नीचे दिया गया प्रवचन, जिसमें यह समझाने का प्रयास किया गया है कि कैसे 'मन से जागे हुए व्यक्ति' की देह के प्रति भ्राति टूट जाती है, और वह शारीरिक उम्र की सीमाओं से परे जाकर एक निराकार, अनंत अस्तित्व का अनुभव करता है।
प्रस्तावना
जब हम अपने भीतर झाँकते हैं, तो एक अद्भुत सत्य का अनुभव होता है – हम केवल अपनी देह नहीं, बल्कि एक अनंत चेतना हैं। ओशो कहते हैं, "मन से जागे हुए व्यक्ति की देह के प्रति भ्राति टूट जाती है, वह ना बुढ़ा रह जाता ना जवान।" इस वाक्य में गहराई से यह निहित है कि जब एक व्यक्ति आत्मिक जागरण को प्राप्त कर लेता है, तो वह अपनी देह और शारीरिक आयु के बंधनों से ऊपर उठ जाता है।
यह प्रवचन हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि जागरूकता का वास्तविक मतलब क्या है, और कैसे यह हमारे जीवन में परिवर्तन का कारण बनती है। हम देखेंगे कि जागरण का अनुभव केवल एक आध्यात्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह हमारे हर पहलू – मन, देह, और आत्मा – को परिवर्तित कर देता है।
1. जागरूकता का अर्थ और उसका महत्व
1.1 जागरण की परिभाषा
जब हम कहते हैं "मन से जागे हुए व्यक्ति", तो इसका तात्पर्य है वह व्यक्ति जिसने अपने भीतर की आवाज सुनी है, जिसने अपने मन के गर्त से उठकर आत्मा के प्रकाश को देखा है। यह जागरण किसी दिन अचानक नहीं होता, बल्कि यह धीरे-धीरे, अनुभवों और ध्यान के माध्यम से प्राप्त होता है।
इस जागरण में व्यक्ति अपनी आंतरिक सीमाओं को समझता है – वह जानता है कि देह केवल एक अस्थायी आवरण है, जबकि आत्मा अनंत है। जब यह समझ विकसित हो जाती है, तो देह के प्रति लगाव या भ्राति स्वतः ही क्षीण हो जाती है।
1.2 देह के प्रति भ्राति क्या होती है?
हमारे जीवन में हम अपने देह से बहुत गहरा लगाव रखते हैं। हमारी आयु, हमारी सुंदरता, हमारा स्वास्थ्य – ये सब हमारे लिए महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं। समाज हमें सिखाता है कि युवावस्था में जीवन की भरमार है, बुढ़ापा दुःख और अशांति लेकर आता है।
लेकिन जब व्यक्ति मन से जाग जाता है, तो उसे समझ में आता है कि देह तो बस एक माध्यम है, एक यंत्र है जिसके द्वारा हम अनुभव करते हैं। अब वह व्यक्ति इस यंत्र को नहीं, बल्कि उस चेतना को देखता है जो इसके भीतर निहित है।
उदाहरण के लिए:
आज के समय में अनेक योगी, साधु और ध्यानकर्ता अपने जीवन में यह अनुभव कर चुके हैं कि जब वे अपने भीतर के स्वर्णिम प्रकाश से जुड़े होते हैं, तो उन्हें अपने शरीर के बारे में चिंता नहीं रहती। वे खुद को न जवान समझते हैं, न बुढ़ा, क्योंकि उनका अनुभव केवल शारीरिक आयाम तक सीमित नहीं होता।
2. देह की सीमाएँ और आत्मिक स्वतंत्रता
2.1 शारीरिक आयु का भ्रम
हमारी सोच में आयु एक बड़ी सीमा है। लोग अक्सर कहते हैं, "मैं जवान हूँ", "मैं बुढ़ा हो रहा हूँ", और इसी तरह के विचार हमारे मन में बसे रहते हैं। यह सोच हमें हमारे भीतर की असीम शक्ति से दूर कर देती है।
जब तक हम अपने आप को केवल शारीरिक रूप में पहचानते रहेंगे, तब तक हम अपने अंदर के उस अनंत चेतनात्मक प्रकाश को नहीं देख पाएंगे। जागरण के बाद व्यक्ति को यह अहसास होता है कि आयु केवल एक आकड़ा है, एक नंबर है जो समय के साथ बदलता रहता है।
2.2 आत्मिक स्वतंत्रता का अनुभव
आत्मिक जागरण का एक महत्वपूर्ण पहलू है—स्वतंत्रता। यह स्वतंत्रता हमें बताती है कि हम सिर्फ अपने देह नहीं हैं, बल्कि हम एक विशाल, अनंत चेतना हैं। जब यह अनुभव हमारे भीतर प्रवेश कर जाता है, तो शारीरिक सीमाएँ, उम्र की चिंता, और देह से जुड़ी भ्राति धीरे-धीरे मिटने लगती है।
उदाहरण:
एक समय था जब एक साधु ने अपने शिष्यों से कहा था, "मैं कभी नहीं देखता कि मेरे शरीर का रंग फीका पड़ गया है या मेरी आयु बढ़ गई है, क्योंकि मेरे भीतर की ऊर्जा शाश्वत है।" यही अनुभव आज भी उन लोगों में देखने को मिलता है जो आत्मिक जागरण के मार्ग पर चल रहे हैं। उनका चेहरा, उनकी मुस्कान, उनके बोल में एक अनूठी शांति और आत्मिक चमक होती है, जो आयु की सीमा को परे कर देती है।
3. जागरण की प्रक्रिया: ध्यान और आत्म-निरीक्षण
3.1 ध्यान का महत्व
ध्यान वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मन को शांत किया जाता है और उसे भीतर की ओर मोड़ा जाता है। ध्यान करने से हम अपने अंदर के उस गहरे प्रेम, शांति और चेतना से जुड़ जाते हैं जो देह से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
जब व्यक्ति ध्यान में अपने आप को खो देता है, तो वह अपने शरीर की सीमाओं से परे जाकर उस अनंत चेतना का अनुभव करता है जो उसे वास्तविक स्वतंत्रता देती है।
आधुनिक उदाहरण:
आज के युग में, योग, ध्यान, और मेडिटेशन के माध्यम से लाखों लोग अपने भीतर की शांति का अनुभव कर रहे हैं। वे अपने दैनिक जीवन की भागदौड़ से बाहर निकलकर केवल एक पल के लिए भी सही, अपने अंदर झाँकते हैं। इस प्रक्रिया में उन्हें यह एहसास होता है कि जीवन में असली धन्य वही है जो भीतर विद्यमान है।
3.2 आत्म-निरीक्षण और स्वयं से जुड़ाव
जब हम अपने आप से जुड़ते हैं, तो हमें अपने भीतर के उस अनंत प्रकाश का अनुभव होता है। आत्म-निरीक्षण से हम अपने मन के अवचेतन स्तर तक पहुँच जाते हैं, जहां से हमें वास्तविक स्वतंत्रता और शांति मिलती है।
कहानी:
एक युवा पेशेवर था, जो रोज़ाना अपने ऑफिस के काम में इतना व्यस्त रहता था कि कभी भी अपने भीतर झाँकने का समय नहीं निकलता था। एक दिन, उसके एक मित्र ने उसे ध्यान की सलाह दी। शुरू में तो वह हिचकिचाया, परंतु धीरे-धीरे उसने ध्यान करना शुरू कर दिया। कुछ महीनों में उसे यह अनुभव होने लगा कि वह केवल अपने शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि अपने अंदर की गहराई से भी जुड़ा हुआ है।
उसने महसूस किया कि जब वह अपने आप से जुड़ा रहता है, तो उसे उम्र का कोई एहसास नहीं होता। वह उस क्षण में स्वयं को अनंत महसूस करता है—ना वह जवान रहता है, ना बुढ़ा। यही वह अनुभव है जिसे ओशो ने शब्दों में पिरोया है।
4. आधुनिक जीवन में देह से परे चेतना का महत्व
4.1 शारीरिक और मानसिक तनाव का प्रभाव
आज के युग में, हम निरंतर अपने शारीरिक और मानसिक तनाव में उलझे रहते हैं। लगातार काम, प्रतिस्पर्धा, और सामाजिक अपेक्षाओं ने हमारे मन को इतना प्रभावित कर दिया है कि हम अक्सर अपने भीतर की शांति को खो देते हैं।
जब हम अपने शरीर और उम्र की चिंता में उलझ जाते हैं, तो हमारी आत्मा उस प्रकाश से दूर हो जाती है जो हमें असली स्वतंत्रता देती है।
उदाहरण:
आज के युवा अक्सर सोशल मीडिया पर अपने उम्र, रूप-रंग और उपलब्धियों के बारे में तुलना करते हैं। यह तुलना उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर कर देती है। परंतु, जब वे ध्यान और योग के माध्यम से अपने अंदर झाँकने लगते हैं, तो उन्हें एहसास होता है कि असली शक्ति और सुंदरता भीतर निहित है।
4.2 सामाजिक दबाव और उसकी छाया
समाज हमें हमेशा यह बताता है कि हमें जवान रहना चाहिए या बुढ़ापे से डरना चाहिए। इस सोच ने हमारे मन में एक ऐसा भ्रम पैदा कर दिया है कि उम्र बढ़ने के साथ हमारी वैल्यू कम हो जाती है।
परन्तु, जो व्यक्ति आत्मिक जागरूकता प्राप्त कर लेता है, वह इस सामाजिक दबाव से मुक्त हो जाता है। वह जान जाता है कि वास्तविक सुंदरता और शक्ति केवल बाहरी रूप में नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव में होती है।
कहानी:
एक महिला ने अपने जीवन में कई बार यह महसूस किया कि समाज उसके उम्र को लेकर उसे आंक रहा है। वह हमेशा युवाओं की तरह दिखना चाहती थी, परंतु जैसे-जैसे वह उम्रदराज हुई, उसे लगा कि उसकी चमक खो रही है।
एक दिन उसने ध्यान करना शुरू किया। धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि जब वह अपने अंदर झाँकती है, तो उसके भीतर एक अनंत प्रेम और शांति का संचार होता है। अब उसे न तो खुद के लिए जवान रहना महत्वपूर्ण लगता है, न ही बुढ़ापे का डर – क्योंकि वह जान चुकी थी कि असली शक्ति उसके भीतर है, जो समय से परे है।
5. देह की भ्राति का टूटना: एक आध्यात्मिक क्रांति
5.1 देह से लगाव का त्याग
जब हम अपने भीतर जागरूक हो जाते हैं, तो हमें यह एहसास होता है कि देह केवल एक आवरण है, एक माध्यम है। देह से लगाव और उससे जुड़े हर प्रकार के डर—बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु—ये सब उस असली सत्य से दूर कर देते हैं जो हमारी आत्मा में विद्यमान है।
एक बार ओशो ने कहा था कि जब हम अपने आप से जुड़े रहते हैं, तो देह का कोई महत्व नहीं रहता। इस बोध से व्यक्ति को एक नई दिशा मिलती है—एक ऐसी दिशा जहाँ हर क्षण, हर अनुभव, और हर दिन में एक अनंत आनंद है।
उदाहरण:
ध्यान करने वाले लोगों में अक्सर देखा जाता है कि वे अपने शरीर के बारे में उतनी चिंता नहीं करते। वे अपने अंदर के प्रकाश में इतने मग्न हो जाते हैं कि उन्हें बाहरी दुनिया की छोटी-छोटी परेशानियाँ अप्रासंगिक लगने लगती हैं।
5.2 आत्मिक चेतना का उदय
जब देह से लगाव टूट जाता है, तो आत्मिक चेतना का उदय होता है। यह चेतना हमें बताती है कि हम केवल शारीरिक नहीं हैं, बल्कि हम उस अनंत शक्ति का अंश हैं, जो समय, आयु और भौतिक सीमाओं से परे है।
विचार-विमर्श:
यह परिवर्तन तब आता है जब व्यक्ति अपने भीतर के अनुभवों को पहचानता है। वह महसूस करता है कि जब तक वह अपने मन के और दिल के बीच संतुलन नहीं बना लेता, तब तक वह पूर्णता का अनुभव नहीं कर सकता।
यह वही अनुभव है जिसे हमने पहले भी देखा – जब ध्यान में मग्न व्यक्ति को अपने अंदर की गहराई का एहसास होता है, तो उसे लगता है कि उसकी आत्मा अनंत है, और देह केवल एक क्षणिक आवरण है।
6. ओशो की भाषा में: एक आत्मिक पुनर्जागरण
6.1 ओशो की शिक्षाएँ
ओशो हमेशा कहते थे कि जीवन में जागरण सबसे बड़ा उपहार है। जब व्यक्ति अपने अंदर के उस प्रकाश को पहचान लेता है, तो वह शारीरिक सीमाओं से ऊपर उठ जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि तुम अपने आप को केवल शारीरिक रूप में पहचानते रहो, तो तुम हमेशा एक निश्चित ढांचे में बंद रहोगे। लेकिन जब तुम अपने मन से जाग जाते हो, तो तुम्हारा अस्तित्व एक नई दिशा में प्रवाहित होने लगता है – जहाँ समय का कोई मोल नहीं रहता।
उदाहरण:
ओशो ने अपने प्रवचनों में बार-बार इस बात पर जोर दिया कि "जब तुम जाग जाते हो, तो तुम खुद को अनंत पाते हो।" यह वही संदेश है – कि जीवन की सच्चाई केवल बाहरी संरचनाओं में नहीं, बल्कि आत्मिक जागरूकता में निहित है।
6.2 आध्यात्मिक पुनर्जागरण का संदेश
आज के समय में, जब तकनीक और आधुनिकता ने हमारे जीवन को इतना बदल दिया है, तब भी यह सत्य अपरिवर्तित है – कि वास्तविकता वही है जो हमारे अंदर है।
जब हम अपने आप को जागरूक करते हैं, तो हमें पता चलता है कि हम केवल शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि आत्मा के रूप में अनंत हैं। यह अनुभव एक आध्यात्मिक पुनर्जागरण का कारण बनता है।
आधुनिक उदाहरण:
आज के युवा, जो अक्सर सोशल मीडिया और बाहरी दुनिया की चमक-दमक में खो जाते हैं, जब ध्यान और आत्म-निरीक्षण की ओर रुख करते हैं, तो उन्हें महसूस होता है कि असली सुंदरता और आनंद वही है जो उनके अंदर है। वे कहते हैं कि अब उन्हें उम्र का कोई मोल नहीं रहता, क्योंकि उनकी आत्मा युवा और अनंत महसूस होती है।
7. निष्कर्ष: आत्मिक जागरूकता का अनंत अनुभव
जब हम ओशो की शिक्षाओं के अनुसार अपने अंदर के उस अद्भुत प्रेम और जागरूकता को अपनाते हैं, तो हमें समझ में आता है कि देह की भ्राति—जिसका हम अक्सर भय और चिंता के साथ सामना करते हैं—वह केवल एक भ्रांति है।
"मन से जागे हुए व्यक्ति की देह के प्रति भ्राति टूट जाती है, वह ना बुढ़ा रह जाता ना जवान।"
यह वाक्य हमें यह संदेश देता है कि जब हम अपने अंदर के उस अनंत प्रेम, शांति और चेतना से जुड़े रहते हैं, तो शारीरिक आयु और देह की सीमाएँ खो जाती हैं। हम एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं जहाँ हर दिन, हर पल, अनंतता का अनुभव होता है।
इस जागरूकता से हमारा जीवन न केवल आध्यात्मिक रूप से समृद्ध होता है, बल्कि हमारे सभी रिश्ते, हमारा कार्य, और हमारी सोच भी एक नई दिशा प्राप्त कर लेती है। हम न केवल अपने आप को, बल्कि पूरे ब्रह्मांड को एक नई दृष्टि से देखने लगते हैं – जहाँ हर चीज़ में एक अनंत ऊर्जा निहित होती है।
जब हम इस सत्य को अपने जीवन में स्वीकार कर लेते हैं, तो हम उस बाहरी ढांचे, समाज की अपेक्षाओं, और समय की सीमाओं से ऊपर उठ जाते हैं। हमारा अस्तित्व एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है जहाँ उम्र, देह, और भौतिकता का कोई मोल नहीं रहता – क्योंकि हमारी आत्मा अनंत है, और उसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती।
अंतिम संदेश
प्रिय आत्मन,
जब तुम अपने आप को जागरूक कर लेते हो, तो तुम महसूस करते हो कि असली सौंदर्य, असली शक्ति, और असली आनंद तुममें ही निहित है। तुम केवल शारीरिक नहीं हो, बल्कि तुम उस अनंत चेतना का अंश हो जो समय और आयु की सीमाओं से परे है।
इसलिए, जब भी तुम अपने आप में झाँको, तो याद रखना कि देह एक क्षणिक आवरण है, और वास्तविकता वही है जो तुम्हारे अंदर है।
ओशो का यह संदेश हमें सिखाता है कि "मन से जागे हुए व्यक्ति की देह के प्रति भ्राति टूट जाती है, वह ना बुढ़ा रह जाता ना जवान।" यह वह अनंत सत्य है जिसे अपनाने से तुम एक नई, मुक्तिपूर्ण, और आनंदमय जिंदगी जी सकते हो।
अपने भीतर के उस अनंत प्रकाश को पहचानो, और देखो कि कैसे तुम समय के बंधनों से मुक्त हो जाते हो। यह जागरण न केवल तुम्हें आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है, बल्कि तुम्हें एक ऐसे अस्तित्व की अनुभूति कराता है जहाँ तुम अनंत और अमर हो।
इस आध्यात्मिक यात्रा में, हर दिन, हर क्षण तुम्हें यह एहसास कराएगा कि तुम उस अनंत प्रेम का हिस्सा हो, जो हमेशा तुम्हारे साथ है, और जो कभी भी फीका नहीं पड़ता। यही तुम्हारा सच्चा अस्तित्व है, यही तुम्हारा मार्ग है।
समापन
इस प्रवचन के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि जब तुम अपने अंदर की आत्मिक जागरूकता को अपनाते हो, तो देह और आयु की सीमाएँ अपने आप धुंधली पड़ जाती हैं। तुम न तो जवान रहते हो, न बुढ़ा—तुम केवल एक अनंत चेतना के स्वरूप में हो।
आओ, अपने भीतर के उस असीम प्रेम और शांति को पहचानो, और इस अनंत सत्य के साथ जीवन जीओ। क्योंकि असली आनंद वही है जो भीतर से आता है, और जो शारीरिक बंधनों से परे है।
"मैं अपने अंदर के उस अनंत प्रकाश को पहचानता हूँ, जो मुझे समय, आयु और देह की सीमाओं से मुक्त करता है। मैं जागरूक हूँ, और यही मेरे जीवन का सच्चा स्वरूप है।"
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