नीचे ओशो के उद्धरण "शुद्ध का अर्थ है स्वभाव में होना, अशुद्ध का अर्थ है प्रभाव में होना" का एक विस्तृत प्रवचन प्रस्तुत है, जो आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से इस कथन का विश्लेषण करता है। यह प्रवचन न केवल गहन आत्मचिंतन के लिए आमंत्रण है, बल्कि आंतरिक शुद्धता की ओर अग्रसर होने के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।
प्रस्तावना
ओशो, जिन्हें मिस्ट्री और आध्यात्मिक चिंतन के लिए जाना जाता है, ने अपने जीवनकाल में मानव स्वभाव, चेतना और सामाजिक संरचनाओं पर गहरी विचारधारा प्रस्तुत की। उनका यह उद्धरण – "शुद्ध का अर्थ है स्वभाव में होना, अशुद्ध का अर्थ है प्रभाव में होना" – हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमारी वास्तविकता कहाँ निहित है और किस प्रकार बाहरी प्रभाव हमारे स्वाभाविक अस्तित्व को बदल देते हैं। यहाँ 'शुद्ध' का तात्पर्य है हमारे मौलिक स्वभाव से, यानी उस अनछुए, अछूते और प्राकृतिक रूप से उपस्थित अवस्था से, जो हम जन्मजात लेकर आते हैं। वहीं, 'अशुद्ध' का मतलब है उन प्रभावों से, जो बाहरी समाज, परिवार, संस्कृति, शिक्षा और अनुभवों द्वारा हम पर डाले जाते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण
1. स्वभाव की खोज
आध्यात्मिकता का मूल उद्देश्य आत्मा की खोज करना है – उस अद्वितीय सत्य तक पहुंचना, जो हमारे भीतर है। जब हम कहते हैं कि "शुद्ध का अर्थ है स्वभाव में होना", तो हम यह कह रहे हैं कि हमारा असली अस्तित्व, हमारा आत्मस्वरूप, बाहरी दुनिया के परिवर्तनों से मुक्त है। यह एक ऐसी अवस्था है जहाँ व्यक्ति अपने अंदर की आंतरिक शांति, प्रेम और आनंद का अनुभव करता है। ओशो के अनुसार, यह शुद्धता हमारे भीतर निहित है, जिसे खोजने के लिए हमें बाहरी अवरोधों और प्रभावों को त्यागना होता है।
2. प्रभावों का त्याग
अशुद्धता या बाहरी प्रभावों का मतलब है – वह सारी चीजें जो हमारे स्वभाव को छेड़छाड़ करती हैं। ये प्रभाव विभिन्न स्रोतों से आते हैं: परिवार, समाज, मीडिया, शिक्षा, राजनीति, धर्म आदि। जब व्यक्ति इन प्रभावों के अधीन हो जाता है, तो वह अपने मूल स्वरूप से दूर हो जाता है और बाहरी अपेक्षाओं तथा मान्यताओं के अनुरूप जीवन जीने लगता है। आध्यात्मिक दृष्टि से, यह एक तरह का मोह है, जिसमें व्यक्ति वास्तविकता के उस स्वरूप को भूल जाता है, जो उसके भीतर है।
3. आत्मचिंतन और ध्यान
आध्यात्मिक साधना का एक महत्वपूर्ण पहलू है आत्मचिंतन और ध्यान। जब हम ध्यान की क्रिया में बैठते हैं, तो हमारे मन में चल रहे विभिन्न प्रभावों – चाहे वे विचार हों या भावनाएँ – धीरे-धीरे शांत होने लगते हैं। इस अवस्था में हम अपने स्वभाव का अनुभव करते हैं। ध्यान के माध्यम से हम बाहरी प्रभावों के शोर को पीछे छोड़, अपने भीतर की आवाज़ सुन पाते हैं। ओशो अक्सर ध्यान को “आंतरिक स्वतंत्रता की कुंजी” कहकर संबोधित करते हैं, क्योंकि ध्यान से हम अपने वास्तविक स्वभाव तक पहुँच सकते हैं।
4. अनंत चेतना की अनुभूति
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, जब व्यक्ति अपने स्वभाव में रहता है, तो वह एक अनंत चेतना के साथ जुड़ जाता है। यह चेतना उसे सम्पूर्णता, एकता और प्रेम की अनुभूति कराती है। इस अवस्था में व्यक्ति न केवल स्वयं से, बल्कि पूरे ब्रह्मांड से जुड़ा हुआ महसूस करता है। यह अनुभव किसी भी बाहरी प्रभाव या सामाजिक बंधन से परे होता है, और यही वह शुद्धता है जिसकी ओशो चर्चा करते हैं।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
1. व्यक्तित्व और आत्मा का संघर्ष
मनोविज्ञान में यह माना जाता है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व दो स्तंभों पर टिका होता है – एक है उसका आंतरिक स्वभाव और दूसरा है बाहरी प्रभावों का मिश्रण। जब व्यक्ति अपने स्वभाव में रहता है, तो वह अपने भीतर की स्वतंत्रता, रचनात्मकता और स्वाभाविकता को प्रकट करता है। लेकिन जब बाहरी प्रभावों का बोलबाला बढ़ जाता है, तो व्यक्ति उन प्रभावों के अनुसार व्यवहार करने लगता है, और उसका असली स्वरूप दब जाता है। यह आंतरिक संघर्ष अक्सर मानसिक तनाव, असंतोष और अस्थिरता का कारण बनता है।
2. समाजिक प्रोग्रामिंग और मनोवैज्ञानिक प्रभाव
मनुष्य बचपन से ही समाजिक प्रोग्रामिंग से गुजरता है। स्कूल, परिवार, और समाज सभी मिलकर हमें एक विशेष ढांचे में ढालने की कोशिश करते हैं। इस प्रक्रिया में व्यक्ति के स्वभाव को ढालने के लिए कई बार उसके मौलिक गुणों को दबा दिया जाता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, यह प्रक्रिया व्यक्ति के आत्म-सम्मान, निर्णय क्षमता और रचनात्मकता पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है। जब हम कहते हैं कि "अशुद्ध का अर्थ है प्रभाव में होना", तो यह दर्शाता है कि व्यक्ति ने समाजिक प्रोग्रामिंग के प्रभाव में आकर अपना स्वयं का असली व्यक्तित्व खो दिया है।
3. आत्म-स्वीकृति और आत्म-अन्वेषण
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से आत्म-स्वीकृति और आत्म-अन्वेषण दो महत्वपूर्ण कारक हैं, जो व्यक्ति को अपने स्वभाव में वापस लाने में सहायक होते हैं। जब हम अपने अंदर झाँकते हैं, अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों का विश्लेषण करते हैं, तो हमें समझ में आता है कि कौन से विचार हमारे अपने हैं और कौन से बाहरी प्रभावों का परिणाम हैं। इस आत्म-अन्वेषण की प्रक्रिया में व्यक्ति अपने वास्तविक स्वभाव से पुनः जुड़ता है, जो अंततः उसे मानसिक शुद्धता की ओर ले जाती है।
4. मन की शुद्धता और मानसिक स्वतंत्रता
मनोविज्ञान में एक और महत्वपूर्ण बिंदु है – मन की शुद्धता। जब व्यक्ति बाहरी प्रभावों से मुक्त होता है, तो उसका मन स्वच्छ और स्पष्ट हो जाता है। यह स्पष्टता उसे न केवल अपने विचारों और भावनाओं को सही ढंग से समझने में मदद करती है, बल्कि उसे जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण भी प्रदान करती है। इस मानसिक स्वतंत्रता के कारण व्यक्ति अधिक रचनात्मक, सहानुभूतिपूर्ण और संतुलित हो जाता है।
व्यावहारिक दृष्टिकोण
1. दैनिक जीवन में शुद्धता का महत्व
व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखें तो जीवन के हर क्षेत्र में शुद्धता का महत्व अत्यधिक है। चाहे वह कामकाज हो, पारिवारिक संबंध हों या सामाजिक गतिविधियाँ – जब व्यक्ति अपने स्वभाव में रहता है, तो वह अपने कार्यों में अधिक सच्चाई, ईमानदारी और स्पष्टता का परिचय देता है। उदाहरण के तौर पर, एक शिक्षक जो अपने स्वभाव में होता है, वह न केवल ज्ञान देने में सक्षम होता है, बल्कि अपने विद्यार्थियों के प्रति भी एक प्रेरणा स्रोत बन जाता है।
2. निर्णय लेने में स्वाभाविकता
जब व्यक्ति बाहरी प्रभावों के बजाय अपने स्वभाव के अनुरूप निर्णय लेता है, तो उसके निर्णय अधिक स्पष्ट और सटीक होते हैं। व्यावहारिक जीवन में ऐसे निर्णय लेना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि बाहरी दबावों और अपेक्षाओं के कारण अक्सर व्यक्ति ऐसे निर्णय लेता है, जो उसके दीर्घकालिक हित में नहीं होते। उदाहरण के तौर पर, एक व्यवसायी जो समाजिक दबाव से प्रभावित होकर निर्णय लेता है, वह अक्सर अल्पकालिक लाभ के लिए अपनी आंतरिक आवाज़ को दबा देता है। वहीं, वही व्यक्ति यदि अपने स्वभाव में रहे, तो वह ऐसे निर्णय लेगा जो न केवल उसके व्यवसाय को स्थायित्व प्रदान करेंगे, बल्कि उसके व्यक्तिगत संतुलन को भी बनाए रखेंगे।
3. संबंधों में प्रामाणिकता
संबंधों में भी शुद्धता का महत्वपूर्ण स्थान है। जब हम अपने स्वभाव के अनुरूप होते हैं, तो हमारे संबंध अधिक प्रामाणिक, सच्चे और संतुलित होते हैं। समाज के प्रभाव में आकर हम अक्सर उन रिश्तों को निभाते हैं, जिनमें दिखावा और अपेक्षाएं अधिक होती हैं। लेकिन जब हम अपने असली स्वभाव में रहते हैं, तो हम न केवल अपने आप को सही ढंग से प्रस्तुत करते हैं, बल्कि सामने वाले व्यक्ति के साथ भी एक गहरी और सच्ची बातचीत स्थापित कर पाते हैं। उदाहरण के तौर पर, एक दोस्ती या पारिवारिक संबंध, जिसमें दोनों व्यक्ति अपने स्वभाव में होते हैं, वह समय की कसौटी पर खरी उतरती है और जीवन भर चलती है।
4. कार्यक्षेत्र में आंतरिक शुद्धता
कार्यस्थल पर भी व्यक्ति का स्वभाव और बाहरी प्रभावों का मिश्रण उसकी कार्यक्षमता को प्रभावित करता है। एक कर्मचारी जो अपने स्वभाव के अनुरूप कार्य करता है, वह अपने काम में नयी ऊँचाइयों तक पहुँच सकता है, क्योंकि वह पूरी तरह से अपने अंदर के रचनात्मक और प्रेरणादायक गुणों का उपयोग कर पाता है। वहीं, यदि वह बाहरी दबावों के प्रभाव में आकर काम करता है, तो उसका काम रुटीन में बदल जाता है और उसकी कार्यक्षमता में गिरावट आ जाती है। ऐसे में अपने स्वभाव में रहकर काम करना, नई सोच, नवाचार और व्यक्तिगत विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
आंतरिक शुद्धता बनाए रखने के उपाय
अब जबकि हमने समझ लिया है कि शुद्धता का संबंध हमारे स्वभाव में निहित है और अशुद्धता बाहरी प्रभावों के कारण उत्पन्न होती है, तो आइए देखें कि जीवन में आंतरिक शुद्धता बनाए रखने के लिए क्या-क्या उपाय किए जा सकते हैं।
1. नियमित ध्यान और मेडिटेशन
ध्यान और मेडिटेशन वह साधन हैं जो व्यक्ति को बाहरी प्रभावों के शोर से अलग, अपने अंदर की शांति और स्पष्टता का अनुभव करने में मदद करते हैं। दैनिक ध्यान से मन शांत होता है, और बाहरी विचारों के प्रभाव धीरे-धीरे कम हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, सुबह उठकर 15-20 मिनट का ध्यान करना, या शाम के समय कुछ मिनटों के लिए शांत मन से बैठना – ये साधारण उपाय व्यक्ति को अपने स्वभाव से जोड़ते हैं।
2. आत्म-चिंतन और स्व-समीक्षा
आत्म-चिंतन का अभ्यास व्यक्ति को अपनी आंतरिक दुनिया से जोड़ता है। दिन के अंत में कुछ मिनट अपने दिन भर के कार्यों, विचारों और भावनाओं का विश्लेषण करना, यह जानने का प्रयास करना कि किन परिस्थितियों में हम बाहरी प्रभावों के अधीन हो गए, और किन मौकों पर हमने अपने स्वभाव की अभिव्यक्ति की – यह आत्म-समीक्षा हमें आगे बढ़ने में मार्गदर्शन करती है। एक जर्नल लिखना या स्वयं से संवाद करना भी इस प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।
3. सकारात्मक और प्रेरणादायक संगति
जीवन में संगति का बहुत महत्व है। ऐसे लोगों के साथ समय बिताएं जो स्वयं अपने स्वभाव में रहते हैं, जो प्रेरणा का स्रोत हों। सकारात्मक संगति से बाहरी प्रभावों का नकारात्मक प्रभाव कम होता है और व्यक्ति को अपने स्वभाव में बने रहने में सहायता मिलती है। उदाहरण के तौर पर, ऐसे मित्रों के साथ समय बिताएं जो ईमानदार, आत्म-स्वीकृत और प्रेरणादायक हों।
4. समाजिक मीडिया और बाहरी सूचना के चयन
आज के डिजिटल युग में, समाजिक मीडिया और विभिन्न सूचना स्रोतों का अत्यधिक प्रभाव है। हमें चाहिए कि हम ऐसे मीडिया और सूचना स्रोतों का चयन करें जो सकारात्मक हों और हमारे अंदर के स्वभाव को बढ़ावा दें, न कि उसे विकृत करें। समय-समय पर डिजिटल डिटॉक्स, या कुछ समय के लिए अपने आप को इन प्रभावों से दूर रखना भी एक अच्छा उपाय है।
5. स्व-संयम और नियमित अभ्यास
बाहरी प्रभावों से दूर रहने के लिए स्व-संयम अत्यंत आवश्यक है। अपने आप को लगातार याद दिलाना कि हम कौन हैं, हमारा मूल स्वभाव क्या है – यह स्व-संयम हमें अपने भीतर की शुद्धता बनाए रखने में सहायक होता है। नियमित रूप से योग, प्राणायाम और शारीरिक व्यायाम भी मानसिक और शारीरिक शुद्धता प्रदान करते हैं।
6. रचनात्मकता और स्वयं की अभिव्यक्ति
अपने अंदर की रचनात्मकता को प्रकट करने के लिए कला, संगीत, लेखन या अन्य रचनात्मक गतिविधियों में संलग्न होना भी एक अत्यंत प्रभावी उपाय है। जब हम अपनी रचनात्मक ऊर्जा को व्यक्त करते हैं, तो हम अपने स्वभाव को उजागर करते हैं और बाहरी प्रभावों से एक कदम आगे बढ़ते हैं। उदाहरण के तौर पर, एक चित्रकार जब अपनी भावनाओं को चित्रों के माध्यम से व्यक्त करता है, तो वह अपने स्वभाव की सच्चाई को प्रकट करता है।
7. प्राकृतिक परिवेश के संपर्क में रहना
प्रकृति का सान्निध्य भी हमें हमारे स्वभाव के करीब लाता है। जंगलों में टहलना, पहाड़ों की शांति, नदियों की कलकल – ये सभी अनुभव हमें उस मौलिक शांति और संतुलन का अनुभव कराते हैं, जो हमारे अंदर निहित है। प्रकृति के साथ नियमित संपर्क में रहने से हम बाहरी प्रभावों से दूर, अपने स्वभाव में अधिक स्थिरता पा सकते हैं।
आंतरिक शुद्धता का महत्व और उसके लाभ
1. आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान
जब व्यक्ति अपने स्वभाव में रहता है, तो उसका आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। बाहरी प्रभावों से मुक्त होकर, व्यक्ति अपने अंदर की अनंत संभावनाओं का अनुभव करता है। इस अनुभव से वह जानता है कि वह किसी भी परिस्थिति में अपने आप को संभाल सकता है। इससे उसके निर्णय और क्रियाकलाप भी अधिक स्पष्ट होते हैं।
2. मानसिक शांति और संतुलन
आंतरिक शुद्धता प्राप्त करने से मन में एक स्थिरता और शांति आती है। मानसिक संतुलन के कारण व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में अधिक केंद्रित और प्रभावी होता है। जब मन शांत होता है, तो व्यक्ति न केवल अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर पाता है, बल्कि जीवन की चुनौतियों का भी साहसपूर्वक सामना कर पाता है।
3. स्वस्थ संबंध और सामाजिक सामंजस्य
एक व्यक्ति जो अपने स्वभाव में होता है, उसके संबंध अधिक प्रामाणिक और गहरे होते हैं। वह बिना किसी दिखावे के, सच्चे और स्वाभाविक तरीके से लोगों से जुड़ता है। ऐसे संबंधों में पारदर्शिता, समझदारी और सहानुभूति होती है, जो सामाजिक सामंजस्य को भी बढ़ावा देती है।
4. रचनात्मकता और नवाचार
जब व्यक्ति बाहरी प्रभावों के बोझ से मुक्त होता है, तो उसकी रचनात्मकता खुल जाती है। आंतरिक शुद्धता से वह नई सोच और नवाचार की ओर अग्रसर होता है। यह न केवल व्यक्तिगत विकास के लिए आवश्यक है, बल्कि समाज और कार्यक्षेत्र में भी सकारात्मक बदलाव का स्रोत बनता है।
निष्कर्ष: आत्मचिंतन और आत्मसाक्षात्कार के लिए प्रेरणा
ओशो का यह उद्धरण हमें एक गहरी सीख देता है – शुद्धता का अर्थ है अपने स्वभाव में होना, अर्थात् अपने भीतर निहित सच्चे स्व को पहचानना और अपनाना। जबकि बाहरी प्रभावों से उत्पन्न अशुद्धता हमें उस असली स्वरूप से दूर कर देती है, जिससे हमारा आत्मसाक्षात्कार संभव हो सके। आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से, यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि बाहरी दुनिया के प्रभाव कितने भी प्रबल क्यों न हों, हमारी आंतरिक शुद्धता सदैव हमारे भीतर ही विद्यमान रहती है।
जब हम ध्यान, आत्म-चिंतन, सकारात्मक संगति, और रचनात्मकता के माध्यम से अपने स्वभाव से जुड़े रहते हैं, तो हम न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन में संतुलन और शांति प्राप्त करते हैं, बल्कि समाज में भी एक सकारात्मक बदलाव का संदेश फैलाते हैं। इस प्रवचन के माध्यम से मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि आप अपने भीतर झाँकें, अपने स्वभाव की खोज करें, और बाहरी प्रभावों के मोह से मुक्त होकर अपने असली अस्तित्व का अनुभव करें। याद रखिए, जब आप अपने स्वभाव में होते हैं, तो आप न केवल स्वयं के प्रति सच्चे रहते हैं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड के साथ एक अनंत और अद्भुत संबंध स्थापित करते हैं।
हर दिन का एक छोटा सा कदम – चाहे वह ध्यान की एक सत्र हो, कुछ समय प्रकृति में बिताना हो या आत्म-चिंतन के लिए एक शांत कोना ढूँढना – आपको उस शुद्धता के करीब लाने में सहायक होगा, जो आपके अंदर छिपी हुई है। यही वह मार्ग है जो आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाता है, जहां आप समझ पाते हैं कि बाहरी दुनिया कितनी भी उलझी हुई क्यों न हो, आपका असली अस्तित्व हमेशा स्थिर, शुद्ध और अटूट है।
इस प्रवचन से आपसे यही अपेक्षा की जाती है कि आप अपने दैनिक जीवन में इस शुद्धता को अपनाएं, बाहरी प्रभावों को पहचानें और उनसे अपनी आंतरिक स्वतंत्रता को बरकरार रखें। अपने स्वभाव में लौटने की यह यात्रा न केवल आपके व्यक्तिगत विकास का मार्ग है, बल्कि यह समाज में भी सच्चे परिवर्तन का बीज बोती है। जब आप आत्मचिंतन और आत्मसाक्षात्कार की दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो आप न केवल अपने लिए, बल्कि अपने आस-पास के लोगों के लिए भी एक प्रेरणा का स्रोत बन जाते हैं।
अंत में, यह समझना आवश्यक है कि बाहरी प्रभाव हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं पर गहरा असर डालते हैं, लेकिन हमारी आंतरिक शुद्धता – हमारा वास्तविक स्वभाव – हमेशा हमारे भीतर विद्यमान रहता है। यही वह सत्य है जिसे अपनाकर हम न केवल एक अधिक संतुलित और शांत जीवन जी सकते हैं, बल्कि अपने अस्तित्व की वह अनंत गहराई भी अनुभव कर सकते हैं, जो हमें सम्पूर्णता, प्रेम और एकता का अनुभव कराती है।
इस प्रकार, ओशो के उद्धरण के द्वारा हमें यह संदेश मिलता है कि अपने स्वभाव में रहना और बाहरी प्रभावों को पहचानना ही वास्तविक स्वतंत्रता है। चलिए, आज से ही हम अपने अंदर झांकें, अपने स्वभाव को पहचानें, और बाहरी प्रभावों के जाल से बाहर निकलकर एक शुद्ध, सच्चे और प्रामाणिक जीवन की ओर कदम बढ़ाएं। यही हमारी आत्मा का सच्चा स्वरूप है, यही हमारी वास्तविक पहचान है, और यही हमें सम्पूर्णता की ओर ले जाने वाला मार्ग है।
समापन
यह प्रवचन – आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से – हमें यह स्पष्ट करता है कि वास्तविक शुद्धता हमारे स्वभाव में निहित है और बाहरी प्रभावों के प्रभाव में आकर हम अपने सच्चे अस्तित्व से दूर हो जाते हैं। अपने स्वभाव की खोज करना, उसे अपनाना और बाहरी प्रभावों को पहचानकर उनसे मुक्त होना ही वह मार्ग है जो हमें आत्म-साक्षात्कार और सम्पूर्णता की ओर ले जाता है।
इस मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक है कि हम नियमित ध्यान, आत्म-चिंतन, सकारात्मक संगति, प्राकृतिक वातावरण, और रचनात्मक अभिव्यक्ति को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। इससे न केवल हम अपने अंदर की शुद्धता को बनाए रख पाएंगे, बल्कि बाहरी दुनिया के अशुद्ध प्रभावों से भी स्वतन्त्र होकर एक अधिक संतुलित और पूर्ण जीवन जी पाएंगे।
आइए, हम सब इस संदेश को आत्मसात करें, अपने भीतर के स्वभाव की खोज करें, और बाहरी प्रभावों के जाल को तोड़कर एक सच्चे, शुद्ध और स्वतंत्र अस्तित्व की ओर अग्रसर हों। यही वह दिशा है जो न केवल हमारे व्यक्तिगत जीवन को सशक्त बनाएगी, बल्कि सम्पूर्ण समाज में सकारात्मक परिवर्तन की लहर भी पैदा करेगी।
यह प्रवचन आप सभी को आत्मचिंतन और आत्मसाक्षात्कार की ओर प्रेरित करे, ताकि हम सभी अपने असली स्वभाव की ओर लौट सकें और बाहरी प्रभावों से उत्पन्न अशुद्धता को दूर करके एक शुद्ध, संतुलित और प्रेरणादायक जीवन जी सकें।
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