रम है, और सच्चा आनंद केवल स्वयं की खोज में ही निहित है।

आज से ही, अपने जीवन में ध्यान, स्वीकृति, और आत्म-संवाद को अपनाएं। बाहरी वस्तुओं से परे जाकर अपने अंदर की उस अनंत शांति को खोजें, जो हमेशा से आपके साथ थी। यही वह मार्ग है, जो आपको जीवन के हर मोड़ पर सच्चे सुख की ओर ले जाएगा।

समापन की एक अंतिम पुकार

अब, अपने मन में यह विचार जगह दें – “मैं बाहरी सुख की लालसाओं से ऊपर उठकर अपनी आत्मा की शांति को महसूस करूंगा।” इस विचार को अपनाएं, इसे अपने हर दिन का मंत्र बनाएं। जब आप ऐसा करेंगे, तो आप पाएंगे कि आपके जीवन में जो भी दुःख और असंतोष था, वह धीरे-धीरे गायब होने लगेगा, और उसकी जगह एक स्थायी, शाश्वत सुख का अनुभव होने लगेगा।

मेरे प्रिय मित्रों, इस प्रवचन को अपने जीवन का एक आह्वान मानें – एक आह्वान अपने अंदर की उस गहरी शांति और प्रेम को जगाने का, जो बाहरी लालच के उस अंधेरे में कहीं छिपी हुई है। इस आह्वान को स्वीकार करें, अपने अंदर उतरें, और सच्चे, निरंतर आनंद का अनुभव करें।

इस प्रकार, "सुख का लालच ही नए दुख को जन्म देता है" – यह कथन आपको याद दिलाता है कि बाहरी लालच से केवल क्षणिक सुख मिलता है, लेकिन असली, स्थायी सुख तो आपकी आत्मा में ही है। जब आप उस सुख को खोजते हैं, तब आपको समझ आता है कि जीवन का असली उद्देश्य बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आपके अंदर के उस अनंत शांति में है।

आइए, हम सभी इस सत्य को अपनाएं, बाहरी लालच को त्यागें, और अपने अंदर की उस अमर ज्योति को जगाएं, जो जीवन के हर पल में प्रकाशमान रहती है। यही वह मार्ग है, जिसके द्वारा हम वास्तव में मुक्त हो सकते हैं – मुक्त उन सभी लालसाओं से, जो हमें केवल दुख में बाँधती हैं, और मुक्त एक सच्चे, प्रेमपूर्ण, और संतुलित जीवन की ओर अग्रसर होती हैं।

धन्यवाद।

यह प्रवचन आपके जीवन में एक नए दृष्टिकोण का सूत्रपात करे, आपके अंदर की उस असीम शांति को उजागर करे, और आपको बाहरी लालच के उस भ्रम से परे एक वास्तविक, स्थायी सुख की ओर ले जाए।

जय हो उस शांति की, जो आपके अंदर हमेशा से विद्यमान है, और जय हो उस आत्मा की, जो हर पल आपको अपने अस्तित्व का सच्चा अनुभव कराती है।

कोई टिप्पणी नहीं:

Blogger द्वारा संचालित.