"प्रेम स्वभाव की बात है, संबंध की बात नहीं है। जो सबके प्रति प्रेमपूर्ण नहीं है, वह किसी के भी प्रति प्रेमपूर्ण नहीं हो सकता" पर आधारित है। यह प्रवचन आज के जीवन के भ्रमों, संबंधों के जाल और उस अनंत प्रेम के संदेश को उजागर करता है जो हमारी भीतरी प्रकृति में विद्यमान है।
प्रस्तावना
मेरे प्रिय साथियों,
आज हम एक ऐसे रहस्य की ओर चलने जा रहे हैं, जिसे समझना आसान नहीं, परन्तु अनुभव करना अनिवार्य है। यह रहस्य है – प्रेम। हम अक्सर प्रेम को किसी संबंध, किसी दूसरे व्यक्ति के साथ जोड़कर देखते हैं। परन्तु यह भ्रम है। प्रेम वास्तव में हमारे भीतर जन्म लेता है, एक स्वाभाविक स्थिति है, जो बाहरी संबंधों से ऊपर उठकर सम्पूर्ण विश्व में फैलता है। जब आप अपने अंदर उस प्रेम को महसूस नहीं करते, तो आप कभी भी दूसरों के प्रति सच्चे प्रेम का अनुभव नहीं कर सकते। यही कारण है कि ओशो कहते हैं, "प्रेम स्वभाव की बात है, संबंध की बात नहीं।"
प्रेम का स्वभाव – एक अंतर्मुखी यात्रा
सोचिए, यदि हम प्रेम को केवल एक संबंध के रूप में देखते हैं, तो हम उस अनंतता, उस अपार शक्ति को अनदेखा कर देते हैं जो हमारे अंदर मौजूद है। प्रेम एक ऐसी अनुभूति है, जो हमारे अस्तित्व की गहराइयों से उठकर सामने आती है। यह कोई बहरी वस्तु नहीं है, कोई उपहार नहीं जो हमें किसी से मिलते ही प्राप्त हो जाए। प्रेम वह प्रकाश है जो हमारे अंदर से निकलता है – एक प्रकाश जो हमारे अंदर के अंधकार को दूर कर देता है।
जब हम कहते हैं कि प्रेम स्वभाव की बात है, तो इसका मतलब है कि यह हमारी आत्मा का मूल गुण है। यह गुण किसी शर्त, किसी परिस्थिति से बाधित नहीं होता। यह निर्भर करता है हमारे स्वयं के अस्तित्व पर, हमारे अंदर की शुद्धता पर। अगर आप स्वयं में प्रेम का बीज बोएंगे, तो फलस्वरूप आपका प्रत्येक कण उस प्रेम से भर जाएगा। यह प्रेम उस समय प्रकट होता है, जब हम अपने अहंकार, अपने द्वंद्वों को त्याग कर अपने वास्तविक स्व से मिलते हैं।
ओशो कहते हैं कि प्रेम केवल संबंधों में नहीं पाया जा सकता, क्योंकि संबंध तो एक आर्टिफिशियल बंधन है। संबंधों में अक्सर अपेक्षाएँ, आशाएँ और कभी-कभी नाकारात्मकताएँ भी शामिल हो जाती हैं। इन सबके बीच में असली प्रेम कहीं खो जाता है। असली प्रेम तो निर्लिप्त है, निरपेक्ष है – यह बिना किसी शर्त के हर किसी में समान रूप से प्रवाहित होता है।
संबंधों का भ्रम और प्रेम की वास्तविकता
आज के इस दौर में हम सभी संबंधों के जाल में उलझे हुए हैं। प्रेम कहां है? हम अपनी इच्छाओं, अपेक्षाओं और सामाजिक बंधनों में इतने फंस चुके हैं कि वास्तविक प्रेम कहीं खो सा गया है। जब हम किसी व्यक्ति से प्रेम करते हैं, तो अक्सर हम उससे कुछ मांगने लगते हैं – एक आदर्श, एक उम्मीद, एक प्रतिबद्धता। लेकिन जब आप किसी से केवल अपेक्षाएँ रखते हैं, तो समझिए कि आप प्रेम के सबसे सच्चे स्वरूप से दूर जा रहे हैं।
संबंध हमें बाँधते हैं, परन्तु यह बाँधन भी अस्थायी है। यह एक प्रकार का सामाजिक अनुबंध है, जिसमें हम अपने स्वार्थों, अपने लाभों की आशा रखते हैं। ओशो ने हमेशा कहा है कि जब तक हम संबंधों में उलझे रहेंगे, तब तक हम उस वास्तविक प्रेम का अनुभव नहीं कर सकते जो हमारे अंदर से निकलता है।
इसलिए, जब हम कहते हैं कि "जो सबके प्रति प्रेमपूर्ण नहीं है, वह किसी के भी प्रति प्रेमपूर्ण नहीं हो सकता", तो इसका मतलब है कि यदि आपके भीतर वह स्वाभाविक, अटूट प्रेम नहीं है जो सम्पूर्ण जगत के लिए है, तो आप किसी एक व्यक्ति के प्रति भी सच्चा प्रेम नहीं कर सकते। सच्चा प्रेम वह है जो किसी व्यक्ति, किसी विशेष संबंध तक सीमित नहीं रहता। यह एक सार्वभौमिक अनुभूति है, जो सम्पूर्ण अस्तित्व में फैल जाती है।
आत्मा और प्रेम – दो अविभाज्य तत्व
दोस्तों, प्रेम और आत्मा दो ऐसे तत्व हैं जिनके बिना जीवन अधूरा है। जब हम अपनी आत्मा की गहराई में उतरते हैं, तो हमें पता चलता है कि हम सब एक ही स्रोत से निकले हैं। इस बात की अनुभूति ही सच्चे प्रेम की शुरुआत है। ओशो कहते हैं कि प्रेम का अनुभव तभी होता है, जब हम स्वयं को उस विशाल अंतरात्मा से जोड़ लेते हैं।
अपने भीतर झांकिए – क्या आपने कभी महसूस किया है कि आपकी आत्मा में अनंत प्रेम विद्यमान है? जब आप ध्यान करते हैं, जब आप मौन में बैठते हैं, तो वह शांति, वह प्रेम आपको अपने आप में समाहित कर लेता है। यह प्रेम किसी भी बाहरी संबंध से परे है। यह प्रेम स्वभाविक है, निरपेक्ष है, और यही वास्तविकता है।
आप जब इस अंतरतम प्रेम को पहचान लेते हैं, तब आपको किसी भी रिश्ते, किसी भी संबंध में वह झंझट, वह अपेक्षाएँ महसूस नहीं होतीं। आप देखते हैं कि सब कुछ एक-दूसरे में विलीन हो रहा है। यह वह अवस्था है, जहाँ प्रेम स्वयं एक रूप ले लेता है, बिना किसी बाहरी निर्भरता के। इसी स्थिति में, आप प्रत्येक व्यक्ति में अपना प्रतिबिंब देखते हैं, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में वही दिव्यता विद्यमान है।
व्यक्तिगत प्रेम से सार्वभौमिक प्रेम तक
आजकल हम प्रेम को अक्सर व्यक्तिगत, निजी संबंधों तक सीमित कर देते हैं। हम सोचते हैं कि प्रेम केवल रोमांटिक संबंधों, पारिवारिक संबंधों या मित्रता में ही मिल सकता है। लेकिन इस सोच में एक गहरी भूल निहित है।
जब हम केवल अपने करीबी संबंधों में प्रेम की अपेक्षा करते हैं, तो हम बाहरी संसार के उस विशाल प्रेम को अनदेखा कर देते हैं जो सम्पूर्ण जीवित जगत में फैला हुआ है। प्रेम व्यक्तिगत स्तर से आरंभ होता है, परन्तु उसका स्वरूप सार्वभौमिक है। जब आप अपने अंदर के प्रेम को उजागर करते हैं, तो आप पाते हैं कि वह प्रेम किसी भी सीमा, किसी भी भेदभाव से मुक्त है।
ओशो की शिक्षाएँ हमें यही बताती हैं कि यदि आप सभी प्राणियों के प्रति एक समान प्रेम नहीं विकसित कर पाते, तो आप किसी भी व्यक्ति के प्रति सच्चे प्रेम का अनुभव नहीं कर सकते। क्योंकि प्रेम एक ऐसा स्रोत है, जो सम्पूर्ण अस्तित्व में समान रूप से प्रवाहित होता है। यह न तो सीमित है, न ही किसी विशेष संबंध तक बंधा है। यह तो एक प्रवाही ऊर्जा है, जो हर जीवित प्राणी में विद्यमान है।
जब हम अपने अंदर के उस प्रेम को पहचान लेते हैं, तो हम अपने आप को सम्पूर्ण मानवता के साथ जोड़ लेते हैं। हम देखते हैं कि हर जीव, हर प्राणी, हर फूल और हर पत्ता उस अनंत प्रेम का एक अंश है। यही वह दृश्य है जो हमारे दिल को छू जाता है, हमारे मन को शांत कर देता है, और हमें एक नई दृष्टि से जीवन देखने का संदेश देता है।
समाज, संस्कृति और प्रेम के भ्रम
समाज और संस्कृति अक्सर प्रेम को एक निश्चित रूप में बंधित कर देते हैं। विवाह, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, सामाजिक अपेक्षाएँ – ये सब प्रेम के उस स्वाभाविक प्रवाह को बाधित करते हैं। हम अक्सर अपने दिल में यह सोच रखते हैं कि प्रेम को पाने के लिए हमें पहले एक निश्चित मानदंडों को पूरा करना होगा।
लेकिन ओशो हमें सिखाते हैं कि प्रेम स्वाभाविक है, यह किसी बाहरी अनुबंध या बंधन से नहीं जुड़ा होता। समाज हमें नियम सिखाता है, परन्तु प्रेम वह नियम नहीं मानता। प्रेम में कोई शर्तें नहीं होतीं, न ही कोई बाधाएँ। यह तो निरंतर, निर्बाध और अपार है।
जब हम सामाजिक बंधनों को त्याग कर अपने भीतर के उस प्रेम को पहचान लेते हैं, तो हम पाते हैं कि हमारे जीवन में एक अद्भुत शांति और संतोष का अनुभव होता है। यह शांति उस प्रेम से आती है, जो बिना किसी शर्त के, बिना किसी अपेक्षा के है। यही वह प्रेम है जो सम्पूर्ण जीवों में समान रूप से प्रवाहित होता है।
समाज की अपेक्षाएँ, संस्कृति के बंधन – ये सब केवल बाहरी आवरण हैं। जब आप अपने अंदर झांकेंगे, तो आपको पता चलेगा कि सच्चे प्रेम का स्रोत इन सबके पार है। यह स्रोत है आपके भीतर की आत्मा, जो अनंत प्रेम से परिपूर्ण है।
प्रेम की अनुभूति – ध्यान, मौन और स्वयं की खोज**
मित्रों, प्रेम का अनुभव करने के लिए बाहरी दुनिया में नहीं जाना पड़ता। यह अनुभव आपके भीतर ही मौजूद है। ध्यान की प्रथा, मौन की साधना, और स्वयं की खोज के माध्यम से आप उस प्रेम तक पहुँच सकते हैं जो हर जीव में प्रवाहित होता है।
जब आप ध्यान करते हैं, तो आपके मन के सारे अशांति, अशुद्धि दूर हो जाती हैं। उस मौन में, आप अपने अंदर के उस प्रेम को महसूस कर पाते हैं जो सदियों से आप में छुपा हुआ है। यह प्रेम किसी भी बाहरी वस्तु, किसी भी व्यक्ति की अपेक्षा से ऊपर है। यह तो एक मौलिक स्थिति है, एक स्वाभाविक प्रकाश है, जो आपके अस्तित्व को भर देता है।
इस प्रकार के ध्यान और मौन में प्रवेश करने के बाद, आप देखेंगे कि आपके चारों ओर के सभी संबंध, सभी व्यक्ति, सभी प्राणी – सभी में वही प्रेम समाहित है। तब आप यह समझेंगे कि यदि आप सभी प्राणियों के प्रति प्रेमपूर्ण नहीं हो सकते, तो आप वास्तव में किसी एक व्यक्ति के प्रति सच्चे प्रेम का अनुभव कैसे कर सकते हैं?
यह वही सत्य है जो ओशो ने बार-बार दोहराया है। प्रेम केवल एक भावना नहीं है, यह एक अवस्था है, एक अनुभूति है, जो तब उत्पन्न होती है जब आप अपने भीतर के उस अनंत प्रेम को पहचान लेते हैं। यह अनुभव आपको बताता है कि आपके अंदर की शांति, आपकी आत्मा का प्रकाश, किसी भी बाहरी परिस्थिति से अधिक महत्वपूर्ण है।
अहंकार का त्याग और प्रेम की प्राप्ति
अक्सर हम अपने अंदर के अहंकार के कारण प्रेम के वास्तविक स्वरूप से दूर हो जाते हैं। हम स्वयं को दूसरों से अलग समझते हैं, अपने आप को श्रेष्ठ मानते हैं और इसी कारण से हम सच्चे प्रेम का अनुभव नहीं कर पाते।
ओशो का कहना है कि जब तक आप अपने अहंकार को त्याग नहीं करते, तब तक आप उस दिव्य प्रेम का अनुभव नहीं कर सकते जो आपकी आत्मा में विद्यमान है। अहंकार एक ऐसी दीवार है, जो आपको आपके अंदर के प्रेम से दूर कर देती है। यह दीवार न केवल आपके रिश्तों को प्रभावित करती है, बल्कि आपकी आत्मा को भी अंधकार में डूबा देती है।
अहंकार त्यागने का अर्थ है – अपने आप को समझना, अपने आप को जानना और यह स्वीकार करना कि हम सभी एक ही स्रोत से निकले हैं। जब आप यह समझते हैं कि आपके अंदर की आत्मा, वह अनंत प्रेम, किसी भी बाहरी बंधन से परे है, तभी आप सच्चे प्रेम का अनुभव कर सकते हैं। यह अनुभव आपको बताता है कि प्रेम कोई वांछनीय वस्तु नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक अवस्था है, जो आपके अस्तित्व में पहले से ही विद्यमान है।
प्रेम की शक्ति – परिवर्तन का अमृत
प्रेम में एक अद्भुत शक्ति होती है, मित्रों, जो हमारे जीवन को पूरी तरह से बदल देती है। जब आप अपने अंदर के प्रेम को पहचान लेते हैं, तो न केवल आपके रिश्ते बदल जाते हैं, बल्कि आपका सम्पूर्ण अस्तित्व परिवर्तित हो जाता है। यह परिवर्तन बाहरी संसार में भी परिलक्षित होता है।
सोचिए, यदि हर व्यक्ति अपने अंदर के उस प्रेम को पहचान लेता, तो दुनिया कितनी शांतिपूर्ण, कितनी सुंदर होती। प्रत्येक व्यक्ति में उस प्रेम की चमक होती है, जो न केवल उसे आत्मसात कर लेती है, बल्कि सम्पूर्ण मानवता में फैल जाती है। यही वह शक्ति है जो दुनिया को बदल सकती है।
प्रेम का यह परिवर्तनात्मक प्रभाव केवल आपके व्यक्तिगत जीवन में ही नहीं होता, बल्कि यह समाज, संस्कृति और सम्पूर्ण मानवता में भी एक नई ऊर्जा का संचार कर देता है। जब आप बिना किसी शर्त के सभी के प्रति प्रेम रखते हैं, तो आप उस दिव्य चेतना का अनुभव करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है। यह चेतना आपको बताती है कि आप अकेले नहीं हैं, कि आप सम्पूर्ण सृष्टि का एक अभिन्न अंग हैं।
आत्म-स्वीकृति और प्रेम का समागम
प्रेम की प्राप्ति के लिए सबसे पहले आपको स्वयं को स्वीकार करना होगा। हम सभी में कुछ न कुछ अपूर्णताएँ होती हैं, कुछ दोष होते हैं, परन्तु इन्हीं अपूर्णताओं में भी एक सुंदरता छिपी होती है। जब आप स्वयं को बिना किसी शर्त स्वीकार कर लेते हैं, तो आप उस प्रेम की अनुभूति कर सकते हैं, जो प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है।
ओशो हमेशा कहते हैं कि स्वयं को जानना, स्वयं को स्वीकार करना ही सबसे बड़ा प्रेम है। जब आप अपने आप से प्रेम करना सीख जाते हैं, तो आप दूसरों से भी प्रेम करने लगते हैं। यह प्रेम किसी तुलना, किसी मापदंड से परे होता है। यह तो एक मौलिक अनुभूति है, जो हर जीव में समान रूप से प्रकट होती है।
इसलिए, अपने आप को जानिए, अपने दोषों को स्वीकार कीजिए, क्योंकि इन्हीं अपूर्णताओं में वह अनंत प्रेम छिपा होता है। जब आप स्वयं के प्रति प्रेमपूर्ण हो जाते हैं, तो आप अपने आस-पास के सभी जीवों, सभी प्राणियों में उसी प्रेम को देखने लगते हैं। यही वह प्रेम है जो सम्पूर्ण मानवता का आधार है।
प्रेम – एक साहसिक यात्रा
प्रेम को अपनाना, उसे जीना कोई साधारण कार्य नहीं है। यह एक साहसिक यात्रा है, जो आपको आपकी आत्मा की गहराइयों में ले जाती है। इस यात्रा में आपको अपने सभी भय, अपने सभी संदेहों को त्यागना होगा। यह यात्रा आपको उस अज्ञात क्षेत्र में ले जाती है, जहाँ केवल प्रेम ही होता है।
जब आप इस यात्रा पर निकलते हैं, तो आपको समझ में आता है कि प्रेम किसी भौतिक वस्तु से अधिक है। यह एक आंतरिक अनुभूति है, जो आपके जीवन के हर क्षण में विद्यमान रहती है। यह यात्रा आपको स्वयं से मिलने का अवसर देती है, आपको उस अनंत प्रेम का अनुभव कराती है जो आपके भीतर ही छिपा हुआ है।
ओशो कहते हैं कि प्रेम वह मार्ग है, जिसके द्वारा आप अपने आप को सम्पूर्णता में देख सकते हैं। यह मार्ग कठिन जरूर है, परन्तु इसके अंत में आपको एक ऐसी शांति, एक ऐसा आनंद मिलता है, जो किसी भी भौतिक सुख से परे है। यह प्रेम का मार्ग है, जो आपको स्वयं की गहराई में ले जाता है, जहाँ आप प्रत्येक प्राणी में अपना प्रतिबिंब देख सकते हैं।
सर्वभौमिक प्रेम – एक आध्यात्मिक चेतना
जब आप अपने भीतर के उस प्रेम को पहचान लेते हैं, तो आपको यह एहसास होता है कि आप अकेले नहीं हैं। आप सम्पूर्ण जीवित जगत से जुड़े हुए हैं। यही वह आध्यात्मिक चेतना है, जो ओशो ने हमेशा परिलक्षित की है। यह चेतना आपको बताती है कि प्रत्येक प्राणी में वही दिव्यता, वही अनंत प्रेम विद्यमान है।
इस चेतना के साथ, कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार के बंधनों में नहीं बंधता। आप देखते हैं कि प्रेम केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण जीव, सम्पूर्ण प्रकृति में फैल जाता है। यह सार्वभौमिक प्रेम आपके भीतर से निकलता है और आपको एक नए दृष्टिकोण से जीवन देखने का अवसर देता है।
जब आप इस चेतना में जीना सीख लेते हैं, तो आपके लिए जीवन में कोई भी रिश्ता, कोई भी संबंध, बाधा नहीं रह जाती। आप प्रत्येक प्राणी में उसी दिव्यता को पहचानते हैं, जिसे आपने स्वयं में अनुभव किया है। यही वह प्रेम है जो हर किसी के प्रति समान रूप से प्रवाहित होता है।
प्रेम और जीवन के असली रंग
हमारे जीवन में कई बार हम ऐसा महसूस करते हैं कि प्रेम केवल बाहरी दुनिया में ही पाया जाता है – किसी व्यक्ति, किसी संबंध में। परन्तु, मित्रों, असली रंग वही है जो आपके भीतर के प्रेम से निकलता है। जीवन के हर रंग, हर अनुभव में उस प्रेम का एक अंश होता है। जब आप इस प्रेम को महसूस करते हैं, तो आप समझ जाते हैं कि प्रत्येक पल, प्रत्येक क्षण में जीवन एक अद्भुत अनुभव है।
ओशो का कहना है कि जब आप प्रेम के उस स्वाभाविक स्रोत से जुड़ जाते हैं, तो आपके लिए जीवन में कोई भी संघर्ष, कोई भी कठिनाई असल में महत्वपूर्ण नहीं रहती। आप देखते हैं कि जीवन अपने आप में एक अनंत संगीत है, जिसमें हर धुन, हर सुर में प्रेम छिपा होता है। यही वह संगीत है जो आपके हृदय को छू जाता है, आपके मन को प्रसन्न कर देता है।
जब आप इस संगीत को सुनते हैं, तो आपके लिए जीवन का हर अनुभव – चाहे वह सुख हो या दुःख – एक नई सीख लेकर आता है। यह सीख आपको बताती है कि प्रेम का प्रत्येक रूप, प्रत्येक आयाम में एक अद्भुत गहराई है। यह गहराई आपको उस सत्य से जोड़ती है, जो आपके अस्तित्व की आत्मा में बसी हुई है।
प्रेम का दार्शनिक पहलू और आधुनिक मनोविज्ञान
आधुनिक मनोविज्ञान भी अब यह समझने लगा है कि प्रेम केवल बाहरी संबंधों में ही नहीं पाया जा सकता। शोधकर्ता इस बात पर जोर देते हैं कि जब तक हम अपने भीतर की शांति, अपने भीतर के प्रेम को महसूस नहीं करते, तब तक हम किसी भी संबंध में सच्चा प्रेम प्रकट नहीं कर सकते।
ओशो की शिक्षाएँ इसी दार्शनिक सत्य को उजागर करती हैं। प्रेम वह अनंत शक्ति है, जो आपके मन, आपके हृदय, और आपकी आत्मा को एक साथ जोड़ देती है। यह शक्ति आपको बताती है कि आपके अंदर की ऊर्जा, आपकी भीतरी शुद्धता ही सम्पूर्ण जगत के लिए एक वरदान है।
जब आप अपने मन को शांत करते हैं, अपने भीतर की गहराई में उतरते हैं, तो आपको पता चलता है कि प्रेम किसी भी मनोवैज्ञानिक या सामाजिक सिद्धांत से परे है। यह तो एक मौलिक अनुभूति है, जो आपके अस्तित्व का मूल तत्व है। आधुनिक मनोविज्ञान जितना भी विकसित हो, यह उस गहन, आत्मिक प्रेम को समझने में उतना सक्षम नहीं हो पाता, जितना कि ओशो ने समझाया है।
इसलिए, जब आप अपने आप से प्रेम करते हैं, तो आप न केवल अपने मन, बल्कि सम्पूर्ण जगत के प्रति प्रेम की अनुभूति करने लगते हैं। यह प्रेम आपको एक नई दिशा देता है, एक नई चेतना से भर देता है, जो आपके जीवन को अद्भुत ढंग से परिवर्तित कर देता है।
प्रेम में निष्कपटता और सरलता
सच्चे प्रेम में कोई छल-प्रपंच नहीं होता, कोई मुखौटा नहीं होता। यह निष्कपटता है, यह सरलता है। जब आप अपने भीतर के उस प्रेम को पहचान लेते हैं, तो आप उस निष्कपटता को अपने जीवन में उतार लेते हैं। आप बिना किसी झंझट के, बिना किसी अपेक्षा के, हर किसी के साथ प्रेम करते हैं।
ओशो की यह शिक्षा हमें बताती है कि प्रेम केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक आंतरिक स्थिति है – एक अवस्था, जहाँ आप अपने आप से और सम्पूर्ण सृष्टि से एकाकार हो जाते हैं। इस अवस्था में कोई भी बाहरी बंधन आपको रोक नहीं सकता। आप देखते हैं कि प्रत्येक जीव में वही दिव्यता है, वही आत्मिक प्रकाश है।
जब आप निष्कपटता से प्रेम करते हैं, तो आप उस अटूट ऊर्जा का अनुभव करते हैं जो आपको सम्पूर्ण जगत से जोड़ देती है। यह ऊर्जा आपके भीतर के उस प्रेम को उजागर करती है, जो कभी भी सीमित नहीं होता, बल्कि अनंत रूप से फैलता है। यही वह प्रेम है, जो न केवल आपके व्यक्तिगत संबंधों में, बल्कि सम्पूर्ण मानवता में परिवर्तन का अमृत बन जाता है।
अंत में – प्रेम का सच्चा स्वरूप
मेरे प्रिय साथियों,
हमने आज प्रेम के विभिन्न आयामों, संबंधों से परे उसके स्वाभाविक स्वरूप और उस आध्यात्मिक चेतना के बारे में चर्चा की है, जो प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है। ओशो की यह वाणी हमें यह सिखाती है कि प्रेम केवल बाहरी संबंधों का नाम नहीं है, बल्कि यह आपके अंदर की एक गहराई है, जो सम्पूर्ण अस्तित्व में फैली हुई है।
यदि आप अपने अंदर के उस प्रेम को नहीं पहचानते, तो आप न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन में बल्कि सम्पूर्ण मानवता के साथ उस संबंध का अनुभव कैसे कर सकते हैं, जिसकी अपेक्षा आप करते हैं? प्रेम का वास्तविक स्वरूप वही है, जो निरपेक्ष, निष्कपट और अनंत है। यह प्रेम किसी शर्त या बंधन से बंधा नहीं होता, बल्कि यह आपकी आत्मा का मूल गुण है।
जब आप अपने भीतर उस प्रेम की अनुभूति कर लेते हैं, तो आप देखेंगे कि आपके चारों ओर हर प्राणी, हर जीव, हर तत्व में वही प्रेम झलकता है। तब आप सच्चे अर्थ में प्रेमपूर्ण बन जाते हैं। यही वह मार्ग है, जिस पर चलकर आप अपने जीवन को सम्पूर्णता, शांति और आनंद से भर सकते हैं।
आख़िर में, यह समझिए कि प्रेम एक ऐसी शक्ति है, जो आपके भीतर के असीम प्रकाश को जगाने का साधन है। इसे पाने के लिए आपको किसी बाहरी संबंध की आवश्यकता नहीं, बल्कि केवल अपने भीतर झांकने की आवश्यकता है। अपने आप को जानिए, अपने आप से प्रेम कीजिए, और तब आप उस दिव्य प्रेम का अनुभव कर पाएंगे, जो सम्पूर्ण जगत में फैला हुआ है।
यह प्रेम, मेरे मित्रों, वह अमृत है, जो आपके जीवन को परिवर्तन की ओर ले जाता है। जब आप इसे महसूस करते हैं, तो आप न केवल अपने आप में बल्कि सम्पूर्ण मानवता में एक नया जीवन, एक नई ऊर्जा का संचार देखते हैं।
इसलिए, याद रखिए – प्रेम स्वभाव की बात है, संबंध की बात नहीं। यदि आपके भीतर वह अटूट प्रेम नहीं है, तो आप किसी भी संबंध में सच्चे प्रेम का अनुभव नहीं कर सकते। अपने आप को खोलिए, अपने अहंकार को त्यागिए, और उस अनंत प्रेम के स्रोत से जुड़ जाइए, जो आपके भीतर सदैव विद्यमान है।
समापन विचार
मेरे प्रिय साथियों,
आज का यह प्रवचन हमें यह संदेश देता है कि प्रेम किसी बाहरी वस्तु या संबंध से अधिक है – यह हमारे स्वयं के अस्तित्व का एक अनिवार्य अंग है। ओशो की शिक्षाएँ हमें याद दिलाती हैं कि यदि हम अपने भीतर के उस प्रेम को नहीं पहचानते, तो हम किसी भी बाहरी प्रेम का अनुभव करने में असमर्थ रहते हैं।
हर व्यक्ति में वह दिव्यता है, वह अनंत प्रेम है, जिसे समझने और अपनाने का कार्य हम सभी का है। जब हम इस प्रेम को अपनाते हैं, तो हम स्वयं एक परिवर्तनकारी शक्ति बन जाते हैं, जो सम्पूर्ण मानवता में प्रेम और शांति का संदेश फैलाती है। यह प्रेम केवल हमारे व्यक्तिगत संबंधों को नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जगत को एक नई दिशा प्रदान करता है।
इसलिए, आइए हम सभी अपने भीतर झांकें, अपने भीतर के उस अनंत प्रेम को पहचानें, और उसे सम्पूर्ण जगत में फैलने दें। याद रखिए – प्रेम स्वभाव की बात है, संबंध की बात नहीं। आपका व्यक्तिगत प्रेम तभी सच्चा हो सकता है, जब वह सम्पूर्ण जीवों में, सम्पूर्ण मानवता में समान रूप से प्रकट हो।
इस प्रेम की अनुभूति ही वह दिव्य यात्रा है, जिस पर चलकर आप अपने जीवन को सम्पूर्णता, शांति और अपार आनंद से भर सकते हैं।
जय प्रेम, जय जीवन, और जय उस अनंत चेतना की, जो हमें सम्पूर्ण जगत से जोड़ती है।
निष्कर्ष
यह प्रवचन हमें इस सत्य की याद दिलाता है कि प्रेम का मूल स्रोत हमारे भीतर ही है, और उसे पहचानना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है। जब तक आप अपने भीतर के उस अनंत प्रेम को महसूस नहीं करेंगे, तब तक आप बाहरी संबंधों में भी सच्चे प्रेम का अनुभव नहीं कर पाएंगे।
ओशो की शिक्षाएँ हमें बताते हैं कि प्रेम कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि एक आंतरिक अवस्था है – एक ऐसी अवस्था जहाँ हम सम्पूर्ण जीवों के साथ एकाकार हो जाते हैं। यह अवस्था हमारे भीतर के अहंकार, द्वंद्व और विभाजन के भावों को तोड़ कर हमें एक नई चेतना प्रदान करती है।
इसलिए, अपने आप को समझिए, अपने आप से प्रेम कीजिए, और तब आप उस अनंत प्रेम का अनुभव कर पाएंगे, जो सम्पूर्ण जगत में फैलता है। यही सच्चा प्रेम है, यही वह शक्ति है जो न केवल आपके व्यक्तिगत जीवन को, बल्कि सम्पूर्ण मानवता को भी परिवर्तित कर सकती है।
मेरे प्रिय साथियों, इस अनंत प्रेम के मार्ग पर चलिए, अपने भीतर की उस दिव्यता को पहचानिए, और उस प्रेम को सम्पूर्ण जगत में फैलने दीजिए। प्रेम स्वभाव की बात है, संबंध की नहीं – और यही वह सत्य है, जिसे अपनाकर आप अपने जीवन में सम्पूर्णता और शांति का अनुभव कर सकते हैं।
इस विस्तृत प्रवचन के माध्यम से हम समझते हैं कि प्रेम एक ऐसी मौलिक अनुभूति है, जो हमारे भीतर के सबसे गहरे भागों से आती है। जब आप इस प्रेम को महसूस करते हैं, तो आप देखेंगे कि हर प्राणी, हर संबंध, हर अनुभव में वही दिव्यता और अनंत प्रेम छिपा है। यही वह मार्ग है, जिस पर चलकर हम अपने जीवन को, अपने अस्तित्व को, एक नई, शुद्ध और प्रेमपूर्ण दिशा दे सकते हैं।
जय प्रेम, जय आत्मा, और जय उस अनंत प्रकाश की, जो हमें एक दूसरे में देखने का अवसर प्रदान करता है।
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